Saturday, September 26, 2015

तुम्हारे साथ नहीं हूं मैं!

दो महीनों से बात नहीं हुई थी हमारी... रोज रोज ब्लैंक मैसेज भेज भेज कर थक गया था... लगता था कि तुम इतनी निर्मम कैसे हो सकती हो... पर फिर मन को समझा लेता था कि नहीं... जो लड़की मेरे लिए अपनी सीमाओं को तोड़ते हुए मुझ से घंटों बातें कर सकती है... वह निर्मम नहीं हो सकती...

मां के फोन पर आज तुम्हारे घर से कॉल आया तो पता चला कि तुम बिमार हो... तुम्हें टायफाइड हो गया है... हालत ऐसी है कि बेड से उठ नहीं पा रही हो और गले से एक भी निवाला नीचे नहीं उतर रहा है...

मन में पीड़ा की लहरे जोर मारने लगीं... सब कुछ छोड़ तुम्हारे पास आ जाना चाहता था... लेकिन जैसे दूसरी घटनाओं में तुम्हारा साथ नहीं दे पाता वैसे ही इस बिमारी में भी तुम्हारे साथ मेरा होना असंभव ही रहा....

दिन भर तुम्हारे बारे में सोचता रहा लेकिन कुछ कर न सका सिवाय एक ब्लैंक मैसेज के...

कितना अजीब होता है न यह सब... जब मुझे तुम्हारे साथ होना चाहिए तभी मैं तुमसे दूर हूं.... तुम्हारे पास नहीं हूं... आखिर क्यों है ऐसा...

Thursday, September 10, 2015

लीजिए वापस आ गए हम...

आज फिर लौट आया हूं अपने चाहने वालों के कारण... काफी दिनों से शिकायत थी लोगों कि आखिर मेरी और तुम्हारी मुलाकात कहां तक पहुंची ? सपनों की नगर और मीलों की दूरी को क्या हम अंजाम तक पहुंचा पाए या नहीं ... आज से एक बार फिर लौट आया हूं लेकर अपनी कहानी....


कुछ दिनों तक बात नहीं हो पाई  थी हमारी.... तुम घर पर थी और घर पर तमाम रिश्तेदार, हमारी कहानी में सबसे बड़ा कोई रोड़ा था तो रिश्तेदारी ही थी.. खैर, इन दिनों बातचीत कम थी.... दिनभर तुम घर के काम से घिरी रहती फुरसत मिलती तो रिश्तेदार पकड़ लेते, उनके मुक्ति मिलती तो तुम्हारी कॉलेज की किताबें, मैं नहीं चाहता था कि तुम्हें बे-वजह परेशान करूं इस लिए जैसे तय हुआ था.. कि इस दो महीने सप्ताह में केवल एक बार बात होगी... की उम्मीद लगाए बैठा था मैं....

लेकिन रोजना सुबह उठते ही  तुम्हें ब्लैंक मैसेज भेजना नहीं भूलता था मैं.. शायद मेरा स्वार्थ था यह! सोचता था कि शायद इस मैसेज ही मैं अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता रहूंगा... लेकिन मुझे क्या पता था मेरी अनुपस्थिति किसी और की उपस्थिति में तब्दिल हो जाएगी, कोई और मेरी जगह ले लेगा, मेरे रचे सपने से मुझे ही निकाल दिया जाएगा....

Tuesday, September 1, 2015

आइए... बैठ कर रो लेते हैं आज...

जिंदगी की भाग दौड़ में आप कब अपने आपको भूल जाते हैं यह आपको खुद भी नहीं पता चलता है... आओ जरा बैठ लेते जरा रो लेते हैं..... जिंदगी में रोना भी बहुत जरूरी है मेरे यार... यकिन मानिए आप अगर आप दुनिया के साबसे ताकतवर लोगों में से एक हैं और आप रो नहीं सकते हैं तो दुनिया में आपसे कमजोर कोई नहीं है। झूठे हैं वे लोग जो आपको ताकतवर कहते हैं... मैं कहता हूं ताकतवर वो होते हैं जो रो लेते और रोकर आगे बढ़ जाते हैं... जिंदगी में सब रंग हैं... आप खुशी चाहते हैं, सुख चाहते हैं, हांसी चाहते हैं, सदा मुस्कुराते रहना चाहते हैं.... लेकिन शायद ही आपने कभी चाहा होगा कि आप रोएं... दो मिनट... बस दो मिनट लगता है रोने में लेकिन यह दो मिनट कम से कम 6 महीने तक के लिए आपको फ्रैश कर देता है... मैनटली फ्रैश... सर का कोई बोझ हल्का हो जाता है.. लगता है जैसे दिल पर रखा पत्थर हटा दिया हो किसी ने .... भारी सांसे फिर नॉर्मल होने लगती हैं... आप फिर एनर्जाइज हो जाते हैं... रो लीजिए... थोड़ा सा रो लीजिए... आखिरी बार कब रोए थे आप? कब आपने आपनी आंखों को कहा था कि जा आ दिल में गढ़े शब्दों को आसूंओं के जरिए बाहर निकाल दे.... कह दीजिए... आज दिल को बह जाने दीजिए.... यहां नहीं तो बथरूम में रो लिजिए पर अब तो रो लीजिए... कितना भार उठाए घूमेंगे इस दिल पर... कुछ तो भार कम कर दीजिए...

Saturday, August 1, 2015

सपना! सच या झूठ है यह सपना....

आज ही मिलने का वादा हुआ था। 11 मार्च 2015 हां 11 मार्च... आज ही के दिन तुम्हारा एग्जाम था और तुम्हारे एग्जाम के लिए ऑफिस से स्पेशल ऑफ लेकर मैं मीलों का सफर तय करने को तैयार हो गया था। अब इंतजार था तो तुम्हारे फोन का... तय हुआ था कि तुम मुझे फोन करोगी और फिर मैं यहां दिल्ली से निकलूंगा...


मैं ऑफ लेकर तुम्हारे फोन कॉल का ही इंतार करत रहा... 8 मार्च को तुम्हें घर लाने के लिए राजी तो कर लिया था पर मुझे क्या मालूम था कि मैं ही तु्म्हारे पास नहीं पहुंच पाऊंगा....

9 और 10 मार्च के वे 42 घंटे कितने भारी थे यह मैं ही जानता था... बार बार मेरा ध्यान बस फोन पर ही लगा हुआ था। एक आश थी कि अब तुम्हारा फोन आएगा... तब तुम्हारा फोन आएगा...

लेकिन आज यह 42 घंटे भी 42 सालों की तरह तिल-तिल कर के बीत गए... न मैं तुम्हारे घर न तुम्हारा कॉल मेरे पास....

पूरे दिन फोन के पास ही बैठा रहा.. कहीं ऐसा न हो कि तुम फोन करो और मैं फोन ही न उठा पाऊं... कभी फोन की बैट्री चैक करता तो कभी फोन का नेटवर्क... क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि तुम्हारा फोन आए और हमारी बात न हो पाए....


दो दिनों के लंबे इंतजार के बाद भी तुम्हारा फोन जब नहीं आया तो मैं समझ गया कि मैं एक बार फिर तुम्हारी बातों में फंस गया। काश मैंने उस दिन तुम्हारी बात न मानी होती और कहा दिया होता कि मैं आ रहा हूं। चाहे तुम फोन करो या नहीं.....

पर नहीं मैं तो तुम्हारे उस फोन कॉल के इंतजार मैं बैठा रहा जो आया ही नहीं...


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तुम्हें पता है मैंने 9 और 10 दोनों ही रातों को केवल एक ही सपना देखा.... सपने में तुम थी, तुम्हारा कॉलेज था, बाइक थी और मैं था.... नींद में तो सपना देख बहुत खुश हुआ था मैं पर जैसे ही सुबह मेरी आंख खुली में स्तब्ध रह गया... क्योंकि मैं जानता था कि जो सपने मैं देखता हूं वह कभी सच नहीं हुआ करते हैं... समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं... आखिर कैसे तुम मेरे सपनों में आ गई... मैं यह सोच कर परेशान ही था पर मन में ख्याल आया कि ऐसा कुछ नहीं होगा... और एक बार फिर मैं गलती कर बैठा.... बैठ गया दो दिन तक तुम्हारे इंतजार में... सपना सच होने के इंतजार में.... तुम से मिलने के इंतजार में... और यह इंतजार आज तक इंतजार ही है....



11 मार्च 2015




 

Wednesday, July 22, 2015

आ घर लौट चलें!

07 मार्च को तुमने पुछा था कौन सा घर, कैसा घर... तुम यकिन मानोगी कि आज भी जब मेरे कानों में तुम्हारी वह आवाज गूंजती है तो मेरे पैरों तले धरती खिसक जाती है, सामने आंधेरा छा जाता है, सांसे धीमी हो जाती हैं...

ऐसा ही कुछ उस दिन भी हुआ था। बातें ऐसे मोड़ पर छूट गईं थीं जहां से आगे कोई रास्ता मुझे सुझ ही नहीं रहा था। इसलिए उस पूरी रात में मैं बस तुम्हारे ही ख्यालों में खोया रहा। मुझे मालूम था कि तुम्हारे ऐसे सवालों के पीछे तुम्हारा जरूर कोई मकसद रहा होगा। तुमने जरूर कुछ सोचकर ही ऐसे बेरूखी से यह बातें कह डाली होगीं... तुम्हारे मन में भी इस घर आने के लिए हिलोरे जरूर उठते होंगे पर फिर भी ऐसे रवैया क्यों... मैं परेशान हो रहा था। मन था कि बस कैसे भी तुम्हारे पास पहुंच जाऊं, तुम्हें पूछूं कि आखिर ऐसी कौन सी वजह है जो तुम अब इस घर को भूल गई। पर अफसोस यह मीलों की दूरी!!

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तुम्हारी उस बात को 42 से ज्यादा घंटे बीते चुके हैं पर मेरा दिल और दिमाग अब भी वहीं मेरे ऑफिस के टेरेस पर अटका हुआ है जहां तुमने घर आने को लेकर सवाल दाग दिए थे। इन 42 घंटों का एक एक पल मेरे लिए कितना भारी रहा यह शायद तड़प-तड़प कर मरने वाली मछली भी न समझ पाएगी। मैं तुमसे बात करना चाहता था, तुम्हें समझाना चाहता था, तुमपर गुस्सा और तुमसे नाराज भी होना चाहता था पर मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहा था। मैं बेबस, लाचार, असाहय यह सब सहता रहा....

शाम के 7 बजे... रणभूमि में तबदिल हो चुके उस न्यूजरूम में मैं भी बैठा हुआ रोजाना की तरह अपनी खबरों को एडिट किए जा रहा था पर बार बार मेरा हाथ अपने आप उस जेब में चला जा रहा था जिस जेब में पड़े मोबाइल को तुम्हारे कॉल का इंतजार था... और वह वक्त शाम 8 बजे आ ही गया... 90 के दशक का ब्लक एंड व्हाइट न्यूजरूम एकाएक क्लरफूल न्यूजरूम में तब्दिल हो गया, पतझड़ से सावन आ गया... मोरों ने नाचना शुरू कर दिया और उधर से तुम्हारी आवाज आई

'हैल्लो'

यार पता है कितना परेशान हूं मैं यहां....

क्यों क्या हुआ.?

तुम्हें नहीं पता....




और फिर खबरों की रणभूमि से कहीं दूर हम एक बार फिर घर की चर्चा पर लौट आए थे। पूरे 43 मिनट लगे थे तुम्हें वापस घर लाने के लिए तैयार करने में.... तुम भी कम जिद्दी नहीं... एक से एक तर्क दिए थे तुमने.... पर आखिरकार तुमने घर आने की हामी तो भर ही दी....



08 मार्च 2015

Thursday, April 16, 2015

मौका!

उस दिन के बाद से मनो ज़िन्दग बेरंग हो चली है। लगता है सीने का एक हिस्सा कट कर गिरा जा रहा है। मुझे तुमसे बात करनी है। तुम्हे समझाना है कि कौन सा घर! कैसा घर! मुझे तुम्हे बताना है कि मैं उसी घर की बात कर रहा था की जिसका अस्तित्व तुम्हारी हाँ से ही आया था! तुम्हे उस घर लाने की बात कर रहा था जहाँ आने का तुमने वादा किया था! जहाँ तुम्हारे आने का ख्वाब मैंने सोते जागते देखा है!

उस दिन हमारी बात पूरी न हो सकी। तुम बीच में चली गयी पर मैं, मैं अभी तक वहीं खड़ा हूँ। यह सोचकर खड़ा हूँ कि तुम्हे तुम्हारे सवाल "घर! कौन सा घर?" का जवाब दूंगा। तुम्हे समझाऊंगा। पर अफ़सोस अभी तक तुम्हारा कोई अता-पता नहीं है। रोज़ की ही तरह इस 03 मार्च के बाद मैंने न जाने तुम्हे कितने ब्लेंक मेसेज किए कि शायद एक बार तुम्हे मेरा ख्याल आ जाए और हमारी बात हो जाए पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। तुम्हारा कोई जवाब नहीं आया।

क्या तुम सच में इतनी निष्ठुर हो गयी हो या फिर कोई मज़बूरी है! कोई मज़बूरी ही होगी! हमारे इस रिश्ते में न जाने कितने मजबूरियां है जो हमें चाह कर भी एक नहीं होने देती हैं! तुम्हे घर नहीं आने देती हैं! मुझे नींद नहीं आने देती हैं!

उस दिन के बाद अब मन उदास सा रहता है। मेरी दोस्त मुझे कहती है,"यार तू मोटीवेट अच्छा करता है।"
अब उसे क्या बताऊँ कि यहाँ मेरी जिंदगी में ही मोटिवेशन की कितनी जरुरत है। काश! काश मैं तुम्हे समझा पाता! काश एक बार हमारी फिर बात हो जाती!

हर सुबह उठाते ही इस उम्मीद से  तुम्हे ब्लेंक मेसेज सेंड करता हूँ कि शायद आज हमारी बात हो जाए! शायद तुम्हे समझाने का एक मौका मिल जाए!

पर अफ़सोस ! न कोई जवाब आता है , न ही मैं तुम्हे कुछ समझा पा रहा हूँ। बस अपना सीने में दर्द लिए यूंही घुट-घुट के जिए जा रहा हूँ!!

07 मार्च 2015

Saturday, April 11, 2015

घर ? कौन सा घर ?

तो तय हो चूका था की मुझे 11 मार्च की सुबह तुम्हारे पास किसी भी हाल में पहुंचना ही है। खुदा ने भी साथ दिया और सब मामला फिट हो गया। कॉलेज का लास्ट एग्जाम 10 की बजाय 09 को निकला, ऑफिस से एक वार फिर छुट्टी मिल गयी और घरवाले भी मुझे बाहर भेजने को तैयार हो गए।

अब बस इंतज़ार था तो उस घड़ी का जब मैं तो और तुम साथ होंगे! बेसब्री मुझ पर हावी हुई जा रही थी कि कब हम मिलेंगे! कब मैं तुम्हे बाइक के पीछे बैठा तुम्हारे कॉलेज छोड़ने जाऊंगा! कब मैं जी भर के तुम्हारा दीदार कर सकूँगा!!

ऐसे ही तमाम ख्याली पुलावों की कल्पना करता हुआ मैं फुला न समा रहा था और तभी आज दोपहर तुम्हारा कॉल आ गया।

बातें! प्रेम की वो बातें आज फिर शुरू होने से पहले ही कहीं खो गयी! मैंने तुम्हे बतया था कि मैं 11 को आ रहा हूँ और फिर तुम्हे तुम्हारक एग्जाम सेंटर लेकर चलूँगा। मालूम नहीं यह सुन तुम्हारे दिल में प्रेम का पवित्र कमल खिला था या नहीं पर मैंने जैसे ही कहा," और फिर तुम भी तो जल्द यहाँ, आ रही हो ! हमेशा के लिए! यहाँ हमारे घर!"

"घर! कौन सा घर?" तुमने पूछा था।

तुम्हारा यह सवाल सुनते ही लड़खड़ा गया था मैं। अपने को सँभालते हुए मैंने कहा," मेरे घर, यहाँ दिल्ली। आ रही हो न तुम, हमेशा के लिए"

"हाँ, देखो कभी आएंगे घूमने के लिए"

"घूमने के लिए! एक मिनट! घूमने के लिए... हमेशा रहने के लिए"

"हमेशा रहने के लिए...?? यह तो संभव नहीं है" तुमने कहा था। यह सुनते ही लगा जैसे मेरे पैरों के निचे की जमीन कहीं खिसक गयी!!

"तुमने वादा किया था तुम हमेशा के लिए मेरे साथ रहने आओगी। हम दोनों अपना बुढ़ापा एक साथ काटेंगे।"

"ऐसा कुछ भी संभव नहीं है। ज्यादा से ज्यादा हम वहाँ केवल घूमने के लिए आ सकते हैं।"

"क्यों ऐसे कुछ संभव क्यों नहीं हैं। क्या तुम आना नहीं चाहती" ट्रैक्टरों के इंजन की तरह धड़कते दिल को सँभालते हुए मैंने पूछा।

"मेरे चाहने यह न चाहने से कुछ नहीं होगा। हमरा परिवार, यह समाज कभी हमें एक साथ नहीं होने देगा"

"ऐसा कुछ नहीं है तुम कोशिश तो करो। हिम्मत क्यों हार रही हो"

"हमें पता है यह सम्भव नहीं हो सकता। यह असंभव है।" एक अजीब तरह की झिझक थी तुम्हरी आवाज़ में।

" अरे बाबा! तुम क्यों ऐसा सोचती हो। तुम घर आ रही हो बस! और कुछ नहीं। अभी झुंझलाहट को छुपातेहुए कहा था मैंने।

" घर! कौन सा घर! जैसा हम सोच रहे हैं वो बिलकुल भी संभव नहीं है।"

"अरे बिलकुल सम्भव है... दिक्कत क्या आखिर! हमने सब सोच कर रखा हुआ है..."  और मैंने जो कुछ सोच रखा था वो सब तुम्हे सुना डाला। और तुम हमेशा की तरह एक बार फिर चुप चाप सोचती रही।

"मैंने कुछ ज्यादा ही बोल दिया..."

"नहीं नहीं... अच्छा लगा सुनकर कि कोई हमारे बारे में इतना कुछ सोचता है।" तुमने कहा था।

चेहरे पर आई एक छोटी सी मुस्कान के साथ कहा था की तो फिर तुम  रही हो न घर!

"घर! कौन सा घर! यह संभव नहीं....  " कहते कहते तुम चली गयी.…  तुम्हे किसी ने बुला लिया और मैं अपने ख्याली पुलावों के साथ अपने पैरों के नीचे से खिसकी जमीन तलाशने लगा।

घर! कौन सा घर! 

( 03 मार्च 2015)

Monday, April 6, 2015

ये दूरी और मज़बूरी!!

तुम्हारा फोन काट गया। तुम वहां अपने एग्जाम की तैयारी में लगा गयी और यहाँ मैं!

मेरे सामने एक ऐसा चक्रव्यूह खड़ा था जिसमे से निकलने का कोई रास्ता न है। अभी हाल ही में ऑफिस से छुट्टी ले घूमकर आया हूँ और फिर अब दोबारा 4 दिन की छुट्टी मिल पाना तो मुश्किल है। 4 दिन से ज्यादा कहने को तो 4 दिन है पर असल में तो ये 4 दिन केवल चंद मिनटों की मुलाकात के लिए हैं।

मेरे सामने एक बड़ा सवाल है, यदि मुझे ऑफिस से छुट्टी मिल भी जाए, मेरे कॉलेज के एग्जाम भी किसी तरह एडजस्ट हो जाये और घर वालों को भी एडजस्ट कर तुमसे मिलने निकल लूँ तो क्या इतना आसान होगा।

फोन कट करते है इंडियन रेलवेज की वेबसाइट चेक की तो पता चला की 9 और 10 दोनों में ही दी। 300-300 वेटिंग टिकट है। मतलब साफ़ था की यदि सब एडजस्ट भी हो जाये तो भी तुमसे मिलने के लिए किसी युद्ध से कम संघर्ष नहीं करना है। उसपर भी वहां तुम्हारे पास पहुँच कर यह भी निश्चित नहीं है कि हमारी मुलाकात हो भी पायेगी या नहीं।

भारतीय रेलवे से तो अब कोई उम्मीद है नहीं। यदि तुमसे मिलना है तो हमें पूरी रात बिना सोए, ट्रेन में घूमते-घुमाते, बैठते उठाते हुए 14 घंटों का सफ़र तो करना ही होगा। इसके बाद भी यह संघर्ष यहीं नहीं खत्म होगा। इसके बाद तुमसे मिल अगले दिन फिर दिल्ली के लिए भी ऐसे ही सफर करना होगा। कुल मिलाकर यदि तुमसे मिलना है तो उसके लिए 4 दिन बिना सोए, बिना आराम किए लगातार सफर करना होगा और ऑफिस, फैमिली और कॉलेज को भी पूरा दिमाग लगा एडजस्ट करना पड़ेगा।

इंडियन रेलवे के बाद नंबर थे कॉलेज का। दोस्त से डेट शीट मंगावाई और देखते ही दिल को सकून मिल गया। पहली बार जी कर रहा था की जिस ने भी डेट शीट बनाई है उसे जा जाकर शुक्रिया कह आऊं। हमारे इंटरनल एग्जाम 09 को ही खत्म हो रहे थे और इसके बाद प्रक्टिकल में भी कुछ दिनों का गैप था। मतलब कॉलेज की तरफ से मेरा रास्ता क्लियर था। 09 को आखिरी एग्जाम दो और 10 को तुमसे मिलने निकल पडूँ। लेकिन अभी भी ऑफिस और फैमिली का क्या करना है कुछ समझ नहीं आ रहा था।

रात भर तुमसे मिलने का ख्याल दिल में चलता रहा। मन मवि उथल-पुथल मची रही। रोज़ ही रात को 1-2 बजे सोता था पर आज तो पूरी रात नींद ही न आई!!

अगला दिन

आज ऑफिस पहुँचते ही मैंने रिसेप्शन से लीव एप्लीकेशन फॉर्म ले लिया औए उसे भर अपने सीनियर के पास उसे अप्प्रूव् होने के लिए भेज दिया।

ऍप्लिकेशम देखते ही उन्होंने मुझे अपने केबिन में बुलाया और कहा," तुम अभी तो छुट्टी पर से आये और फिर छुट्टी... करते क्या ही भाई इतनी छुट्टियों का ?"

"सर वो कॉलेज में एग्जाम है न तो इसलिए ऑफ चाहिए वरना सर आपको पता है मैं वीक ऑफ भी नहीं लेता"

"चलिए ठीक है देखते हैं,  10 से 13 अप्रैल तक चाहिए न छुट्टी? चार दिन के लिए?"

"जी सर, 10 से 13 अप्रैल तक" झूठ बोलते वक़्त मेरी आँखें अपने आप नीची हो गयी थी।

जब एग्जाम था तब तो मैंने ऑफ लिया नहीं और अब तुमसे मिलने के लिए एग्जाम का बहाना लगा ऑफ की अर्ज़ी दे दी है।

वैसे भी अब तुमसे मिलना है तो फिर चाहे लाख मुसीबत आये अब तो तुमसे मिलना ही है।

31 मार्च 2015

Friday, April 3, 2015

मिलन की चाह !


 शाम का वक़्त था और धीरे धीरे ऑफिस में रिपोर्टरों का जमावड़ा लगाना शुरू हो गया था। वैसे भी अखबारों में असली काम तो शाम को ही शुरू होता है।


रोज़ की तरह ही एडिटर्स रूम में खबरों के चयन को लेकर मीटिंग चल रही थी। मीटिंग से वापस अपने डेस्क पर आ अपना फोन देखा तो एक मिस कॉल!! कल ही  तुम्हारे बारे में यहाँ लिखा और देखो आज ही तुम्हारा कॉल आ गया। 

आज तुम्हे तुरंत कॉल बेक न कर पाया था। दरअसल मीटिंग में जाने से पहले मैं आज अपना फोन डेस्क पर ही रख चला गया। वापस आकर देखा तो 05:47 पर तुम्हारा मिस कॉल था। तो यह देखते ही तुम्हे कॉल मिला दिया। 

हज़ार किलोमीटर की दूरी से आती तुम्हारी आवाज़ बेरंग ज़िन्दगी में इंद्रधनुष रच देती है, लगता है जैसे कानों में कोई मिश्री घोल रहा हो, प्यासी धरती को पानी सींच रहा हो, धूप में थके मुसाफिर को छांव दे रहा हो!! ऐसा ही लगता है जब भी तुम हज़ार किलोमीटर दूर बैठ मुझे याद कर फोन करती हो। 

आज एकाएक तुम्हे देखने दिल कह बैठा!  वैसे तो तुम्हारा शाश्वत रूप सदा ही मेरी आँखों के सामने रहता है पर फिर भी न जाने क्यों आज तुम्हे जी भर देखने की इच्छा है। 

" आज बड़ा मन हो रहा है तुमसे मिलने का.... कब तक ऐसे फोन पर ही चलता रहेगा..."

"तो आ जाओ मिलने..."

"अगर मैं आ गया तो तुम मिलोगी?" पूछा था मैंने तुमसे
और तुमने कहा था," हाँ पक्का मिलेंगे! कब आ रहे हो?"

तुम्हारा साहस देख रोमांचित हो उठा था मैं। मैं जनता था की तुम्हारे लिए मुझसे मिलना इतना आसान न होगा!!

अपने को सँभालते हुए कहा, "जब तुम कहो..."

"और तुमने तपाक से कह दिया, "अभी आ जाओ..."

"अभी...?"

"हाँ!! अभी.."

तुम्हारे यह कहते ही मुझे ऑफिस का लीव एप्लीकेशन याद आ गया। अभी तो पिछले हफ्ते मैं चार दिन का ऑफ ले मसूरी और ऋषिकेश घूमकर आया हूँ। भला अब कैसे दोबारा छुट्टी मिलेगी। 

"यार मैं आ तो जाऊंगा पर मेरी नौकरी चली जायेगी..." हँसते हुए कहा था मैंने।  


"तो क्या हुआ... तुम नहीं आ सकते हो तुम्हारा मन तो आ सकता है न"

"मन! वो इस बार वहां से वापस आया ही कहाँ था! वो तो वहीं तुम्हारे पास ही रह गया था। "


तुमसे मिलने की दिल बेकरार हुए जा रहा था। ऑफिस तो ऑफिस फिर कॉलेज और घरवालों को भी एडजस्ट करना पड़ेगा इसके लिए। फिर एकाएक ध्यान आया की कॉलेज नै तो एग्जाम है। और इधर तुम्हारा भी 11 को एग्जाम है। तो यदि मैं किसी तरह 11 की सुबह वहां पहुँच जाऊं तो हमारी मुलाकात हो सकती है। 

पर तुम तक पहुचना इतना आसान तो है नहीं। 

ऑफिस में लीव एप्लीकेशन!

कॉलेज एग्जाम !

और घरवाले!!

कुछ न कुछ तो करना पड़ेगा....




( 30 मार्च 2015)

Sunday, March 29, 2015

साथ जीना!



19! हाँ 19 मार्च को आखिरी बार बात हुई थी हमारी। उसके बाद से आज 29 मार्च की सुबह 1 बजे तक कोई बात-चीत नहीं। पर इस बार मन में कोई खींच नहीं है। कोई डर नहीं है तुम्हारे खोने का, तुमसे जुदा हो जाने का,तुमसे बिछड़ जाने का... इसका कारण है 19 मार्च को घण्टे भर चली हमारी बात।

उस दिन तुम्हारे कॉल ने मुझे दुनिया-जहाँ की खुशियाँ दे डाली। कारण यह नहीं था कि उस दिन 9 दिनों बाद हमारी बातें हो रही थी बल्कि कारण था तुम्हारा राज़ी होना। तुम्हारा राज़ी होना … 

मुझे शुरू से "I Love You" "Girlfriend - Boyfriend" जैसे शब्द बनावटी, कुछ नकली से मालूम होते रहे हैं.…इनका इस्तेमाल पर लगता है जैसे कोई खानापूर्ति कर रहा हो, दिखावटी प्यार जाता रहा हो!! प्रेम! प्रेम तो एक शाश्वत एहसास है, कल्पनाओं का ऐसा  संसार है जहाँ प्रेमियों के सिवाय कोई और नहीं। और यह एहसास, यह संसार love you, girlfriend - boyfriend जैसे शब्दों में नहीं झलकता। लगता है जैसे कोई जुगाड़ू शब्द हों ये ये! जिनका कोई स्थायी अस्तित्व!

ऐसा भी हो सकता है कि मैं गलत होऊं। शायद ये शब्द मुझे ही झूठे लगते हों! मुझे ही ये टिकाऊ नहीं लगते हों.… 
तब पर भी मैं तुम्हे इन शब्दों से तो  दूर ही रखना चाहूंगा!! और यहीं से मेरी सबसे बड़ी दुविधा का भी जन्म हुआ! हमारे बीच क्या है यह मैं समझ नही पाया रहा था पर मुझे अंदाज़ा तो था कि आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई है।  अब ऐसे में अपने दिल को राहत देने के लिए मैं तुम्हे दिखावटी शब्दों (I Love You  या girlfriend - boyfriend ) से तो कतई भी सम्बोधित नहीं कर सकता था। तो मैंने किया भी नहीं! 

पर बार बार मन में एक कचोटन उठती कि कहीं यह एकतरफ़ा इकरार तो नहीं! एक तरफ़ा प्यार तो नहीं?? 

लेकिन इसका जवाब मिला 19 मार्च को तुम्हारी कॉल से.… 

मुझे याद है कितना ढांढस बांध मैंने तुमसे पूछा था.… 

"तुम 8-10 सालों में घर तो आ रही हो न … ?"

गहरी सांस के बाद तुमने कहा था, "हाँ ... "

"हमेशा के लिए! साथ जीने के लिए, साथ बूढ़े होने के लिए.… ??" यह कहते वक़्त मेरा दिल किसी ट्रेक्टर के  इंजन से काम आवाज़ नहीं था।  और मीलों दूर तुम्हारे दिल का भी शायद यही हाल रहा होगा।  

और फिर लगा जैसे दुनिया थम सी गयी.… चहुँ और बस तुम्हारी आवाज़! केवल एक आवाज़ गूूंजने लगी

"हाँ! आ रहे हैं ! साथ जीने के लिए…  साथ बूढ़े होने के लिए… " 

बस फिर तो मैं नौवें आसमां पर था.। मन कर रहा था नाचूं!! जोर जोर से चिल्लाऊं!! सबको बताऊँ कि हाँ तुम आ रही हो!! 


बस तुम्हारे आने की हामी ने ही मुझे अपार खुशियां दे डाली थी।  मैं जनता था, जनता हूँ कि तुम्हारे लिए यहाँ आ पाना कितना कठिन है! तुम पर कितने पहरे हैं जो तुम्हें बार रोकेंगे! 

हमें मालूम है की हम दोनों की राहें कितनी मुश्किल है पर अब कोई फर्क नहीं पड़ता! अब तुमने साथ निभाने का वादा कर डाला तो फिर भला अब दिक्कत ही क्या !!

अब मुझे उन तमाम पहरों की कोई चिंता नहीं है! उन अदृश्य दीवारों को फांद मैं तुम्हे समय आते ही यहाँ ले आऊंगा ! साथ जीने के लिए साथ बूढ़ा होने के लिए.… 


29 मार्च 2015 

Tuesday, March 17, 2015

बांसुरी चली आओ!!

और सातवां दिन भी आज बीत गया! अब तो जैसे आदत सी हो गयी है तुम्हारे कॉल के इंतज़ार में बैठे रहने की। मालूम है  निष्ठुर हो गयी हो! कॉल क्या एक मेसेज तक नहीं करोगी तो भी ये दिल तुम्हारा इंतज़ार करता रहता है!

जब घर पर था तो सोचा था कि अगर तुमसे ढाई साल बाद भी बिना बात करे ही चला जाऊंगा तो दिल्ली में शायद काम ही नहीं कर पाउँगा! मन ही नहीं लगेगा! लेकिन तुमसे बात भी हुई और अब यहाँ मन भी नहीं लग रहा है।

शारीर एक ही है लेकिन इसके अंदर कई रजत कई टोनी हो गए है! एक रजत एक टोनी वो जो सब भूल बस काम काम और काम में लगा रहना चाहता है । तो दूसरा वो टोनी, वो रजत है जो बार बार तुम्हे सोच मुस्कुरा लेता है! 
तुम्हे अपने पास होने की कल्पना करता है पर जब कल्पना टूटी है तो वो भी टूट जाता है।
कई बार मन में एक संशय जन्म लेता है कहीं तुम मुझे मझदार में अकेला छोड़ कहीं दूर तो नहीं निकल पड़ी! ऐसे सोच सोच मेरा दिल कटा जाता है! लगता है जैसे कोई धारदार आरी से उसे काटे जा रहा है और मैं रो भी न पा रहा हूँ! फिर मन में दूसरा विचार आता है तुम तो समझदार हो, यदि ऐसा फैसला भी किया होगा तो मुझसे तो जरूर बताती कि अब आगे बात न होगी! अब आगे बात न बढेगी!

लेकिन तुमने तो ऐसा भी कोई संकेत न दिया! अब तुम्हारी इस रुसवाई को क्या समझूँ मैं!

कहीं तुम यह तो नहीं मान बैठी की हमारे बीच जो भी था मालूम नही कुछ था भी या नहीं! 10 तारीख को जब तुमसे ये पूछा था, तभी मैं डर गया था कि कहीं तुम इसके बाद मुझसे बात ही न करोगी! और देखो वही यथावत वो रहा है।

माफ़  करना पापा का कॉल आ रहा है!! बात करके वापस आता हूँ !

रस्ते में हैं! कहा है उत्तम नगर से पिक करलेंगे! तो अब वहीं उतरना है। घर लेट पहुँचता हूँ तो घर वालों को टेंशन हो जाती है तो फोन कर के खोज खबर ले लेते है और पापा आप-पास होते है तो अपने साथ ही घर लिए चलते हैं।

खैर, कहाँ था मैं... हाँ! मन के चक्रव्युह के बारे में बता रहा था तुम्हे! डर लगता है कहीं तू मेरे उसी सवाल से नाराज हो! या फिर ऐसा तो नहीं तुम सवाल का जवाब जानती थी! वो ही जवाब जो मेरे दिल में है! पर तुम उसे जगजाहिर न होने देने के लिए ऐसा कदम उठा रही हो! मुझे नज़र अंदाज़ कर रही हो!! देखो यह तो तय है हमारे बीच कुछ न कुछ तो जरूर है। लेकिन क्या है इसे ही तो हम तलाश रहे हैं। और अगर तुम्हे लगता है यह एक तरह का आकर्षण मात्र है तो तुम सरासर गलत हो। यह किसी एक बच्चे का किसी खिलौने के तरफ आकर्षण नहीं है। यह वह है जो शास्वत है! शुद्ध है! पवित्र है! हाँ ये वही है जो जाने अनजाने कितनी बार मेरे मन में आया! तुम्हारे भी मन में जरूर आया होगा। तभी मेरी आज यह हालात है। 

पता नहीं क्यों तुम्हारे बारे में सोच सोचकर मन भारी हुआ जाता है! ख़ुशी के साथ दिल में एक अजीब सा दर्द जाग उठता है... पता नहीं तुम यह सब कभी पढ़ भी पाओगी या नहीं पर अब एक यही तो यहाँ बेफिक्री से मैं तुम्हारी बातें कर सकता हूँ! तुम्हे याद कर सकता हूँ। मालूम नहीं तुम वहां क्या महसूस करती हो! क्या मालूम जो मैंने सोचा हो उससे तुम इतफ़ाक भी न रखो पर मैं! मैं तो आशावादी हूँ! आशा है और अंतिम साँस तक रहेगी! तुम्हारे आने की आशा! तुमसे मिलने की आशा!!


ऐसे में कुमार विश्वास की कविताएँ और दिल में हड़बड़ी मैच देती हैं। उनकी लिखी कुछ पंक्तियाँ हैं-


तुम अगर नहीं आई, गीत गा ना पाऊंगा...
सांस साथ छोड़ेगी, सुर सजा ना पाऊंगा...
तान भावना की है, शब्द शब्द दर्पण हैं...
बांसुरी चली आओ, होंठ का निमंत्रण है...


सच ही कह रही हैं यह पंक्तियाँ! जिस दिन तुम न आ सकोगी उस दिन कहाँ यह लिख पाऊंगा! कहाँ कलम चलेगी! अभी तो तुम्हारे आने की उम्मीद बाकी है। जब वह भी टूट जायेगी तो यह जीवन भी टूट ही जायेगा!!!



तुम बिन हथेली की हर लकीर प्यासी है, 
तीर पार कान्हा से दूर राधिका सी है,
दूरियां समझती हैं दर्द कैसे सहना है,
आँख लाख चाहे पर होंठ को ना कहना है...
औषधि चली आओ, चोट का निमंत्रण है...
बांसुरी चली आओ, होंठ का निमंत्रण है...

तुम अलग हुई मुझसे सांस की खताओं से...
भूख की दलीलों से, वक़्त की सजाओं से...
रात की उदासी को आंसुओं ने झेला है...
कुछ गलत न कर बैठे, मन बहुत अकेला है,
कचन कसौटी की खोट का निमंत्रण है,
बांसुरी चली आओ, होंठ का निमन्त्रण है...


यह शब्द भले ही कुमार विश्वास के हों, पर फिलहाल  इनका एक एक एहसास बिलकुल मेरा है! मेरे जैसे ही न जाने कितने लोगो का एहसास है ये। पंक्ति का एक एक शब्द दिल की गहराईयों से निकला है और इसका कारण तुम... जानती हो!!


बांसुरी चली आओ, होंठ का निमन्त्रण है...

17 मार्च 2015

Saturday, March 14, 2015

ईश्वर मेहरबान -2

 एक बार फिर बातें शुरू हुई, फिर गुफ्तगू का दौर चल पड़ा! 

मैं आज तक समझ नहीं पाया था कि आखिर हमारे  बीच यह सब क्या चल रहा है ? आखिर क्या है यह!! इसीलिए मेट्रो प्लेटफार्म पर खड़े हो मैंने तुमसे कहा, "एक बात पूछूं ? बुरा तो नहीं मानोगी ?"
"पूछो "
"देखो  बुरा मत मानना और सच सच जवाब देना"
" हाँ पूछो क्या पूछना है "
"तुम मुझसे ऐसे बात क्यों करती हो, मतलब हम ऐसे बात क्यों करते है, कुछ है क्या मतलब.... "
समझ नहीं आ रहा था  क्या कहूँ, दिल ज़ोरों से धड़कने लगा था, और तभी तुम बोली 
"मलूम... 

और प्लेटफार्म पर मेट्रो आ गयी!!  लोग मेट्रो में दाखिल होने के लिए भागने लगे!! शिर मचने लगा और तुम्हारी आवाज़ उस शोर में कहीं…  

मेट्रो में बैठते ही तुमसे तुम्हरा जवाब दोहराने को कहा, 
"मालूम नहीं हमें क्यों करते हैं बात.… "
"नहीं कोई तो कारण होगा … जो हम  ऐसे बात करते है "
"पता नहीं पर अच्छा  लगता है तुमसे बात कर के, अच्छा लगता है कोई हमरे बारे में भी सोचता है"

बातों के साथ मेट्रो आगे बड़े चली जा रही थी... भीड़ बढ़ रही थी …  शोर बढ़ रहा था...

मैं अपनी सीट छोड़ मेट्रो के एक कोने में खड़ा हो शीशे से बाहर झांकता तुमसे बातें करने लगा.… 

"मतलब तुम्हें अच्छा लगता है इसलिए बात होती है और मेरा क्या ? मैं तो तुम्हे फोन भी नहीं कर सकता जब तक तुम न चाहो" अक्सर उसके मिस कॉल आने पर ही मैं  दिल्ली से उससे कॉल किआ करता था। 

"ऐसा नहीं है, तुम्हे पता है यहां के लोग हर वक़्त मुझ पर नज़रें गड़ाए रखते है.… देखते रहते है किससे बात कर रही हूँ.… गलत सोच रखते हैं ये लोग.… इसको लगेगा पता नहीं कौन सी बुरी बातें कर रहे हैं.… " यह कहते कहते उसकी आवाज़ गंभीर हो गयी थी.… वो उत्तेजित हो रही थी। 

"वैसे हम दोनों कौनसी बुरी बात कर रहे हैं, कौन कोई डाका डालने की योजना बना रहे हैं" मेरे यह कहते ही तुम हंसी थी.… तुम्हारी हंसी की खिल-खिलाहट से दिल में एक अजीब सी ठंडक महसूस हुई थी.। 

"अच्छा तो ऐसा कब तक चलेगा … कब तक हम यूँही एक दूसरे से ऐसे छुपते-छुपाते बातें करेंगे" मेट्रो के शीशे से बहार देखते हुए, मैंने पूछा था।  

"मालूम नहीं कब तक चलेगा ऐसा.… "

"अगर किसी दिन बात न हो तो मुझे बहुत फर्क पड़ता है,  दिन भर तुम्हारे बारे में ही सोचता रहता हूँ.… पता नही बात न होने पर तुम्हे कोई फर्क पड़ता भी या नहीं"

"अगर फर्क नहीं पड़ता तो हम तुम्हे कॉल क्यों करते … तुमसे ऐसे बातें क्यों करते"

"काश !! यूँ ही चलता रहे यह सफर"

दोनों और खामोशी थी.… सिर्फ भरी साँसे

कुछ देर बाद वो बोली, "तुम्हें पता है हम कहाँ बैठे हैं "

"कहाँ छत पर हो? "

"हाँ, जहां से तुम्हारा ऊपर वाला रूम एक दम साफ़ दिखाई देता है "

"हम्म। .. " एक मुस्कान आ गयी थी मेरे चेहरे पर 

"तुम्हे याद है, पहले हम यहां छत पर होते थे  और तुम अपने रूम में। … दोनों एक दूसरे को देखते रहते और फोन पर देर तक बात करते थे" 

"हाँ !! कैसे भूल सकता हूँ वो लम्हे!! कितने प्यारा टाइम था वो" कहते हुए मैं मेट्रो से एकाएक ;निकल गांव के उस रूम में पहुँच गया था.। जहाँ से तुम दिखाई देती थी... 

दोनों और फिर ख़ामोशी। इस बार मैंने खामोशी तोड़ते हुए कहा था, "अच्छा सुनो … "

"हाँ … "

"ये हवा में उड़ते तुम्हारे बाल बहुत हसीन लग रहे हैं.… "

"तुम्हे कैसे पता? तुमने कैसे देखा … "

"बस देख लिया … कहते हैं दिलों में भी आँखें होती हैं"

शायद तुम्हारे चाहरे एक कोमल मुस्कान आ गयी थी.। 

बातें यूँही चलती रही और पता ही नहीं चला कब द्वारका मोड़ से मेट्रो राजीव चौक आ गयी.… 

"अच्छा अब काफी टाइम हो गया बात करते …  तो अब फोन कौन रखेगा ?" उधर से आवाज़ आई 

"कोई भी रख दे.… हमने किया तुम रख दो"

इसके बाद भी उसने फोन नहीं रखा था.… 

"हैल्लो "

"हाँ " 

"तुमने फोन नहीं रखा "

"तुमने भी तो नहीं रखा " उधर से वही मीठी आवाज़

"हम्म्म …  पर फोन तो तुम रखने वाली थी.… "

"अच्छा "

"अच्छा"

"तो फिर हम रखते हैं जनाब फोन.… बाय !! "

"बाय !!" 

और फोन कट गया!! 

न जाने आज बात करने के बाद ऐसा कईं लग रहा है की शायद अब बात न होगी!! शायद तुमसे सवाल पूछ गलती कर दी !! शायद अब बात न हो पायेगी !! शायद !!!!! 


( पार्ट -2 )

10 मार्च 2015 

Thursday, March 12, 2015

ईश्वर मेहरबान!!

तीन दिन! तीन बीत चुके है तुम्हारा अभी तक कोई अता-पता नहीं है। कल रात को तुम्हारी मिस कॉल्स ने और भी गहरे चिंतन में डाल दिया। तुम्हे कॉल बेक भी किया पर तुमने फोन नहीं उठाया। लगा शायद थोड़ी देर में वापस कॉल करो पर जब देर रात तक कोई कॉल नहीं आया तो थक का मैं सो गया। पर आज सपने में भी तुम्हारे कॉल का ही इंतज़ार करता रहा औए अगली सुबह तुम्हारी कॉल आई। सामने को हकीकत मान मैं आज जल्दी उठ गया। शायद आज सुबह बात हो जाए। शायद आज तुम्हारा कॉल आ जाए लेकिन अफ़सोस! ऐसा नहीं हुआ।
थक कर मैं बैग उठा ऑफिस के लिए  निकल पड़ा। थोड़ा लेट हो गया था इसलिए ईश्वर से प्रार्थना की कि जल्दी बस मिल जये… और जैस इ भगवन ने मेरी सुन ली!!

मैं बस स्टैंड पहुंचा ही था की पीछे से 824 नंबर की क्लस्टर बस दौड़ी चली आ रही थी.। इतनी ही देर में जेब में कंपन महसूस हुई, जेब में रखा फोन वाइब्रेट कर रहा था। सामने बस थी, हाथ में मोबाइल और मोबाइल पर तुम्हारा कॉल!!

तुम्हारा कॉल डिसिव कर तुम्हे कॉल मिला दिया और भीड़ से भरी बस के गेट पर खड़ा हो तुम्हरी आवाज़ का इंतज़ार करने लगा.… 

"हेलो "
"क्या हाल है "
":बढ़िया हैं"

 इधर एक तरफ  बस के गेट पर ठंडी ठंडी थवाएं शरीर को राहत दे रही तो दूसरी तरफ तुम्हारी आवाज़ दिल को रहत दे रही थी.… 

रोज़ाना खाली जाने वाली बस में आज अचानक इतनी भीड़ हो गयी थी कि एक हाथ से मोबाइल को पकड़ना और दूसरे से गेट को पकड़ बैग के साथ साथ भीड़ में खुद को संभल पाना अत्यंत कठिन हो गया था। बावजूद इसके तुसे फोन पर बात करना सुहावना मालूम हो रहा था। भीड़ की चिल्लाहट में शायद ही तुम मेरी आवाज़ साफ़ तरीके से सुन पायी हो लेकिन जब भी तुम बोलती तो न जाने कैसे इधर तुम्हारी आवाज़ के अलावा  कोई आवाज़ ही न सुनती थी मुझे!! जैसे जैसे बस का सफर आगे बढ़ा भीड़ भी बढ़ती चली गयी और खचा-खच भरी इस बस में फोन पर बात करना उतना ही कठिन होता चला गया। लेकिन बावजूद इसके में फोन कॉल काटना नहीं चाहता था। मुझे मालूम था कि यदि एक बार चल कट गया तो फिर दोबारा कब बात होगी यह निश्चित नही है। इसलिए मैं उस खचा-खच भरी बस में भी तुमसे बातें करता रहना चाहता था। मुझे आशा थी की बस एक बार मेट्रो स्टेशन पहुँच जाऊं तो फिर थोड़ा एकांत मिल जायेगा !! जहाँ तुमसे आराम से बात कर सकूंगा!! 

पर शायद तुम्हे यह एहसास हो गया था की इस वक़्त तुमसे बात करना मेरे लिए कितना मुस्किल है, और तुमने कहा, "आराम से मेट्रो पहुँच कर फोन करना! हम इंतज़ार करेंगे!! " और कॉल कट गया। 

मेट्रो क्या! बस से उतारते ही मैंने तुम्हे वापस कॉल मिला दिया और आज रब इतना मेहरबान था कि तुमने तुरंत ही फोन उठा लिया!!

एक बार फिर बातें शुरू हुई, फिर गुफ्तगू का दौर चल पड़ा! 

मैं आज तक समझ नहीं पाया था कि आखिर हमारे  बीच यह सब क्या चल रहा है ? आखिर क्या है यह!! इसीलिए मेट्रो प्लेटफार्म पर खड़े हो मैंने तुमसे कहा, "एक बात पूछूं ? बुरा तो नहीं मानोगी ?"
"पूछो "
"देखो  बुरा मत मानना और सच सच जवाब देना"
" हाँ पूछो क्या पूछना है "
"तुम मुझसे ऐसे बात क्यों करती हो, मतलब हम ऐसे बात क्यों करते है, कुछ है क्या मतलब.... "
समझ नहीं आ रहा था  क्या कहूँ, दिल ज़ोरों से धड़कने लगा था, और तभी तुम बोली 
"मलूम... 
और प्लेटफार्म पर मेट्रो आ गयी!!  लोग मेट्रो में दाखिल होने के लिए भागने लगे!! शोर मचने लगा और तुम्हारी आवाज़ उस शोर में कहीं।....  !!!

आगे जारी …

(पार्ट 01 )

(कल रात ही यह सब लिखा था पर एन वक़्त पर मोबाइल की बैटरी धोखा दे गयी और सब लिखा हुआ गायब हो गया। इसलिए इसे देरी से पोस्ट कर पाया।)  

10  मार्च 2015 

कॉल का झमेला!!

तीसरा दिन ! आज तीसरा दिन था लेकिन तुम्हारा कहीं कुछ अता पता नहीं है!!

सुबह से ही तुम्हारे बारे में सोच सोच कर माथे पर बल पड़े जा रहा है। सबसे ज्यादा डर तो इस बात  कोई बात तो नहीं हो गयी.…  मन बार बार उड़ कर तुम तक पहुँच जाना चाहता है.। समझ नहीं आ रहा कैसे रोकूँ इसे.… और  तुम्हारे ख्यालातों में ही उलझ कर जब कोई रास्ता नज़र न आया तो तुम्हे एक मैसेज कर डाला 
"No Calls! No Msg! Is evrything alright?"

तुम्हे मैसेज सेंड तो कर दिया पर फिर मन और छलाँगें लगाने लगा! अजीब अजीब तरह के ख्याल आने लगे। तुमसे इतने समय से बात न कर पाने की व्याकुलता तो थी ही लेकिन मैसेज भेजने के बाद एक और डर बढ़ गया। कहीं कोई और न यह मैसेज पढ़ ले। कहीं मेरी लालसा तुम्हारे लिए कोई मुसीबतर न खडी कर दे।

 दोपहर 12 बजे इस मैसेज ने मेरी चिंता और बढ़ा दी। मन पहले से ज्यादा उड़ने लगा। ऑफिस में भी सारा दिन तुम्हारे बारे  ही सोचता रहा। सोचता रहा कहीं मेरे मैसेज से तुम्हे किसी दिक्कत का सामना तो नहीं करना पड़ेगा? तुम्हारे ख्यालों में कब दिन बीत गया पता ही नहीं चला। 

ऑफिस से निकलते वक़्त फोन की घण्टी बजी! एक बार फिर मन बोला तुम्ही ही हो!!

मैं अपना बंद करता बैग छोड़ फोन की तरफ बढ़ा तो देखा तुम्हारा ही मिस कॉल था। दिल में गीत चलने लगे! मोर नाचने लगे! बदल बरसने लगे! और मैंने तुम्हे फोन मिला दिया। पर फोन पर सुनी देती टर-टर से धीरे धीरे गीत बंद हो गया, मोर के कदम रुक गए, बादलों ने बरसना बंद कर दिया, तुमने फोन नहीं उठाया!!

पहले कभी इस समय तुम्हारा कॉल नहीं आया था! आज आया पर बात न हो सकी। मन एक बार फिर तुम्हारे ही ख्यालों में डूबा चला जा रहा था। घर लौटते वक़्त भी बस तुम्हारी ही तस्वीर आँखों के सामने आ रही थी, तुम्हारी फ़िक्र हो रही थी कि तभी प्रिय का मेसेज आया। तुम्हे प्रिय याद है न? मेरा भाई मेरी बहन मेरा दोस्त मेरा दुश्मन! वो ही प्रिय। 

उसका मेसेज जैसे एक तिनके की तरह आया और ख्यालों मैं डूबते रजत को बचा ले गया। जब तुम नही होती तो उससेतुम्हारी उससे बात कर लेता  हूँ कभी कभी। थोड़ी टेंसन कम हो जाती है। :P

आखिरकार! आज कॉल तो आया भले ही मिस कॉल!! पर आया तो! कल कॉल भी आएगा और गीत बजेंगे, मोर नाचेंगे और बादल...

09 मार्च 2015


Monday, March 9, 2015

इंतज़ार! दूसरा दिन!

होली, होली के दिन कहा था तुमने कि तुम्हे हॉस्पिटल जाना है और शायद बात न हो पायेगी! यह सचेहरा उतर आया था मेरा पर जब तुमने कहा, "समय मिला तो शाम को कॉल करेंगे"
तो दिल में एक बार फिर कोई संगीत बजने लगा था। पर अफ़सोस! आज 8 तारिक है। दूसरा दिन! 48 घण्टों से भी ज्यादा का समय बीत चूका है तुम्हारा कोई अता-पता नहीं है। मुझे फ़िक्र हो रही है आखिर कहाँ हो तुम? सब ठीक तो है?
बार बार तुम्हारा ही ख्याल आ रहा है, बार बार तुम आखों के सामने आ खड़ी हो जाती हो और मन! मन एक बार फिर तुमसे बात करने को मचल उठता है। इसी कश्मकश के बीच ऑफिस में बार बार अपने मोबाइल को जेब से निकाल देख लेता हूँ कहीं तुम्हारा कोई कॉल तो नहीं आया है, कोई मेसेज तो नहीं आया है। कहीं तुमने कॉल करी हो और मुझे पता ही न चला हो, कहीं तुम्हारा मेसेज आया हो और मैं देख ही न पाया होऊं! लेकिन! ऐसा कुछ भी नहीं! न कोई कॉल, न क़ोई मेसेज!!
यार! बड़ा कठिन है ऐसा इंतज़ार... खैर, आशावादी हूँ, सो उम्मीद करे बैठा हूँ!

08 मार्च 2015

Saturday, March 7, 2015

डर! खोने का डर!!

ऑफिस का एक दम पीक ऑवर!! काम का ढेर सारा लोड!! हर तरफ भाग दौड़!! कीबोर्ड पर तेज़ी से खटर-पटर करती उँगलियाँ!! और एकाएक अचानक उसके मोबाइल की घण्टी बजना!! घण्टी बजते ही तेज़ी से कीबोर्ड
आज डॉक्टर को दिखाने दूसरे शहर जाना है उसे... तो शायद आज बात न हो पाये... बतया था उसने!! पर मौका मिला तो शाम को मिस कॉल जरूर करेगी... वादा तो नहीं पर कहा जरूर था उसने...
फोन के अचानक बजते ही ब्रिज का ध्यान उसकी बातों पर चला गया! लगा जैसे जिसका इन्तेज़ार था उसी का कॉल हो! पर कॉल घर से थी! फोन उठाया तो उधर से आवाज़ आई...
"ऑफिस से निकले की नहीं..?"
"माँ बस आधे घण्टे और... फिर निकल रहा हूँ.."
"ठीक है! तू घर आजा" कह माँ ने फोन रख दिया।
अक्सर खाना खाते समय मां पूछ लेती है कि कहाँ हूँ? ऑफिस से निकल कि नहीं?
उसे मालूम है जब तक रात के बारह या साढे बारह नहीं बजेंगे मैं घर नहीं आऊंगा तब पर भी वो फोन कर पूछ लेती है। आखिर माँ तो माँ है। 
अभी माँ से बात किये 5-7 मिनट ही हुए थे कि फोन एक बार फिर बजा। पापा का कॉल था। कॉल उठाते है आवाज़ आई,
"टोनी कहाँ है..??"
"पापा अभी ऑफिस... " कह कह ही रहा था कि पाप बोल पड़े," अभी तक ऑफिस में है 10 बज रहे हैं कब निकलेगा...?"
"बस निकल ही रहा हूँ..."
थोड़ी देर बाद फोन फिर बजा। एक बार फिर पाप का कॉल था की ऑफिस से निकला की नहीं ?
ऐसे कर कर के आधे घण्टे में ही मुझे पापा के 6 कॉल्स आए।
मुझे थोड़ी चिंता होने लगी। आखिर मामला क्या है।
"पाप के कॉल्स तो आते हैं लेकिन ऑफिस के समय तभी पापा का कॉल तभी आता है जब वो मुझे किसी मेट्रो स्टेशन से पिक करने वाले होते हैं या फिर जब वो रात घर नहीं आ रहे होते हैं। लेकिन आज पापा घर पर ही थे और वो मुझे पिकअप करने भी नहीं आ रहे थे। फिर आखिर बात क्या है...
अरे यार, पापा हैं वो मेरे... बेटा हूँ मैं उनका... कर लिया होगा फोन... इतना सोचना क्यों!
इन्ही ख्यालों में मैंने जल्दी जल्दी आपन काम खत्म किया और घर के लिए निकल गया। किस्मत ने साथ दिया तो प्रगति मैदान मेट्रो स्टेशन से ही मेट्रो में सीट मिल गयी। सन्डे था तो ज्यादा भीड़ भी नहीं थी।
और सीट पर बैठते ही एक बार फिर फोन कॉल्स और ख्यालों का चक्रव्यूह शुरू हो गया। घर पहुँचते-पहुँचते मुझे पापा और मम्मी के 17 कॉल्स आये। एक दम से आई इतनी सारी कॉल्स ने मुझे ख्यालों के चक्रव्यूह में फंसा लिया। मेरा मन तुम तक उड़ चला।
मुझे लगा "कहीं कोई लफड़ा तो नहीं हो गया। कहीं घर वालो को तुम्हारे बारे में पता तो नहीं चल गया।
आखिर कैसे हो गया ये... वहां तुम्हारे घरवाले क्या कह रहे होंगे...?? आखिर तुम कैसे हैंडल कर रही होगी ये सब?  मैं क्या बोलूंगा घरवालों को... चलो मैं तो जैसे तैसे समझा लूंगा पर क्या तुम समझ पाओगी..." एक एक ख्याल के साथ दिल की धड़कनें तेज़ होती चली गयी। लगता बस अब दिल बाहर निकल आए...
"अगर पता चला गया होगा तो हम क्या करेंगे... कैसे समझायेंगे अपने घर वालों को..." सोच सोच कर मेरा गाला सुखा जा रहा था।
समझ नहीं आ रहा था किससे सलाह लूँ..? किससे मार्गदर्शन की उम्मीद करूँ...? दूर दूर तक तुम्हारे सिवा कोई नज़र नहीं आ रहा था... लगता बस एक बार बात हो जाए तुमसे... आखिर सारा मामला क्या है... दोनों मिलकर सुलझा लेंगे...
पर तुमपर तो इतना पहरा है कि  मैं तुम्हे एक मेसेज तक नहीं कर सकता... इस समय कॉल करने की तो बात ही दूर है..." मेरा गाला सूखे जा रहा था... दिल पूरी ज़ोर से रेल की इंजन की तरह धड़क रहा था...
अपने मन की सँभालने की बहुत कोशिश करी पर जैसे ही ख्यालों के चक्रव्यूह से बाहर निकलने की राह नज़र आती,  घर से आई अगली कॉल मुझे फिर उसी चक्रव्यूह में और भीतर धकेल देती।
किताबों में पढ़े सारी योग-साधनाएं लगा डाली पर ख्यालातों का यह चक्रव्यूह टूटने का नाम ही न लेता। गाला सूखे जा रहा है... दिल फटकर बहर आने को है... पूरा शरीर गर्म हो गया है... ठण्ड की मौसम में भी माथे पर पसीने की बुँदे फुट रही हैं...
पर आखरी योग लगाया और मन को थाम लिया.... पूरा ज़ोर लगा डाला... तब जाकर मन ने उछाल मारना कम किया....
"अगर पता चल भी गया होगा तो क्या... हमने औरों की तरह कुछ गलत तो नहीं किया... और फिर जैसा कि हमारे बीच तय हुआ था हमने थोडा थोडा तो अपने घरवालों को बता ही दिया था... आखिर हमने कोई हदें तो नहीं पार करी थी... हमारे बीच जो भी था शास्वत था! शुद्ध था! मोह-माया, छल-कपट इन सब से ऊपर... और फिर हमने फैसला भी तो किया था कि दोनों एक दूसरे के कैरियर के बीच कभी नहीं आएंगे... यथासंभव एक दूसरे के पूरक होंगे...
पर.. पर क्या ये सब हमारे घरवाले समझेंगे... उन्हें ये समझ आये की हज़ार किलोमीटर की दुरी भी जो काम न कर पायी उसे ये लोग भी न कर पाएंगे...
हाँ... जरूर समझ जायेंगे... शुरू में थोडा गुस्सा होंगे पर जरूर समझ जायेंगे..." और जब इस नतीजे पर पहुंचा तो देखा घर के बाहर खड़ा हूँ।
अब वक़्त था घरवालों को फेस करने का... मामले को समझने का...
गेट की घण्टी बजाई, रोज़ की तरह चहकती हंसती छोटी बहन ने आकर दरवाज़ा खोला...
पापा आगे कमरे में लेटे हुए थे... मम्मी किचन में बर्तन साफ कर रही थी और मैँ... मैं धीरे धीरे अपनी भरी होती सांसों को सँभालते हुए अपनी कमरे की और बढ़ रहा था... की तभी पीछे से आवाज़ आई...
"टोनी ! टोनी आ गया.."
"जी.. जी पापा.."
"खाना खा ले बेटा.."
"जी बस जा रहा हूँ..." एक बार फिर दिल ने तेज़ी से धड़कना शुरू कर दिया... साँस भरी हो रही है... गाला सूखे जा रहा है...
"बेटा कपडे बदलकर, हाथ मुंह दो ले जल्दी... आज दाल पालक बनाई है, लेकर आती हूँ..." मम्मी ने किचन से आवाज़ लगायी...
"हाँ बस बदल रहा..."
"तेरी मम्मी को टेंसन हो जाती है बेटा इतनी लेट मत हुआ कर.." पापा ने आगे कमरे से ही आवाज़ लगायी।
ये सब सुन, ठहर गया मैं... आखिर सच कोई बात है या फिर... ये लोग मुझे बता नहीं रहे...?
"यहाँ तो सब रोज़ की तरह है... सब ठीक है...
फिर क्या तुम्हारे ख्याल मुझमें कुछ यूँ घुस गए है कि मुझे हर वक़्त तुम ही नज़र आती हो..? हर चीज़ में तुम्हारा ही अक्श नज़र आता है..? 
कहीं ऐसा तो नहीं जो लगाव मेरे घरवालों को मुझसे है वो मुझे तुमसे हो गया हो..."
बेशक हमारे कई सौ किलोमीटर का फांसला हो पर अब तुम मुझसे अलग नहीं! मेरे घर से अलग नहीं। अभी यह लिखने से पहले ही तुम्हारे बारे में माँ को फिर बताया... वो हंसती है! कहती तू भोला है!
शायद उसे मेरी बात सच नहीं लगती । पर तुम तो जानती हो यह सब सच है न!
07 मार्च 2015

Friday, March 6, 2015

इन्तेज़ार रहेगा!!

तुम्हें अलविदा कह मैं दिल्ली की ट्रेन पर बैठ तो गया पर मेरा मन अब भी तुम्हारे पास ही है। यह शरीर ही वापस जा रहा था दिल तो तुम्हारे ही पास है... पहली बार लगा की काश! समय यही ठहर जाता, तुम्हे जी भर के निहार लेता, तुम्हारी आँखों में डूब उन तमाम बंदिशों को पढ़ पता जिनका तुमने कभी जिक्र ही नहीं किया। भला करती भी कैसे आखिर तुम पर इतना पहरा जो है। हर सफार में बेसूद हो सो जाने वाले को, इस सफर में नींद की एक झपकी तक न आई! इंतज़ार था! इंतज़ार था किसी के आने का, किसी की आवाज़ का... जो रोक लेती मुझे, जो रोक लेती इस समय को! पर नहीं... दिल्ली की और भागती ट्रेन ने तो जैसे दिल की धड़कनों को ही हल्का कर दिया था। दम घुट रहा था, सांसे भारी हो रही, मन में तुफान उठ रहा था... शायद ये सब तुम्हारे लिए। कम करना छोड़ चुके दिमाग को एकाएक क्या सूझा की जेब से फोन निकाल तुम्हे मेसेज कर डाला
Intezar rahega!
मोबाइल नेटवर्क की लुका-छिपी ने पहली बार मुझे इतना परेशान किया था। हर दो मिनट पर न जाने कितनी बार वो मेसेज बॉक्स में झांक चूका था कि शायद नेटवर्क आ जाए और मेसेज सेंट हो जाए। सदियों की तरह बीते करीब दो घण्टों के बाद तुम्हे मेसेज सेंड हुआ। यूँ तो वो एक मेसेज ही था लेकिन मेरे लिए उससे ज्यादा वो एक उम्मीद की किरण थी... वो उम्मीद जो हर भक्त अपने ईश्वर में देखता है... हर बच्चा अपनी माँ में देखता है...
(04 मार्च 2015)

कोशिश !

ज मन बहुत व्यथित है!! न जाने क्यों पहली बार मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं दीवारों से घिरा खड़ा हूँ! ऐसी बड़ी-बड़ी दीवारों से जोकी अदृश्य होकर भी मुझे रोके हुए है। जब से घर से लौटा हूँ यहाँ मन नहीं लग रहा है! दिल चीख चीखकर रोने को चाहता है! पर आखिर क्यों! इसका कारण मुझे नहीं मालूम!!
पिछले 2 साल!! 2 साल में बहुत वकैये हुए लेकिन ऐसी कोई व्यथा नहीं हुई कि वो चीखना चाहता हो! चिल्लाना चाहता हो! ऐसा लगता है जैसे कोई चीज़ मेरे सामने हो और में उसे हासिल नहीं कर पा रहा हूँ...
ख़ुशी है कि तुम वापस आ गयी! शायद ही मुझे इतनी ख़ुशी किसी और के आने से हुई होगी। किन्तु दिल और दिमाग में बार बार आने वाला एक ही ख्याल मुझे झकझोर कर रख देता है  "सामने खड़ी मेरी मंज़िल को मैं कैसे जीत पाउँगा!"
मालूम नहीं तुम मेरी बातों को समझ भी पा रही हो या नहीं! पर पिछले कुछ दिनों से मन बहुत व्यथित है! परेशान है! उसमे एक दर्द है!! एक दर्द किसी से जुदा हो जाने का! एक डर किसी से बिछुड़ जाने का!!
घर से लौटने पर लग रहा है कि जैसे मेरे सामने खड़ी चुनौतियों का कद अपने आप बड़ा हो गया है! कालचक्र मुंह फाड़े हमारी और बड़ा चला आ रहा है और मैं अपने आपको असहाय व असहज महसूस कर रहा हूँ। मुझे इन अदृश्य दीवारों से निकलने और तुम्हें निकालने की राह नहीं सूझ रही, तुम्हारी मज़बूरियों, तुम्हारी बंदिशों को तोड़ने का मार्ग नहीं दिख रहा... एकदम असहाय!! असहज!!
लेकिन तुम बेफिक्र रहो, मैं आशावादी हूँ! मुझे उम्मीद है कोई न कोई रास्ता जरूर है जो होकर भी हमें नज़र नहीं आ रहा है! जो है पर हम से छुपा है!! उसे हम ढूंढ निकालेंगे! उसे हम खोज निकालेंगे! हम हार नहीं मानेंगें!!
आखिर बच्चन साहब ने कहा है,
" लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती..."
हम कोशिश करेंगे! बार बार कोशिश करेंगें!
06 मार्च 2015