उस दिन के बाद से मनो ज़िन्दग बेरंग हो चली है। लगता है सीने का एक हिस्सा कट कर गिरा जा रहा है। मुझे तुमसे बात करनी है। तुम्हे समझाना है कि कौन सा घर! कैसा घर! मुझे तुम्हे बताना है कि मैं उसी घर की बात कर रहा था की जिसका अस्तित्व तुम्हारी हाँ से ही आया था! तुम्हे उस घर लाने की बात कर रहा था जहाँ आने का तुमने वादा किया था! जहाँ तुम्हारे आने का ख्वाब मैंने सोते जागते देखा है!
उस दिन हमारी बात पूरी न हो सकी। तुम बीच में चली गयी पर मैं, मैं अभी तक वहीं खड़ा हूँ। यह सोचकर खड़ा हूँ कि तुम्हे तुम्हारे सवाल "घर! कौन सा घर?" का जवाब दूंगा। तुम्हे समझाऊंगा। पर अफ़सोस अभी तक तुम्हारा कोई अता-पता नहीं है। रोज़ की ही तरह इस 03 मार्च के बाद मैंने न जाने तुम्हे कितने ब्लेंक मेसेज किए कि शायद एक बार तुम्हे मेरा ख्याल आ जाए और हमारी बात हो जाए पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। तुम्हारा कोई जवाब नहीं आया।
क्या तुम सच में इतनी निष्ठुर हो गयी हो या फिर कोई मज़बूरी है! कोई मज़बूरी ही होगी! हमारे इस रिश्ते में न जाने कितने मजबूरियां है जो हमें चाह कर भी एक नहीं होने देती हैं! तुम्हे घर नहीं आने देती हैं! मुझे नींद नहीं आने देती हैं!
उस दिन के बाद अब मन उदास सा रहता है। मेरी दोस्त मुझे कहती है,"यार तू मोटीवेट अच्छा करता है।"
अब उसे क्या बताऊँ कि यहाँ मेरी जिंदगी में ही मोटिवेशन की कितनी जरुरत है। काश! काश मैं तुम्हे समझा पाता! काश एक बार हमारी फिर बात हो जाती!
अब उसे क्या बताऊँ कि यहाँ मेरी जिंदगी में ही मोटिवेशन की कितनी जरुरत है। काश! काश मैं तुम्हे समझा पाता! काश एक बार हमारी फिर बात हो जाती!
हर सुबह उठाते ही इस उम्मीद से तुम्हे ब्लेंक मेसेज सेंड करता हूँ कि शायद आज हमारी बात हो जाए! शायद तुम्हे समझाने का एक मौका मिल जाए!
पर अफ़सोस ! न कोई जवाब आता है , न ही मैं तुम्हे कुछ समझा पा रहा हूँ। बस अपना सीने में दर्द लिए यूंही घुट-घुट के जिए जा रहा हूँ!!
07 मार्च 2015

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