07 मार्च को तुमने पुछा था कौन सा घर, कैसा घर... तुम यकिन मानोगी कि आज भी जब मेरे कानों में तुम्हारी वह आवाज गूंजती है तो मेरे पैरों तले धरती खिसक जाती है, सामने आंधेरा छा जाता है, सांसे धीमी हो जाती हैं...
ऐसा ही कुछ उस दिन भी हुआ था। बातें ऐसे मोड़ पर छूट गईं थीं जहां से आगे कोई रास्ता मुझे सुझ ही नहीं रहा था। इसलिए उस पूरी रात में मैं बस तुम्हारे ही ख्यालों में खोया रहा। मुझे मालूम था कि तुम्हारे ऐसे सवालों के पीछे तुम्हारा जरूर कोई मकसद रहा होगा। तुमने जरूर कुछ सोचकर ही ऐसे बेरूखी से यह बातें कह डाली होगीं... तुम्हारे मन में भी इस घर आने के लिए हिलोरे जरूर उठते होंगे पर फिर भी ऐसे रवैया क्यों... मैं परेशान हो रहा था। मन था कि बस कैसे भी तुम्हारे पास पहुंच जाऊं, तुम्हें पूछूं कि आखिर ऐसी कौन सी वजह है जो तुम अब इस घर को भूल गई। पर अफसोस यह मीलों की दूरी!!
...........................................................................................................................................................................
तुम्हारी उस बात को 42 से ज्यादा घंटे बीते चुके हैं पर मेरा दिल और दिमाग अब भी वहीं मेरे ऑफिस के टेरेस पर अटका हुआ है जहां तुमने घर आने को लेकर सवाल दाग दिए थे। इन 42 घंटों का एक एक पल मेरे लिए कितना भारी रहा यह शायद तड़प-तड़प कर मरने वाली मछली भी न समझ पाएगी। मैं तुमसे बात करना चाहता था, तुम्हें समझाना चाहता था, तुमपर गुस्सा और तुमसे नाराज भी होना चाहता था पर मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहा था। मैं बेबस, लाचार, असाहय यह सब सहता रहा....
शाम के 7 बजे... रणभूमि में तबदिल हो चुके उस न्यूजरूम में मैं भी बैठा हुआ रोजाना की तरह अपनी खबरों को एडिट किए जा रहा था पर बार बार मेरा हाथ अपने आप उस जेब में चला जा रहा था जिस जेब में पड़े मोबाइल को तुम्हारे कॉल का इंतजार था... और वह वक्त शाम 8 बजे आ ही गया... 90 के दशक का ब्लक एंड व्हाइट न्यूजरूम एकाएक क्लरफूल न्यूजरूम में तब्दिल हो गया, पतझड़ से सावन आ गया... मोरों ने नाचना शुरू कर दिया और उधर से तुम्हारी आवाज आई
'हैल्लो'
यार पता है कितना परेशान हूं मैं यहां....
क्यों क्या हुआ.?
तुम्हें नहीं पता....
और फिर खबरों की रणभूमि से कहीं दूर हम एक बार फिर घर की चर्चा पर लौट आए थे। पूरे 43 मिनट लगे थे तुम्हें वापस घर लाने के लिए तैयार करने में.... तुम भी कम जिद्दी नहीं... एक से एक तर्क दिए थे तुमने.... पर आखिरकार तुमने घर आने की हामी तो भर ही दी....
08 मार्च 2015
ऐसा ही कुछ उस दिन भी हुआ था। बातें ऐसे मोड़ पर छूट गईं थीं जहां से आगे कोई रास्ता मुझे सुझ ही नहीं रहा था। इसलिए उस पूरी रात में मैं बस तुम्हारे ही ख्यालों में खोया रहा। मुझे मालूम था कि तुम्हारे ऐसे सवालों के पीछे तुम्हारा जरूर कोई मकसद रहा होगा। तुमने जरूर कुछ सोचकर ही ऐसे बेरूखी से यह बातें कह डाली होगीं... तुम्हारे मन में भी इस घर आने के लिए हिलोरे जरूर उठते होंगे पर फिर भी ऐसे रवैया क्यों... मैं परेशान हो रहा था। मन था कि बस कैसे भी तुम्हारे पास पहुंच जाऊं, तुम्हें पूछूं कि आखिर ऐसी कौन सी वजह है जो तुम अब इस घर को भूल गई। पर अफसोस यह मीलों की दूरी!!
...........................................................................................................................................................................
तुम्हारी उस बात को 42 से ज्यादा घंटे बीते चुके हैं पर मेरा दिल और दिमाग अब भी वहीं मेरे ऑफिस के टेरेस पर अटका हुआ है जहां तुमने घर आने को लेकर सवाल दाग दिए थे। इन 42 घंटों का एक एक पल मेरे लिए कितना भारी रहा यह शायद तड़प-तड़प कर मरने वाली मछली भी न समझ पाएगी। मैं तुमसे बात करना चाहता था, तुम्हें समझाना चाहता था, तुमपर गुस्सा और तुमसे नाराज भी होना चाहता था पर मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहा था। मैं बेबस, लाचार, असाहय यह सब सहता रहा....
शाम के 7 बजे... रणभूमि में तबदिल हो चुके उस न्यूजरूम में मैं भी बैठा हुआ रोजाना की तरह अपनी खबरों को एडिट किए जा रहा था पर बार बार मेरा हाथ अपने आप उस जेब में चला जा रहा था जिस जेब में पड़े मोबाइल को तुम्हारे कॉल का इंतजार था... और वह वक्त शाम 8 बजे आ ही गया... 90 के दशक का ब्लक एंड व्हाइट न्यूजरूम एकाएक क्लरफूल न्यूजरूम में तब्दिल हो गया, पतझड़ से सावन आ गया... मोरों ने नाचना शुरू कर दिया और उधर से तुम्हारी आवाज आई
'हैल्लो'
यार पता है कितना परेशान हूं मैं यहां....
क्यों क्या हुआ.?
तुम्हें नहीं पता....
और फिर खबरों की रणभूमि से कहीं दूर हम एक बार फिर घर की चर्चा पर लौट आए थे। पूरे 43 मिनट लगे थे तुम्हें वापस घर लाने के लिए तैयार करने में.... तुम भी कम जिद्दी नहीं... एक से एक तर्क दिए थे तुमने.... पर आखिरकार तुमने घर आने की हामी तो भर ही दी....
08 मार्च 2015
No comments:
Post a Comment