Friday, March 6, 2015

इन्तेज़ार रहेगा!!

तुम्हें अलविदा कह मैं दिल्ली की ट्रेन पर बैठ तो गया पर मेरा मन अब भी तुम्हारे पास ही है। यह शरीर ही वापस जा रहा था दिल तो तुम्हारे ही पास है... पहली बार लगा की काश! समय यही ठहर जाता, तुम्हे जी भर के निहार लेता, तुम्हारी आँखों में डूब उन तमाम बंदिशों को पढ़ पता जिनका तुमने कभी जिक्र ही नहीं किया। भला करती भी कैसे आखिर तुम पर इतना पहरा जो है। हर सफार में बेसूद हो सो जाने वाले को, इस सफर में नींद की एक झपकी तक न आई! इंतज़ार था! इंतज़ार था किसी के आने का, किसी की आवाज़ का... जो रोक लेती मुझे, जो रोक लेती इस समय को! पर नहीं... दिल्ली की और भागती ट्रेन ने तो जैसे दिल की धड़कनों को ही हल्का कर दिया था। दम घुट रहा था, सांसे भारी हो रही, मन में तुफान उठ रहा था... शायद ये सब तुम्हारे लिए। कम करना छोड़ चुके दिमाग को एकाएक क्या सूझा की जेब से फोन निकाल तुम्हे मेसेज कर डाला
Intezar rahega!
मोबाइल नेटवर्क की लुका-छिपी ने पहली बार मुझे इतना परेशान किया था। हर दो मिनट पर न जाने कितनी बार वो मेसेज बॉक्स में झांक चूका था कि शायद नेटवर्क आ जाए और मेसेज सेंट हो जाए। सदियों की तरह बीते करीब दो घण्टों के बाद तुम्हे मेसेज सेंड हुआ। यूँ तो वो एक मेसेज ही था लेकिन मेरे लिए उससे ज्यादा वो एक उम्मीद की किरण थी... वो उम्मीद जो हर भक्त अपने ईश्वर में देखता है... हर बच्चा अपनी माँ में देखता है...
(04 मार्च 2015)

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