Friday, April 3, 2015

मिलन की चाह !


 शाम का वक़्त था और धीरे धीरे ऑफिस में रिपोर्टरों का जमावड़ा लगाना शुरू हो गया था। वैसे भी अखबारों में असली काम तो शाम को ही शुरू होता है।


रोज़ की तरह ही एडिटर्स रूम में खबरों के चयन को लेकर मीटिंग चल रही थी। मीटिंग से वापस अपने डेस्क पर आ अपना फोन देखा तो एक मिस कॉल!! कल ही  तुम्हारे बारे में यहाँ लिखा और देखो आज ही तुम्हारा कॉल आ गया। 

आज तुम्हे तुरंत कॉल बेक न कर पाया था। दरअसल मीटिंग में जाने से पहले मैं आज अपना फोन डेस्क पर ही रख चला गया। वापस आकर देखा तो 05:47 पर तुम्हारा मिस कॉल था। तो यह देखते ही तुम्हे कॉल मिला दिया। 

हज़ार किलोमीटर की दूरी से आती तुम्हारी आवाज़ बेरंग ज़िन्दगी में इंद्रधनुष रच देती है, लगता है जैसे कानों में कोई मिश्री घोल रहा हो, प्यासी धरती को पानी सींच रहा हो, धूप में थके मुसाफिर को छांव दे रहा हो!! ऐसा ही लगता है जब भी तुम हज़ार किलोमीटर दूर बैठ मुझे याद कर फोन करती हो। 

आज एकाएक तुम्हे देखने दिल कह बैठा!  वैसे तो तुम्हारा शाश्वत रूप सदा ही मेरी आँखों के सामने रहता है पर फिर भी न जाने क्यों आज तुम्हे जी भर देखने की इच्छा है। 

" आज बड़ा मन हो रहा है तुमसे मिलने का.... कब तक ऐसे फोन पर ही चलता रहेगा..."

"तो आ जाओ मिलने..."

"अगर मैं आ गया तो तुम मिलोगी?" पूछा था मैंने तुमसे
और तुमने कहा था," हाँ पक्का मिलेंगे! कब आ रहे हो?"

तुम्हारा साहस देख रोमांचित हो उठा था मैं। मैं जनता था की तुम्हारे लिए मुझसे मिलना इतना आसान न होगा!!

अपने को सँभालते हुए कहा, "जब तुम कहो..."

"और तुमने तपाक से कह दिया, "अभी आ जाओ..."

"अभी...?"

"हाँ!! अभी.."

तुम्हारे यह कहते ही मुझे ऑफिस का लीव एप्लीकेशन याद आ गया। अभी तो पिछले हफ्ते मैं चार दिन का ऑफ ले मसूरी और ऋषिकेश घूमकर आया हूँ। भला अब कैसे दोबारा छुट्टी मिलेगी। 

"यार मैं आ तो जाऊंगा पर मेरी नौकरी चली जायेगी..." हँसते हुए कहा था मैंने।  


"तो क्या हुआ... तुम नहीं आ सकते हो तुम्हारा मन तो आ सकता है न"

"मन! वो इस बार वहां से वापस आया ही कहाँ था! वो तो वहीं तुम्हारे पास ही रह गया था। "


तुमसे मिलने की दिल बेकरार हुए जा रहा था। ऑफिस तो ऑफिस फिर कॉलेज और घरवालों को भी एडजस्ट करना पड़ेगा इसके लिए। फिर एकाएक ध्यान आया की कॉलेज नै तो एग्जाम है। और इधर तुम्हारा भी 11 को एग्जाम है। तो यदि मैं किसी तरह 11 की सुबह वहां पहुँच जाऊं तो हमारी मुलाकात हो सकती है। 

पर तुम तक पहुचना इतना आसान तो है नहीं। 

ऑफिस में लीव एप्लीकेशन!

कॉलेज एग्जाम !

और घरवाले!!

कुछ न कुछ तो करना पड़ेगा....




( 30 मार्च 2015)

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