तो तय हो चूका था की मुझे 11 मार्च की सुबह तुम्हारे पास किसी भी हाल में पहुंचना ही है। खुदा ने भी साथ दिया और सब मामला फिट हो गया। कॉलेज का लास्ट एग्जाम 10 की बजाय 09 को निकला, ऑफिस से एक वार फिर छुट्टी मिल गयी और घरवाले भी मुझे बाहर भेजने को तैयार हो गए।
अब बस इंतज़ार था तो उस घड़ी का जब मैं तो और तुम साथ होंगे! बेसब्री मुझ पर हावी हुई जा रही थी कि कब हम मिलेंगे! कब मैं तुम्हे बाइक के पीछे बैठा तुम्हारे कॉलेज छोड़ने जाऊंगा! कब मैं जी भर के तुम्हारा दीदार कर सकूँगा!!
ऐसे ही तमाम ख्याली पुलावों की कल्पना करता हुआ मैं फुला न समा रहा था और तभी आज दोपहर तुम्हारा कॉल आ गया।
बातें! प्रेम की वो बातें आज फिर शुरू होने से पहले ही कहीं खो गयी! मैंने तुम्हे बतया था कि मैं 11 को आ रहा हूँ और फिर तुम्हे तुम्हारक एग्जाम सेंटर लेकर चलूँगा। मालूम नहीं यह सुन तुम्हारे दिल में प्रेम का पवित्र कमल खिला था या नहीं पर मैंने जैसे ही कहा," और फिर तुम भी तो जल्द यहाँ, आ रही हो ! हमेशा के लिए! यहाँ हमारे घर!"
"घर! कौन सा घर?" तुमने पूछा था।
तुम्हारा यह सवाल सुनते ही लड़खड़ा गया था मैं। अपने को सँभालते हुए मैंने कहा," मेरे घर, यहाँ दिल्ली। आ रही हो न तुम, हमेशा के लिए"
"हाँ, देखो कभी आएंगे घूमने के लिए"
"घूमने के लिए! एक मिनट! घूमने के लिए... हमेशा रहने के लिए"
"हमेशा रहने के लिए...?? यह तो संभव नहीं है" तुमने कहा था। यह सुनते ही लगा जैसे मेरे पैरों के निचे की जमीन कहीं खिसक गयी!!
"तुमने वादा किया था तुम हमेशा के लिए मेरे साथ रहने आओगी। हम दोनों अपना बुढ़ापा एक साथ काटेंगे।"
"ऐसा कुछ भी संभव नहीं है। ज्यादा से ज्यादा हम वहाँ केवल घूमने के लिए आ सकते हैं।"
"क्यों ऐसे कुछ संभव क्यों नहीं हैं। क्या तुम आना नहीं चाहती" ट्रैक्टरों के इंजन की तरह धड़कते दिल को सँभालते हुए मैंने पूछा।
"मेरे चाहने यह न चाहने से कुछ नहीं होगा। हमरा परिवार, यह समाज कभी हमें एक साथ नहीं होने देगा"
"ऐसा कुछ नहीं है तुम कोशिश तो करो। हिम्मत क्यों हार रही हो"
"हमें पता है यह सम्भव नहीं हो सकता। यह असंभव है।" एक अजीब तरह की झिझक थी तुम्हरी आवाज़ में।
" अरे बाबा! तुम क्यों ऐसा सोचती हो। तुम घर आ रही हो बस! और कुछ नहीं। अभी झुंझलाहट को छुपातेहुए कहा था मैंने।
" घर! कौन सा घर! जैसा हम सोच रहे हैं वो बिलकुल भी संभव नहीं है।"
"अरे बिलकुल सम्भव है... दिक्कत क्या आखिर! हमने सब सोच कर रखा हुआ है..." और मैंने जो कुछ सोच रखा था वो सब तुम्हे सुना डाला। और तुम हमेशा की तरह एक बार फिर चुप चाप सोचती रही।
"मैंने कुछ ज्यादा ही बोल दिया..."
"नहीं नहीं... अच्छा लगा सुनकर कि कोई हमारे बारे में इतना कुछ सोचता है।" तुमने कहा था।
चेहरे पर आई एक छोटी सी मुस्कान के साथ कहा था की तो फिर तुम रही हो न घर!
"घर! कौन सा घर! यह संभव नहीं.... " कहते कहते तुम चली गयी.… तुम्हे किसी ने बुला लिया और मैं अपने ख्याली पुलावों के साथ अपने पैरों के नीचे से खिसकी जमीन तलाशने लगा।
घर! कौन सा घर!
( 03 मार्च 2015)

No comments:
Post a Comment