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Wednesday, July 22, 2015

आ घर लौट चलें!

07 मार्च को तुमने पुछा था कौन सा घर, कैसा घर... तुम यकिन मानोगी कि आज भी जब मेरे कानों में तुम्हारी वह आवाज गूंजती है तो मेरे पैरों तले धरती खिसक जाती है, सामने आंधेरा छा जाता है, सांसे धीमी हो जाती हैं...

ऐसा ही कुछ उस दिन भी हुआ था। बातें ऐसे मोड़ पर छूट गईं थीं जहां से आगे कोई रास्ता मुझे सुझ ही नहीं रहा था। इसलिए उस पूरी रात में मैं बस तुम्हारे ही ख्यालों में खोया रहा। मुझे मालूम था कि तुम्हारे ऐसे सवालों के पीछे तुम्हारा जरूर कोई मकसद रहा होगा। तुमने जरूर कुछ सोचकर ही ऐसे बेरूखी से यह बातें कह डाली होगीं... तुम्हारे मन में भी इस घर आने के लिए हिलोरे जरूर उठते होंगे पर फिर भी ऐसे रवैया क्यों... मैं परेशान हो रहा था। मन था कि बस कैसे भी तुम्हारे पास पहुंच जाऊं, तुम्हें पूछूं कि आखिर ऐसी कौन सी वजह है जो तुम अब इस घर को भूल गई। पर अफसोस यह मीलों की दूरी!!

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तुम्हारी उस बात को 42 से ज्यादा घंटे बीते चुके हैं पर मेरा दिल और दिमाग अब भी वहीं मेरे ऑफिस के टेरेस पर अटका हुआ है जहां तुमने घर आने को लेकर सवाल दाग दिए थे। इन 42 घंटों का एक एक पल मेरे लिए कितना भारी रहा यह शायद तड़प-तड़प कर मरने वाली मछली भी न समझ पाएगी। मैं तुमसे बात करना चाहता था, तुम्हें समझाना चाहता था, तुमपर गुस्सा और तुमसे नाराज भी होना चाहता था पर मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहा था। मैं बेबस, लाचार, असाहय यह सब सहता रहा....

शाम के 7 बजे... रणभूमि में तबदिल हो चुके उस न्यूजरूम में मैं भी बैठा हुआ रोजाना की तरह अपनी खबरों को एडिट किए जा रहा था पर बार बार मेरा हाथ अपने आप उस जेब में चला जा रहा था जिस जेब में पड़े मोबाइल को तुम्हारे कॉल का इंतजार था... और वह वक्त शाम 8 बजे आ ही गया... 90 के दशक का ब्लक एंड व्हाइट न्यूजरूम एकाएक क्लरफूल न्यूजरूम में तब्दिल हो गया, पतझड़ से सावन आ गया... मोरों ने नाचना शुरू कर दिया और उधर से तुम्हारी आवाज आई

'हैल्लो'

यार पता है कितना परेशान हूं मैं यहां....

क्यों क्या हुआ.?

तुम्हें नहीं पता....




और फिर खबरों की रणभूमि से कहीं दूर हम एक बार फिर घर की चर्चा पर लौट आए थे। पूरे 43 मिनट लगे थे तुम्हें वापस घर लाने के लिए तैयार करने में.... तुम भी कम जिद्दी नहीं... एक से एक तर्क दिए थे तुमने.... पर आखिरकार तुमने घर आने की हामी तो भर ही दी....



08 मार्च 2015

Saturday, March 14, 2015

ईश्वर मेहरबान -2

 एक बार फिर बातें शुरू हुई, फिर गुफ्तगू का दौर चल पड़ा! 

मैं आज तक समझ नहीं पाया था कि आखिर हमारे  बीच यह सब क्या चल रहा है ? आखिर क्या है यह!! इसीलिए मेट्रो प्लेटफार्म पर खड़े हो मैंने तुमसे कहा, "एक बात पूछूं ? बुरा तो नहीं मानोगी ?"
"पूछो "
"देखो  बुरा मत मानना और सच सच जवाब देना"
" हाँ पूछो क्या पूछना है "
"तुम मुझसे ऐसे बात क्यों करती हो, मतलब हम ऐसे बात क्यों करते है, कुछ है क्या मतलब.... "
समझ नहीं आ रहा था  क्या कहूँ, दिल ज़ोरों से धड़कने लगा था, और तभी तुम बोली 
"मलूम... 

और प्लेटफार्म पर मेट्रो आ गयी!!  लोग मेट्रो में दाखिल होने के लिए भागने लगे!! शिर मचने लगा और तुम्हारी आवाज़ उस शोर में कहीं…  

मेट्रो में बैठते ही तुमसे तुम्हरा जवाब दोहराने को कहा, 
"मालूम नहीं हमें क्यों करते हैं बात.… "
"नहीं कोई तो कारण होगा … जो हम  ऐसे बात करते है "
"पता नहीं पर अच्छा  लगता है तुमसे बात कर के, अच्छा लगता है कोई हमरे बारे में भी सोचता है"

बातों के साथ मेट्रो आगे बड़े चली जा रही थी... भीड़ बढ़ रही थी …  शोर बढ़ रहा था...

मैं अपनी सीट छोड़ मेट्रो के एक कोने में खड़ा हो शीशे से बाहर झांकता तुमसे बातें करने लगा.… 

"मतलब तुम्हें अच्छा लगता है इसलिए बात होती है और मेरा क्या ? मैं तो तुम्हे फोन भी नहीं कर सकता जब तक तुम न चाहो" अक्सर उसके मिस कॉल आने पर ही मैं  दिल्ली से उससे कॉल किआ करता था। 

"ऐसा नहीं है, तुम्हे पता है यहां के लोग हर वक़्त मुझ पर नज़रें गड़ाए रखते है.… देखते रहते है किससे बात कर रही हूँ.… गलत सोच रखते हैं ये लोग.… इसको लगेगा पता नहीं कौन सी बुरी बातें कर रहे हैं.… " यह कहते कहते उसकी आवाज़ गंभीर हो गयी थी.… वो उत्तेजित हो रही थी। 

"वैसे हम दोनों कौनसी बुरी बात कर रहे हैं, कौन कोई डाका डालने की योजना बना रहे हैं" मेरे यह कहते ही तुम हंसी थी.… तुम्हारी हंसी की खिल-खिलाहट से दिल में एक अजीब सी ठंडक महसूस हुई थी.। 

"अच्छा तो ऐसा कब तक चलेगा … कब तक हम यूँही एक दूसरे से ऐसे छुपते-छुपाते बातें करेंगे" मेट्रो के शीशे से बहार देखते हुए, मैंने पूछा था।  

"मालूम नहीं कब तक चलेगा ऐसा.… "

"अगर किसी दिन बात न हो तो मुझे बहुत फर्क पड़ता है,  दिन भर तुम्हारे बारे में ही सोचता रहता हूँ.… पता नही बात न होने पर तुम्हे कोई फर्क पड़ता भी या नहीं"

"अगर फर्क नहीं पड़ता तो हम तुम्हे कॉल क्यों करते … तुमसे ऐसे बातें क्यों करते"

"काश !! यूँ ही चलता रहे यह सफर"

दोनों और खामोशी थी.… सिर्फ भरी साँसे

कुछ देर बाद वो बोली, "तुम्हें पता है हम कहाँ बैठे हैं "

"कहाँ छत पर हो? "

"हाँ, जहां से तुम्हारा ऊपर वाला रूम एक दम साफ़ दिखाई देता है "

"हम्म। .. " एक मुस्कान आ गयी थी मेरे चेहरे पर 

"तुम्हे याद है, पहले हम यहां छत पर होते थे  और तुम अपने रूम में। … दोनों एक दूसरे को देखते रहते और फोन पर देर तक बात करते थे" 

"हाँ !! कैसे भूल सकता हूँ वो लम्हे!! कितने प्यारा टाइम था वो" कहते हुए मैं मेट्रो से एकाएक ;निकल गांव के उस रूम में पहुँच गया था.। जहाँ से तुम दिखाई देती थी... 

दोनों और फिर ख़ामोशी। इस बार मैंने खामोशी तोड़ते हुए कहा था, "अच्छा सुनो … "

"हाँ … "

"ये हवा में उड़ते तुम्हारे बाल बहुत हसीन लग रहे हैं.… "

"तुम्हे कैसे पता? तुमने कैसे देखा … "

"बस देख लिया … कहते हैं दिलों में भी आँखें होती हैं"

शायद तुम्हारे चाहरे एक कोमल मुस्कान आ गयी थी.। 

बातें यूँही चलती रही और पता ही नहीं चला कब द्वारका मोड़ से मेट्रो राजीव चौक आ गयी.… 

"अच्छा अब काफी टाइम हो गया बात करते …  तो अब फोन कौन रखेगा ?" उधर से आवाज़ आई 

"कोई भी रख दे.… हमने किया तुम रख दो"

इसके बाद भी उसने फोन नहीं रखा था.… 

"हैल्लो "

"हाँ " 

"तुमने फोन नहीं रखा "

"तुमने भी तो नहीं रखा " उधर से वही मीठी आवाज़

"हम्म्म …  पर फोन तो तुम रखने वाली थी.… "

"अच्छा "

"अच्छा"

"तो फिर हम रखते हैं जनाब फोन.… बाय !! "

"बाय !!" 

और फोन कट गया!! 

न जाने आज बात करने के बाद ऐसा कईं लग रहा है की शायद अब बात न होगी!! शायद तुमसे सवाल पूछ गलती कर दी !! शायद अब बात न हो पायेगी !! शायद !!!!! 


( पार्ट -2 )

10 मार्च 2015 

Thursday, March 12, 2015

ईश्वर मेहरबान!!

तीन दिन! तीन बीत चुके है तुम्हारा अभी तक कोई अता-पता नहीं है। कल रात को तुम्हारी मिस कॉल्स ने और भी गहरे चिंतन में डाल दिया। तुम्हे कॉल बेक भी किया पर तुमने फोन नहीं उठाया। लगा शायद थोड़ी देर में वापस कॉल करो पर जब देर रात तक कोई कॉल नहीं आया तो थक का मैं सो गया। पर आज सपने में भी तुम्हारे कॉल का ही इंतज़ार करता रहा औए अगली सुबह तुम्हारी कॉल आई। सामने को हकीकत मान मैं आज जल्दी उठ गया। शायद आज सुबह बात हो जाए। शायद आज तुम्हारा कॉल आ जाए लेकिन अफ़सोस! ऐसा नहीं हुआ।
थक कर मैं बैग उठा ऑफिस के लिए  निकल पड़ा। थोड़ा लेट हो गया था इसलिए ईश्वर से प्रार्थना की कि जल्दी बस मिल जये… और जैस इ भगवन ने मेरी सुन ली!!

मैं बस स्टैंड पहुंचा ही था की पीछे से 824 नंबर की क्लस्टर बस दौड़ी चली आ रही थी.। इतनी ही देर में जेब में कंपन महसूस हुई, जेब में रखा फोन वाइब्रेट कर रहा था। सामने बस थी, हाथ में मोबाइल और मोबाइल पर तुम्हारा कॉल!!

तुम्हारा कॉल डिसिव कर तुम्हे कॉल मिला दिया और भीड़ से भरी बस के गेट पर खड़ा हो तुम्हरी आवाज़ का इंतज़ार करने लगा.… 

"हेलो "
"क्या हाल है "
":बढ़िया हैं"

 इधर एक तरफ  बस के गेट पर ठंडी ठंडी थवाएं शरीर को राहत दे रही तो दूसरी तरफ तुम्हारी आवाज़ दिल को रहत दे रही थी.… 

रोज़ाना खाली जाने वाली बस में आज अचानक इतनी भीड़ हो गयी थी कि एक हाथ से मोबाइल को पकड़ना और दूसरे से गेट को पकड़ बैग के साथ साथ भीड़ में खुद को संभल पाना अत्यंत कठिन हो गया था। बावजूद इसके तुसे फोन पर बात करना सुहावना मालूम हो रहा था। भीड़ की चिल्लाहट में शायद ही तुम मेरी आवाज़ साफ़ तरीके से सुन पायी हो लेकिन जब भी तुम बोलती तो न जाने कैसे इधर तुम्हारी आवाज़ के अलावा  कोई आवाज़ ही न सुनती थी मुझे!! जैसे जैसे बस का सफर आगे बढ़ा भीड़ भी बढ़ती चली गयी और खचा-खच भरी इस बस में फोन पर बात करना उतना ही कठिन होता चला गया। लेकिन बावजूद इसके में फोन कॉल काटना नहीं चाहता था। मुझे मालूम था कि यदि एक बार चल कट गया तो फिर दोबारा कब बात होगी यह निश्चित नही है। इसलिए मैं उस खचा-खच भरी बस में भी तुमसे बातें करता रहना चाहता था। मुझे आशा थी की बस एक बार मेट्रो स्टेशन पहुँच जाऊं तो फिर थोड़ा एकांत मिल जायेगा !! जहाँ तुमसे आराम से बात कर सकूंगा!! 

पर शायद तुम्हे यह एहसास हो गया था की इस वक़्त तुमसे बात करना मेरे लिए कितना मुस्किल है, और तुमने कहा, "आराम से मेट्रो पहुँच कर फोन करना! हम इंतज़ार करेंगे!! " और कॉल कट गया। 

मेट्रो क्या! बस से उतारते ही मैंने तुम्हे वापस कॉल मिला दिया और आज रब इतना मेहरबान था कि तुमने तुरंत ही फोन उठा लिया!!

एक बार फिर बातें शुरू हुई, फिर गुफ्तगू का दौर चल पड़ा! 

मैं आज तक समझ नहीं पाया था कि आखिर हमारे  बीच यह सब क्या चल रहा है ? आखिर क्या है यह!! इसीलिए मेट्रो प्लेटफार्म पर खड़े हो मैंने तुमसे कहा, "एक बात पूछूं ? बुरा तो नहीं मानोगी ?"
"पूछो "
"देखो  बुरा मत मानना और सच सच जवाब देना"
" हाँ पूछो क्या पूछना है "
"तुम मुझसे ऐसे बात क्यों करती हो, मतलब हम ऐसे बात क्यों करते है, कुछ है क्या मतलब.... "
समझ नहीं आ रहा था  क्या कहूँ, दिल ज़ोरों से धड़कने लगा था, और तभी तुम बोली 
"मलूम... 
और प्लेटफार्म पर मेट्रो आ गयी!!  लोग मेट्रो में दाखिल होने के लिए भागने लगे!! शोर मचने लगा और तुम्हारी आवाज़ उस शोर में कहीं।....  !!!

आगे जारी …

(पार्ट 01 )

(कल रात ही यह सब लिखा था पर एन वक़्त पर मोबाइल की बैटरी धोखा दे गयी और सब लिखा हुआ गायब हो गया। इसलिए इसे देरी से पोस्ट कर पाया।)  

10  मार्च 2015