Saturday, March 7, 2015

डर! खोने का डर!!

ऑफिस का एक दम पीक ऑवर!! काम का ढेर सारा लोड!! हर तरफ भाग दौड़!! कीबोर्ड पर तेज़ी से खटर-पटर करती उँगलियाँ!! और एकाएक अचानक उसके मोबाइल की घण्टी बजना!! घण्टी बजते ही तेज़ी से कीबोर्ड
आज डॉक्टर को दिखाने दूसरे शहर जाना है उसे... तो शायद आज बात न हो पाये... बतया था उसने!! पर मौका मिला तो शाम को मिस कॉल जरूर करेगी... वादा तो नहीं पर कहा जरूर था उसने...
फोन के अचानक बजते ही ब्रिज का ध्यान उसकी बातों पर चला गया! लगा जैसे जिसका इन्तेज़ार था उसी का कॉल हो! पर कॉल घर से थी! फोन उठाया तो उधर से आवाज़ आई...
"ऑफिस से निकले की नहीं..?"
"माँ बस आधे घण्टे और... फिर निकल रहा हूँ.."
"ठीक है! तू घर आजा" कह माँ ने फोन रख दिया।
अक्सर खाना खाते समय मां पूछ लेती है कि कहाँ हूँ? ऑफिस से निकल कि नहीं?
उसे मालूम है जब तक रात के बारह या साढे बारह नहीं बजेंगे मैं घर नहीं आऊंगा तब पर भी वो फोन कर पूछ लेती है। आखिर माँ तो माँ है। 
अभी माँ से बात किये 5-7 मिनट ही हुए थे कि फोन एक बार फिर बजा। पापा का कॉल था। कॉल उठाते है आवाज़ आई,
"टोनी कहाँ है..??"
"पापा अभी ऑफिस... " कह कह ही रहा था कि पाप बोल पड़े," अभी तक ऑफिस में है 10 बज रहे हैं कब निकलेगा...?"
"बस निकल ही रहा हूँ..."
थोड़ी देर बाद फोन फिर बजा। एक बार फिर पाप का कॉल था की ऑफिस से निकला की नहीं ?
ऐसे कर कर के आधे घण्टे में ही मुझे पापा के 6 कॉल्स आए।
मुझे थोड़ी चिंता होने लगी। आखिर मामला क्या है।
"पाप के कॉल्स तो आते हैं लेकिन ऑफिस के समय तभी पापा का कॉल तभी आता है जब वो मुझे किसी मेट्रो स्टेशन से पिक करने वाले होते हैं या फिर जब वो रात घर नहीं आ रहे होते हैं। लेकिन आज पापा घर पर ही थे और वो मुझे पिकअप करने भी नहीं आ रहे थे। फिर आखिर बात क्या है...
अरे यार, पापा हैं वो मेरे... बेटा हूँ मैं उनका... कर लिया होगा फोन... इतना सोचना क्यों!
इन्ही ख्यालों में मैंने जल्दी जल्दी आपन काम खत्म किया और घर के लिए निकल गया। किस्मत ने साथ दिया तो प्रगति मैदान मेट्रो स्टेशन से ही मेट्रो में सीट मिल गयी। सन्डे था तो ज्यादा भीड़ भी नहीं थी।
और सीट पर बैठते ही एक बार फिर फोन कॉल्स और ख्यालों का चक्रव्यूह शुरू हो गया। घर पहुँचते-पहुँचते मुझे पापा और मम्मी के 17 कॉल्स आये। एक दम से आई इतनी सारी कॉल्स ने मुझे ख्यालों के चक्रव्यूह में फंसा लिया। मेरा मन तुम तक उड़ चला।
मुझे लगा "कहीं कोई लफड़ा तो नहीं हो गया। कहीं घर वालो को तुम्हारे बारे में पता तो नहीं चल गया।
आखिर कैसे हो गया ये... वहां तुम्हारे घरवाले क्या कह रहे होंगे...?? आखिर तुम कैसे हैंडल कर रही होगी ये सब?  मैं क्या बोलूंगा घरवालों को... चलो मैं तो जैसे तैसे समझा लूंगा पर क्या तुम समझ पाओगी..." एक एक ख्याल के साथ दिल की धड़कनें तेज़ होती चली गयी। लगता बस अब दिल बाहर निकल आए...
"अगर पता चला गया होगा तो हम क्या करेंगे... कैसे समझायेंगे अपने घर वालों को..." सोच सोच कर मेरा गाला सुखा जा रहा था।
समझ नहीं आ रहा था किससे सलाह लूँ..? किससे मार्गदर्शन की उम्मीद करूँ...? दूर दूर तक तुम्हारे सिवा कोई नज़र नहीं आ रहा था... लगता बस एक बार बात हो जाए तुमसे... आखिर सारा मामला क्या है... दोनों मिलकर सुलझा लेंगे...
पर तुमपर तो इतना पहरा है कि  मैं तुम्हे एक मेसेज तक नहीं कर सकता... इस समय कॉल करने की तो बात ही दूर है..." मेरा गाला सूखे जा रहा था... दिल पूरी ज़ोर से रेल की इंजन की तरह धड़क रहा था...
अपने मन की सँभालने की बहुत कोशिश करी पर जैसे ही ख्यालों के चक्रव्यूह से बाहर निकलने की राह नज़र आती,  घर से आई अगली कॉल मुझे फिर उसी चक्रव्यूह में और भीतर धकेल देती।
किताबों में पढ़े सारी योग-साधनाएं लगा डाली पर ख्यालातों का यह चक्रव्यूह टूटने का नाम ही न लेता। गाला सूखे जा रहा है... दिल फटकर बहर आने को है... पूरा शरीर गर्म हो गया है... ठण्ड की मौसम में भी माथे पर पसीने की बुँदे फुट रही हैं...
पर आखरी योग लगाया और मन को थाम लिया.... पूरा ज़ोर लगा डाला... तब जाकर मन ने उछाल मारना कम किया....
"अगर पता चल भी गया होगा तो क्या... हमने औरों की तरह कुछ गलत तो नहीं किया... और फिर जैसा कि हमारे बीच तय हुआ था हमने थोडा थोडा तो अपने घरवालों को बता ही दिया था... आखिर हमने कोई हदें तो नहीं पार करी थी... हमारे बीच जो भी था शास्वत था! शुद्ध था! मोह-माया, छल-कपट इन सब से ऊपर... और फिर हमने फैसला भी तो किया था कि दोनों एक दूसरे के कैरियर के बीच कभी नहीं आएंगे... यथासंभव एक दूसरे के पूरक होंगे...
पर.. पर क्या ये सब हमारे घरवाले समझेंगे... उन्हें ये समझ आये की हज़ार किलोमीटर की दुरी भी जो काम न कर पायी उसे ये लोग भी न कर पाएंगे...
हाँ... जरूर समझ जायेंगे... शुरू में थोडा गुस्सा होंगे पर जरूर समझ जायेंगे..." और जब इस नतीजे पर पहुंचा तो देखा घर के बाहर खड़ा हूँ।
अब वक़्त था घरवालों को फेस करने का... मामले को समझने का...
गेट की घण्टी बजाई, रोज़ की तरह चहकती हंसती छोटी बहन ने आकर दरवाज़ा खोला...
पापा आगे कमरे में लेटे हुए थे... मम्मी किचन में बर्तन साफ कर रही थी और मैँ... मैं धीरे धीरे अपनी भरी होती सांसों को सँभालते हुए अपनी कमरे की और बढ़ रहा था... की तभी पीछे से आवाज़ आई...
"टोनी ! टोनी आ गया.."
"जी.. जी पापा.."
"खाना खा ले बेटा.."
"जी बस जा रहा हूँ..." एक बार फिर दिल ने तेज़ी से धड़कना शुरू कर दिया... साँस भरी हो रही है... गाला सूखे जा रहा है...
"बेटा कपडे बदलकर, हाथ मुंह दो ले जल्दी... आज दाल पालक बनाई है, लेकर आती हूँ..." मम्मी ने किचन से आवाज़ लगायी...
"हाँ बस बदल रहा..."
"तेरी मम्मी को टेंसन हो जाती है बेटा इतनी लेट मत हुआ कर.." पापा ने आगे कमरे से ही आवाज़ लगायी।
ये सब सुन, ठहर गया मैं... आखिर सच कोई बात है या फिर... ये लोग मुझे बता नहीं रहे...?
"यहाँ तो सब रोज़ की तरह है... सब ठीक है...
फिर क्या तुम्हारे ख्याल मुझमें कुछ यूँ घुस गए है कि मुझे हर वक़्त तुम ही नज़र आती हो..? हर चीज़ में तुम्हारा ही अक्श नज़र आता है..? 
कहीं ऐसा तो नहीं जो लगाव मेरे घरवालों को मुझसे है वो मुझे तुमसे हो गया हो..."
बेशक हमारे कई सौ किलोमीटर का फांसला हो पर अब तुम मुझसे अलग नहीं! मेरे घर से अलग नहीं। अभी यह लिखने से पहले ही तुम्हारे बारे में माँ को फिर बताया... वो हंसती है! कहती तू भोला है!
शायद उसे मेरी बात सच नहीं लगती । पर तुम तो जानती हो यह सब सच है न!
07 मार्च 2015

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