आज मन बहुत व्यथित है!! न जाने क्यों पहली बार मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं दीवारों से घिरा खड़ा हूँ! ऐसी बड़ी-बड़ी दीवारों से जोकी अदृश्य होकर भी मुझे रोके हुए है। जब से घर से लौटा हूँ यहाँ मन नहीं लग रहा है! दिल चीख चीखकर रोने को चाहता है! पर आखिर क्यों! इसका कारण मुझे नहीं मालूम!!
पिछले 2 साल!! 2 साल में बहुत वकैये हुए लेकिन ऐसी कोई व्यथा नहीं हुई कि वो चीखना चाहता हो! चिल्लाना चाहता हो! ऐसा लगता है जैसे कोई चीज़ मेरे सामने हो और में उसे हासिल नहीं कर पा रहा हूँ...
ख़ुशी है कि तुम वापस आ गयी! शायद ही मुझे इतनी ख़ुशी किसी और के आने से हुई होगी। किन्तु दिल और दिमाग में बार बार आने वाला एक ही ख्याल मुझे झकझोर कर रख देता है "सामने खड़ी मेरी मंज़िल को मैं कैसे जीत पाउँगा!"
मालूम नहीं तुम मेरी बातों को समझ भी पा रही हो या नहीं! पर पिछले कुछ दिनों से मन बहुत व्यथित है! परेशान है! उसमे एक दर्द है!! एक दर्द किसी से जुदा हो जाने का! एक डर किसी से बिछुड़ जाने का!!
घर से लौटने पर लग रहा है कि जैसे मेरे सामने खड़ी चुनौतियों का कद अपने आप बड़ा हो गया है! कालचक्र मुंह फाड़े हमारी और बड़ा चला आ रहा है और मैं अपने आपको असहाय व असहज महसूस कर रहा हूँ। मुझे इन अदृश्य दीवारों से निकलने और तुम्हें निकालने की राह नहीं सूझ रही, तुम्हारी मज़बूरियों, तुम्हारी बंदिशों को तोड़ने का मार्ग नहीं दिख रहा... एकदम असहाय!! असहज!!
लेकिन तुम बेफिक्र रहो, मैं आशावादी हूँ! मुझे उम्मीद है कोई न कोई रास्ता जरूर है जो होकर भी हमें नज़र नहीं आ रहा है! जो है पर हम से छुपा है!! उसे हम ढूंढ निकालेंगे! उसे हम खोज निकालेंगे! हम हार नहीं मानेंगें!!
आखिर बच्चन साहब ने कहा है,
" लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती..."
" लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती..."
हम कोशिश करेंगे! बार बार कोशिश करेंगें!
06 मार्च 2015
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