और सातवां दिन भी आज बीत गया! अब तो जैसे आदत सी हो गयी है तुम्हारे कॉल के इंतज़ार में बैठे रहने की। मालूम है निष्ठुर हो गयी हो! कॉल क्या एक मेसेज तक नहीं करोगी तो भी ये दिल तुम्हारा इंतज़ार करता रहता है!
जब घर पर था तो सोचा था कि अगर तुमसे ढाई साल बाद भी बिना बात करे ही चला जाऊंगा तो दिल्ली में शायद काम ही नहीं कर पाउँगा! मन ही नहीं लगेगा! लेकिन तुमसे बात भी हुई और अब यहाँ मन भी नहीं लग रहा है।
शारीर एक ही है लेकिन इसके अंदर कई रजत कई टोनी हो गए है! एक रजत एक टोनी वो जो सब भूल बस काम काम और काम में लगा रहना चाहता है । तो दूसरा वो टोनी, वो रजत है जो बार बार तुम्हे सोच मुस्कुरा लेता है!
तुम्हे अपने पास होने की कल्पना करता है पर जब कल्पना टूटी है तो वो भी टूट जाता है।
कई बार मन में एक संशय जन्म लेता है कहीं तुम मुझे मझदार में अकेला छोड़ कहीं दूर तो नहीं निकल पड़ी! ऐसे सोच सोच मेरा दिल कटा जाता है! लगता है जैसे कोई धारदार आरी से उसे काटे जा रहा है और मैं रो भी न पा रहा हूँ! फिर मन में दूसरा विचार आता है तुम तो समझदार हो, यदि ऐसा फैसला भी किया होगा तो मुझसे तो जरूर बताती कि अब आगे बात न होगी! अब आगे बात न बढेगी!
लेकिन तुमने तो ऐसा भी कोई संकेत न दिया! अब तुम्हारी इस रुसवाई को क्या समझूँ मैं!
कहीं तुम यह तो नहीं मान बैठी की हमारे बीच जो भी था मालूम नही कुछ था भी या नहीं! 10 तारीख को जब तुमसे ये पूछा था, तभी मैं डर गया था कि कहीं तुम इसके बाद मुझसे बात ही न करोगी! और देखो वही यथावत वो रहा है।
माफ़ करना पापा का कॉल आ रहा है!! बात करके वापस आता हूँ !
रस्ते में हैं! कहा है उत्तम नगर से पिक करलेंगे! तो अब वहीं उतरना है। घर लेट पहुँचता हूँ तो घर वालों को टेंशन हो जाती है तो फोन कर के खोज खबर ले लेते है और पापा आप-पास होते है तो अपने साथ ही घर लिए चलते हैं।
खैर, कहाँ था मैं... हाँ! मन के चक्रव्युह के बारे में बता रहा था तुम्हे! डर लगता है कहीं तू मेरे उसी सवाल से नाराज हो! या फिर ऐसा तो नहीं तुम सवाल का जवाब जानती थी! वो ही जवाब जो मेरे दिल में है! पर तुम उसे जगजाहिर न होने देने के लिए ऐसा कदम उठा रही हो! मुझे नज़र अंदाज़ कर रही हो!! देखो यह तो तय है हमारे बीच कुछ न कुछ तो जरूर है। लेकिन क्या है इसे ही तो हम तलाश रहे हैं। और अगर तुम्हे लगता है यह एक तरह का आकर्षण मात्र है तो तुम सरासर गलत हो। यह किसी एक बच्चे का किसी खिलौने के तरफ आकर्षण नहीं है। यह वह है जो शास्वत है! शुद्ध है! पवित्र है! हाँ ये वही है जो जाने अनजाने कितनी बार मेरे मन में आया! तुम्हारे भी मन में जरूर आया होगा। तभी मेरी आज यह हालात है।
पता नहीं क्यों तुम्हारे बारे में सोच सोचकर मन भारी हुआ जाता है! ख़ुशी के साथ दिल में एक अजीब सा दर्द जाग उठता है... पता नहीं तुम यह सब कभी पढ़ भी पाओगी या नहीं पर अब एक यही तो यहाँ बेफिक्री से मैं तुम्हारी बातें कर सकता हूँ! तुम्हे याद कर सकता हूँ। मालूम नहीं तुम वहां क्या महसूस करती हो! क्या मालूम जो मैंने सोचा हो उससे तुम इतफ़ाक भी न रखो पर मैं! मैं तो आशावादी हूँ! आशा है और अंतिम साँस तक रहेगी! तुम्हारे आने की आशा! तुमसे मिलने की आशा!!
ऐसे में कुमार विश्वास की कविताएँ और दिल में हड़बड़ी मैच देती हैं। उनकी लिखी कुछ पंक्तियाँ हैं-
तुम अगर नहीं आई, गीत गा ना पाऊंगा...
सांस साथ छोड़ेगी, सुर सजा ना पाऊंगा...
तान भावना की है, शब्द शब्द दर्पण हैं...
बांसुरी चली आओ, होंठ का निमंत्रण है...
सच ही कह रही हैं यह पंक्तियाँ! जिस दिन तुम न आ सकोगी उस दिन कहाँ यह लिख पाऊंगा! कहाँ कलम चलेगी! अभी तो तुम्हारे आने की उम्मीद बाकी है। जब वह भी टूट जायेगी तो यह जीवन भी टूट ही जायेगा!!!
तुम बिन हथेली की हर लकीर प्यासी है,
तीर पार कान्हा से दूर राधिका सी है,
दूरियां समझती हैं दर्द कैसे सहना है,
आँख लाख चाहे पर होंठ को ना कहना है...
औषधि चली आओ, चोट का निमंत्रण है...
बांसुरी चली आओ, होंठ का निमंत्रण है...
तुम अलग हुई मुझसे सांस की खताओं से...
भूख की दलीलों से, वक़्त की सजाओं से...
रात की उदासी को आंसुओं ने झेला है...
कुछ गलत न कर बैठे, मन बहुत अकेला है,
कचन कसौटी की खोट का निमंत्रण है,
बांसुरी चली आओ, होंठ का निमन्त्रण है...
बांसुरी चली आओ, होंठ का निमन्त्रण है...
17 मार्च 2015
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