एक बार फिर बातें शुरू हुई, फिर गुफ्तगू का दौर चल पड़ा!
मैं आज तक समझ नहीं पाया था कि आखिर हमारे बीच यह सब क्या चल रहा है ? आखिर क्या है यह!! इसीलिए मेट्रो प्लेटफार्म पर खड़े हो मैंने तुमसे कहा, "एक बात पूछूं ? बुरा तो नहीं मानोगी ?"
"पूछो "
"देखो बुरा मत मानना और सच सच जवाब देना"
" हाँ पूछो क्या पूछना है "
"तुम मुझसे ऐसे बात क्यों करती हो, मतलब हम ऐसे बात क्यों करते है, कुछ है क्या मतलब.... "
समझ नहीं आ रहा था क्या कहूँ, दिल ज़ोरों से धड़कने लगा था, और तभी तुम बोली
"मलूम...
और प्लेटफार्म पर मेट्रो आ गयी!! लोग मेट्रो में दाखिल होने के लिए भागने लगे!! शिर मचने लगा और तुम्हारी आवाज़ उस शोर में कहीं…
मेट्रो में बैठते ही तुमसे तुम्हरा जवाब दोहराने को कहा,
"मालूम नहीं हमें क्यों करते हैं बात.… "
"नहीं कोई तो कारण होगा … जो हम ऐसे बात करते है "
"पता नहीं पर अच्छा लगता है तुमसे बात कर के, अच्छा लगता है कोई हमरे बारे में भी सोचता है"
बातों के साथ मेट्रो आगे बड़े चली जा रही थी... भीड़ बढ़ रही थी … शोर बढ़ रहा था...
मैं अपनी सीट छोड़ मेट्रो के एक कोने में खड़ा हो शीशे से बाहर झांकता तुमसे बातें करने लगा.…
"मतलब तुम्हें अच्छा लगता है इसलिए बात होती है और मेरा क्या ? मैं तो तुम्हे फोन भी नहीं कर सकता जब तक तुम न चाहो" अक्सर उसके मिस कॉल आने पर ही मैं दिल्ली से उससे कॉल किआ करता था।
"ऐसा नहीं है, तुम्हे पता है यहां के लोग हर वक़्त मुझ पर नज़रें गड़ाए रखते है.… देखते रहते है किससे बात कर रही हूँ.… गलत सोच रखते हैं ये लोग.… इसको लगेगा पता नहीं कौन सी बुरी बातें कर रहे हैं.… " यह कहते कहते उसकी आवाज़ गंभीर हो गयी थी.… वो उत्तेजित हो रही थी।
"वैसे हम दोनों कौनसी बुरी बात कर रहे हैं, कौन कोई डाका डालने की योजना बना रहे हैं" मेरे यह कहते ही तुम हंसी थी.… तुम्हारी हंसी की खिल-खिलाहट से दिल में एक अजीब सी ठंडक महसूस हुई थी.।
"अच्छा तो ऐसा कब तक चलेगा … कब तक हम यूँही एक दूसरे से ऐसे छुपते-छुपाते बातें करेंगे" मेट्रो के शीशे से बहार देखते हुए, मैंने पूछा था।
"मालूम नहीं कब तक चलेगा ऐसा.… "
"अगर किसी दिन बात न हो तो मुझे बहुत फर्क पड़ता है, दिन भर तुम्हारे बारे में ही सोचता रहता हूँ.… पता नही बात न होने पर तुम्हे कोई फर्क पड़ता भी या नहीं"
"अगर फर्क नहीं पड़ता तो हम तुम्हे कॉल क्यों करते … तुमसे ऐसे बातें क्यों करते"
"काश !! यूँ ही चलता रहे यह सफर"
दोनों और खामोशी थी.… सिर्फ भरी साँसे
कुछ देर बाद वो बोली, "तुम्हें पता है हम कहाँ बैठे हैं "
"कहाँ छत पर हो? "
"हाँ, जहां से तुम्हारा ऊपर वाला रूम एक दम साफ़ दिखाई देता है "
"हम्म। .. " एक मुस्कान आ गयी थी मेरे चेहरे पर
"तुम्हे याद है, पहले हम यहां छत पर होते थे और तुम अपने रूम में। … दोनों एक दूसरे को देखते रहते और फोन पर देर तक बात करते थे"
"हाँ !! कैसे भूल सकता हूँ वो लम्हे!! कितने प्यारा टाइम था वो" कहते हुए मैं मेट्रो से एकाएक ;निकल गांव के उस रूम में पहुँच गया था.। जहाँ से तुम दिखाई देती थी...
दोनों और फिर ख़ामोशी। इस बार मैंने खामोशी तोड़ते हुए कहा था, "अच्छा सुनो … "
"हाँ … "
"ये हवा में उड़ते तुम्हारे बाल बहुत हसीन लग रहे हैं.… "
"तुम्हे कैसे पता? तुमने कैसे देखा … "
"बस देख लिया … कहते हैं दिलों में भी आँखें होती हैं"
शायद तुम्हारे चाहरे एक कोमल मुस्कान आ गयी थी.।
बातें यूँही चलती रही और पता ही नहीं चला कब द्वारका मोड़ से मेट्रो राजीव चौक आ गयी.…
"अच्छा अब काफी टाइम हो गया बात करते … तो अब फोन कौन रखेगा ?" उधर से आवाज़ आई
"कोई भी रख दे.… हमने किया तुम रख दो"
इसके बाद भी उसने फोन नहीं रखा था.…
"हैल्लो "
"हाँ "
"तुमने फोन नहीं रखा "
"तुमने भी तो नहीं रखा " उधर से वही मीठी आवाज़
"हम्म्म … पर फोन तो तुम रखने वाली थी.… "
"अच्छा "
"अच्छा"
"तो फिर हम रखते हैं जनाब फोन.… बाय !! "
"बाय !!"
और फोन कट गया!!
न जाने आज बात करने के बाद ऐसा कईं लग रहा है की शायद अब बात न होगी!! शायद तुमसे सवाल पूछ गलती कर दी !! शायद अब बात न हो पायेगी !! शायद !!!!!
( पार्ट -2 )
10 मार्च 2015

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