Wednesday, July 22, 2015

आ घर लौट चलें!

07 मार्च को तुमने पुछा था कौन सा घर, कैसा घर... तुम यकिन मानोगी कि आज भी जब मेरे कानों में तुम्हारी वह आवाज गूंजती है तो मेरे पैरों तले धरती खिसक जाती है, सामने आंधेरा छा जाता है, सांसे धीमी हो जाती हैं...

ऐसा ही कुछ उस दिन भी हुआ था। बातें ऐसे मोड़ पर छूट गईं थीं जहां से आगे कोई रास्ता मुझे सुझ ही नहीं रहा था। इसलिए उस पूरी रात में मैं बस तुम्हारे ही ख्यालों में खोया रहा। मुझे मालूम था कि तुम्हारे ऐसे सवालों के पीछे तुम्हारा जरूर कोई मकसद रहा होगा। तुमने जरूर कुछ सोचकर ही ऐसे बेरूखी से यह बातें कह डाली होगीं... तुम्हारे मन में भी इस घर आने के लिए हिलोरे जरूर उठते होंगे पर फिर भी ऐसे रवैया क्यों... मैं परेशान हो रहा था। मन था कि बस कैसे भी तुम्हारे पास पहुंच जाऊं, तुम्हें पूछूं कि आखिर ऐसी कौन सी वजह है जो तुम अब इस घर को भूल गई। पर अफसोस यह मीलों की दूरी!!

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तुम्हारी उस बात को 42 से ज्यादा घंटे बीते चुके हैं पर मेरा दिल और दिमाग अब भी वहीं मेरे ऑफिस के टेरेस पर अटका हुआ है जहां तुमने घर आने को लेकर सवाल दाग दिए थे। इन 42 घंटों का एक एक पल मेरे लिए कितना भारी रहा यह शायद तड़प-तड़प कर मरने वाली मछली भी न समझ पाएगी। मैं तुमसे बात करना चाहता था, तुम्हें समझाना चाहता था, तुमपर गुस्सा और तुमसे नाराज भी होना चाहता था पर मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहा था। मैं बेबस, लाचार, असाहय यह सब सहता रहा....

शाम के 7 बजे... रणभूमि में तबदिल हो चुके उस न्यूजरूम में मैं भी बैठा हुआ रोजाना की तरह अपनी खबरों को एडिट किए जा रहा था पर बार बार मेरा हाथ अपने आप उस जेब में चला जा रहा था जिस जेब में पड़े मोबाइल को तुम्हारे कॉल का इंतजार था... और वह वक्त शाम 8 बजे आ ही गया... 90 के दशक का ब्लक एंड व्हाइट न्यूजरूम एकाएक क्लरफूल न्यूजरूम में तब्दिल हो गया, पतझड़ से सावन आ गया... मोरों ने नाचना शुरू कर दिया और उधर से तुम्हारी आवाज आई

'हैल्लो'

यार पता है कितना परेशान हूं मैं यहां....

क्यों क्या हुआ.?

तुम्हें नहीं पता....




और फिर खबरों की रणभूमि से कहीं दूर हम एक बार फिर घर की चर्चा पर लौट आए थे। पूरे 43 मिनट लगे थे तुम्हें वापस घर लाने के लिए तैयार करने में.... तुम भी कम जिद्दी नहीं... एक से एक तर्क दिए थे तुमने.... पर आखिरकार तुमने घर आने की हामी तो भर ही दी....



08 मार्च 2015

Thursday, April 16, 2015

मौका!

उस दिन के बाद से मनो ज़िन्दग बेरंग हो चली है। लगता है सीने का एक हिस्सा कट कर गिरा जा रहा है। मुझे तुमसे बात करनी है। तुम्हे समझाना है कि कौन सा घर! कैसा घर! मुझे तुम्हे बताना है कि मैं उसी घर की बात कर रहा था की जिसका अस्तित्व तुम्हारी हाँ से ही आया था! तुम्हे उस घर लाने की बात कर रहा था जहाँ आने का तुमने वादा किया था! जहाँ तुम्हारे आने का ख्वाब मैंने सोते जागते देखा है!

उस दिन हमारी बात पूरी न हो सकी। तुम बीच में चली गयी पर मैं, मैं अभी तक वहीं खड़ा हूँ। यह सोचकर खड़ा हूँ कि तुम्हे तुम्हारे सवाल "घर! कौन सा घर?" का जवाब दूंगा। तुम्हे समझाऊंगा। पर अफ़सोस अभी तक तुम्हारा कोई अता-पता नहीं है। रोज़ की ही तरह इस 03 मार्च के बाद मैंने न जाने तुम्हे कितने ब्लेंक मेसेज किए कि शायद एक बार तुम्हे मेरा ख्याल आ जाए और हमारी बात हो जाए पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। तुम्हारा कोई जवाब नहीं आया।

क्या तुम सच में इतनी निष्ठुर हो गयी हो या फिर कोई मज़बूरी है! कोई मज़बूरी ही होगी! हमारे इस रिश्ते में न जाने कितने मजबूरियां है जो हमें चाह कर भी एक नहीं होने देती हैं! तुम्हे घर नहीं आने देती हैं! मुझे नींद नहीं आने देती हैं!

उस दिन के बाद अब मन उदास सा रहता है। मेरी दोस्त मुझे कहती है,"यार तू मोटीवेट अच्छा करता है।"
अब उसे क्या बताऊँ कि यहाँ मेरी जिंदगी में ही मोटिवेशन की कितनी जरुरत है। काश! काश मैं तुम्हे समझा पाता! काश एक बार हमारी फिर बात हो जाती!

हर सुबह उठाते ही इस उम्मीद से  तुम्हे ब्लेंक मेसेज सेंड करता हूँ कि शायद आज हमारी बात हो जाए! शायद तुम्हे समझाने का एक मौका मिल जाए!

पर अफ़सोस ! न कोई जवाब आता है , न ही मैं तुम्हे कुछ समझा पा रहा हूँ। बस अपना सीने में दर्द लिए यूंही घुट-घुट के जिए जा रहा हूँ!!

07 मार्च 2015

Saturday, April 11, 2015

घर ? कौन सा घर ?

तो तय हो चूका था की मुझे 11 मार्च की सुबह तुम्हारे पास किसी भी हाल में पहुंचना ही है। खुदा ने भी साथ दिया और सब मामला फिट हो गया। कॉलेज का लास्ट एग्जाम 10 की बजाय 09 को निकला, ऑफिस से एक वार फिर छुट्टी मिल गयी और घरवाले भी मुझे बाहर भेजने को तैयार हो गए।

अब बस इंतज़ार था तो उस घड़ी का जब मैं तो और तुम साथ होंगे! बेसब्री मुझ पर हावी हुई जा रही थी कि कब हम मिलेंगे! कब मैं तुम्हे बाइक के पीछे बैठा तुम्हारे कॉलेज छोड़ने जाऊंगा! कब मैं जी भर के तुम्हारा दीदार कर सकूँगा!!

ऐसे ही तमाम ख्याली पुलावों की कल्पना करता हुआ मैं फुला न समा रहा था और तभी आज दोपहर तुम्हारा कॉल आ गया।

बातें! प्रेम की वो बातें आज फिर शुरू होने से पहले ही कहीं खो गयी! मैंने तुम्हे बतया था कि मैं 11 को आ रहा हूँ और फिर तुम्हे तुम्हारक एग्जाम सेंटर लेकर चलूँगा। मालूम नहीं यह सुन तुम्हारे दिल में प्रेम का पवित्र कमल खिला था या नहीं पर मैंने जैसे ही कहा," और फिर तुम भी तो जल्द यहाँ, आ रही हो ! हमेशा के लिए! यहाँ हमारे घर!"

"घर! कौन सा घर?" तुमने पूछा था।

तुम्हारा यह सवाल सुनते ही लड़खड़ा गया था मैं। अपने को सँभालते हुए मैंने कहा," मेरे घर, यहाँ दिल्ली। आ रही हो न तुम, हमेशा के लिए"

"हाँ, देखो कभी आएंगे घूमने के लिए"

"घूमने के लिए! एक मिनट! घूमने के लिए... हमेशा रहने के लिए"

"हमेशा रहने के लिए...?? यह तो संभव नहीं है" तुमने कहा था। यह सुनते ही लगा जैसे मेरे पैरों के निचे की जमीन कहीं खिसक गयी!!

"तुमने वादा किया था तुम हमेशा के लिए मेरे साथ रहने आओगी। हम दोनों अपना बुढ़ापा एक साथ काटेंगे।"

"ऐसा कुछ भी संभव नहीं है। ज्यादा से ज्यादा हम वहाँ केवल घूमने के लिए आ सकते हैं।"

"क्यों ऐसे कुछ संभव क्यों नहीं हैं। क्या तुम आना नहीं चाहती" ट्रैक्टरों के इंजन की तरह धड़कते दिल को सँभालते हुए मैंने पूछा।

"मेरे चाहने यह न चाहने से कुछ नहीं होगा। हमरा परिवार, यह समाज कभी हमें एक साथ नहीं होने देगा"

"ऐसा कुछ नहीं है तुम कोशिश तो करो। हिम्मत क्यों हार रही हो"

"हमें पता है यह सम्भव नहीं हो सकता। यह असंभव है।" एक अजीब तरह की झिझक थी तुम्हरी आवाज़ में।

" अरे बाबा! तुम क्यों ऐसा सोचती हो। तुम घर आ रही हो बस! और कुछ नहीं। अभी झुंझलाहट को छुपातेहुए कहा था मैंने।

" घर! कौन सा घर! जैसा हम सोच रहे हैं वो बिलकुल भी संभव नहीं है।"

"अरे बिलकुल सम्भव है... दिक्कत क्या आखिर! हमने सब सोच कर रखा हुआ है..."  और मैंने जो कुछ सोच रखा था वो सब तुम्हे सुना डाला। और तुम हमेशा की तरह एक बार फिर चुप चाप सोचती रही।

"मैंने कुछ ज्यादा ही बोल दिया..."

"नहीं नहीं... अच्छा लगा सुनकर कि कोई हमारे बारे में इतना कुछ सोचता है।" तुमने कहा था।

चेहरे पर आई एक छोटी सी मुस्कान के साथ कहा था की तो फिर तुम  रही हो न घर!

"घर! कौन सा घर! यह संभव नहीं....  " कहते कहते तुम चली गयी.…  तुम्हे किसी ने बुला लिया और मैं अपने ख्याली पुलावों के साथ अपने पैरों के नीचे से खिसकी जमीन तलाशने लगा।

घर! कौन सा घर! 

( 03 मार्च 2015)

Monday, April 6, 2015

ये दूरी और मज़बूरी!!

तुम्हारा फोन काट गया। तुम वहां अपने एग्जाम की तैयारी में लगा गयी और यहाँ मैं!

मेरे सामने एक ऐसा चक्रव्यूह खड़ा था जिसमे से निकलने का कोई रास्ता न है। अभी हाल ही में ऑफिस से छुट्टी ले घूमकर आया हूँ और फिर अब दोबारा 4 दिन की छुट्टी मिल पाना तो मुश्किल है। 4 दिन से ज्यादा कहने को तो 4 दिन है पर असल में तो ये 4 दिन केवल चंद मिनटों की मुलाकात के लिए हैं।

मेरे सामने एक बड़ा सवाल है, यदि मुझे ऑफिस से छुट्टी मिल भी जाए, मेरे कॉलेज के एग्जाम भी किसी तरह एडजस्ट हो जाये और घर वालों को भी एडजस्ट कर तुमसे मिलने निकल लूँ तो क्या इतना आसान होगा।

फोन कट करते है इंडियन रेलवेज की वेबसाइट चेक की तो पता चला की 9 और 10 दोनों में ही दी। 300-300 वेटिंग टिकट है। मतलब साफ़ था की यदि सब एडजस्ट भी हो जाये तो भी तुमसे मिलने के लिए किसी युद्ध से कम संघर्ष नहीं करना है। उसपर भी वहां तुम्हारे पास पहुँच कर यह भी निश्चित नहीं है कि हमारी मुलाकात हो भी पायेगी या नहीं।

भारतीय रेलवे से तो अब कोई उम्मीद है नहीं। यदि तुमसे मिलना है तो हमें पूरी रात बिना सोए, ट्रेन में घूमते-घुमाते, बैठते उठाते हुए 14 घंटों का सफ़र तो करना ही होगा। इसके बाद भी यह संघर्ष यहीं नहीं खत्म होगा। इसके बाद तुमसे मिल अगले दिन फिर दिल्ली के लिए भी ऐसे ही सफर करना होगा। कुल मिलाकर यदि तुमसे मिलना है तो उसके लिए 4 दिन बिना सोए, बिना आराम किए लगातार सफर करना होगा और ऑफिस, फैमिली और कॉलेज को भी पूरा दिमाग लगा एडजस्ट करना पड़ेगा।

इंडियन रेलवे के बाद नंबर थे कॉलेज का। दोस्त से डेट शीट मंगावाई और देखते ही दिल को सकून मिल गया। पहली बार जी कर रहा था की जिस ने भी डेट शीट बनाई है उसे जा जाकर शुक्रिया कह आऊं। हमारे इंटरनल एग्जाम 09 को ही खत्म हो रहे थे और इसके बाद प्रक्टिकल में भी कुछ दिनों का गैप था। मतलब कॉलेज की तरफ से मेरा रास्ता क्लियर था। 09 को आखिरी एग्जाम दो और 10 को तुमसे मिलने निकल पडूँ। लेकिन अभी भी ऑफिस और फैमिली का क्या करना है कुछ समझ नहीं आ रहा था।

रात भर तुमसे मिलने का ख्याल दिल में चलता रहा। मन मवि उथल-पुथल मची रही। रोज़ ही रात को 1-2 बजे सोता था पर आज तो पूरी रात नींद ही न आई!!

अगला दिन

आज ऑफिस पहुँचते ही मैंने रिसेप्शन से लीव एप्लीकेशन फॉर्म ले लिया औए उसे भर अपने सीनियर के पास उसे अप्प्रूव् होने के लिए भेज दिया।

ऍप्लिकेशम देखते ही उन्होंने मुझे अपने केबिन में बुलाया और कहा," तुम अभी तो छुट्टी पर से आये और फिर छुट्टी... करते क्या ही भाई इतनी छुट्टियों का ?"

"सर वो कॉलेज में एग्जाम है न तो इसलिए ऑफ चाहिए वरना सर आपको पता है मैं वीक ऑफ भी नहीं लेता"

"चलिए ठीक है देखते हैं,  10 से 13 अप्रैल तक चाहिए न छुट्टी? चार दिन के लिए?"

"जी सर, 10 से 13 अप्रैल तक" झूठ बोलते वक़्त मेरी आँखें अपने आप नीची हो गयी थी।

जब एग्जाम था तब तो मैंने ऑफ लिया नहीं और अब तुमसे मिलने के लिए एग्जाम का बहाना लगा ऑफ की अर्ज़ी दे दी है।

वैसे भी अब तुमसे मिलना है तो फिर चाहे लाख मुसीबत आये अब तो तुमसे मिलना ही है।

31 मार्च 2015

Friday, April 3, 2015

मिलन की चाह !


 शाम का वक़्त था और धीरे धीरे ऑफिस में रिपोर्टरों का जमावड़ा लगाना शुरू हो गया था। वैसे भी अखबारों में असली काम तो शाम को ही शुरू होता है।


रोज़ की तरह ही एडिटर्स रूम में खबरों के चयन को लेकर मीटिंग चल रही थी। मीटिंग से वापस अपने डेस्क पर आ अपना फोन देखा तो एक मिस कॉल!! कल ही  तुम्हारे बारे में यहाँ लिखा और देखो आज ही तुम्हारा कॉल आ गया। 

आज तुम्हे तुरंत कॉल बेक न कर पाया था। दरअसल मीटिंग में जाने से पहले मैं आज अपना फोन डेस्क पर ही रख चला गया। वापस आकर देखा तो 05:47 पर तुम्हारा मिस कॉल था। तो यह देखते ही तुम्हे कॉल मिला दिया। 

हज़ार किलोमीटर की दूरी से आती तुम्हारी आवाज़ बेरंग ज़िन्दगी में इंद्रधनुष रच देती है, लगता है जैसे कानों में कोई मिश्री घोल रहा हो, प्यासी धरती को पानी सींच रहा हो, धूप में थके मुसाफिर को छांव दे रहा हो!! ऐसा ही लगता है जब भी तुम हज़ार किलोमीटर दूर बैठ मुझे याद कर फोन करती हो। 

आज एकाएक तुम्हे देखने दिल कह बैठा!  वैसे तो तुम्हारा शाश्वत रूप सदा ही मेरी आँखों के सामने रहता है पर फिर भी न जाने क्यों आज तुम्हे जी भर देखने की इच्छा है। 

" आज बड़ा मन हो रहा है तुमसे मिलने का.... कब तक ऐसे फोन पर ही चलता रहेगा..."

"तो आ जाओ मिलने..."

"अगर मैं आ गया तो तुम मिलोगी?" पूछा था मैंने तुमसे
और तुमने कहा था," हाँ पक्का मिलेंगे! कब आ रहे हो?"

तुम्हारा साहस देख रोमांचित हो उठा था मैं। मैं जनता था की तुम्हारे लिए मुझसे मिलना इतना आसान न होगा!!

अपने को सँभालते हुए कहा, "जब तुम कहो..."

"और तुमने तपाक से कह दिया, "अभी आ जाओ..."

"अभी...?"

"हाँ!! अभी.."

तुम्हारे यह कहते ही मुझे ऑफिस का लीव एप्लीकेशन याद आ गया। अभी तो पिछले हफ्ते मैं चार दिन का ऑफ ले मसूरी और ऋषिकेश घूमकर आया हूँ। भला अब कैसे दोबारा छुट्टी मिलेगी। 

"यार मैं आ तो जाऊंगा पर मेरी नौकरी चली जायेगी..." हँसते हुए कहा था मैंने।  


"तो क्या हुआ... तुम नहीं आ सकते हो तुम्हारा मन तो आ सकता है न"

"मन! वो इस बार वहां से वापस आया ही कहाँ था! वो तो वहीं तुम्हारे पास ही रह गया था। "


तुमसे मिलने की दिल बेकरार हुए जा रहा था। ऑफिस तो ऑफिस फिर कॉलेज और घरवालों को भी एडजस्ट करना पड़ेगा इसके लिए। फिर एकाएक ध्यान आया की कॉलेज नै तो एग्जाम है। और इधर तुम्हारा भी 11 को एग्जाम है। तो यदि मैं किसी तरह 11 की सुबह वहां पहुँच जाऊं तो हमारी मुलाकात हो सकती है। 

पर तुम तक पहुचना इतना आसान तो है नहीं। 

ऑफिस में लीव एप्लीकेशन!

कॉलेज एग्जाम !

और घरवाले!!

कुछ न कुछ तो करना पड़ेगा....




( 30 मार्च 2015)

Sunday, March 29, 2015

साथ जीना!



19! हाँ 19 मार्च को आखिरी बार बात हुई थी हमारी। उसके बाद से आज 29 मार्च की सुबह 1 बजे तक कोई बात-चीत नहीं। पर इस बार मन में कोई खींच नहीं है। कोई डर नहीं है तुम्हारे खोने का, तुमसे जुदा हो जाने का,तुमसे बिछड़ जाने का... इसका कारण है 19 मार्च को घण्टे भर चली हमारी बात।

उस दिन तुम्हारे कॉल ने मुझे दुनिया-जहाँ की खुशियाँ दे डाली। कारण यह नहीं था कि उस दिन 9 दिनों बाद हमारी बातें हो रही थी बल्कि कारण था तुम्हारा राज़ी होना। तुम्हारा राज़ी होना … 

मुझे शुरू से "I Love You" "Girlfriend - Boyfriend" जैसे शब्द बनावटी, कुछ नकली से मालूम होते रहे हैं.…इनका इस्तेमाल पर लगता है जैसे कोई खानापूर्ति कर रहा हो, दिखावटी प्यार जाता रहा हो!! प्रेम! प्रेम तो एक शाश्वत एहसास है, कल्पनाओं का ऐसा  संसार है जहाँ प्रेमियों के सिवाय कोई और नहीं। और यह एहसास, यह संसार love you, girlfriend - boyfriend जैसे शब्दों में नहीं झलकता। लगता है जैसे कोई जुगाड़ू शब्द हों ये ये! जिनका कोई स्थायी अस्तित्व!

ऐसा भी हो सकता है कि मैं गलत होऊं। शायद ये शब्द मुझे ही झूठे लगते हों! मुझे ही ये टिकाऊ नहीं लगते हों.… 
तब पर भी मैं तुम्हे इन शब्दों से तो  दूर ही रखना चाहूंगा!! और यहीं से मेरी सबसे बड़ी दुविधा का भी जन्म हुआ! हमारे बीच क्या है यह मैं समझ नही पाया रहा था पर मुझे अंदाज़ा तो था कि आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई है।  अब ऐसे में अपने दिल को राहत देने के लिए मैं तुम्हे दिखावटी शब्दों (I Love You  या girlfriend - boyfriend ) से तो कतई भी सम्बोधित नहीं कर सकता था। तो मैंने किया भी नहीं! 

पर बार बार मन में एक कचोटन उठती कि कहीं यह एकतरफ़ा इकरार तो नहीं! एक तरफ़ा प्यार तो नहीं?? 

लेकिन इसका जवाब मिला 19 मार्च को तुम्हारी कॉल से.… 

मुझे याद है कितना ढांढस बांध मैंने तुमसे पूछा था.… 

"तुम 8-10 सालों में घर तो आ रही हो न … ?"

गहरी सांस के बाद तुमने कहा था, "हाँ ... "

"हमेशा के लिए! साथ जीने के लिए, साथ बूढ़े होने के लिए.… ??" यह कहते वक़्त मेरा दिल किसी ट्रेक्टर के  इंजन से काम आवाज़ नहीं था।  और मीलों दूर तुम्हारे दिल का भी शायद यही हाल रहा होगा।  

और फिर लगा जैसे दुनिया थम सी गयी.… चहुँ और बस तुम्हारी आवाज़! केवल एक आवाज़ गूूंजने लगी

"हाँ! आ रहे हैं ! साथ जीने के लिए…  साथ बूढ़े होने के लिए… " 

बस फिर तो मैं नौवें आसमां पर था.। मन कर रहा था नाचूं!! जोर जोर से चिल्लाऊं!! सबको बताऊँ कि हाँ तुम आ रही हो!! 


बस तुम्हारे आने की हामी ने ही मुझे अपार खुशियां दे डाली थी।  मैं जनता था, जनता हूँ कि तुम्हारे लिए यहाँ आ पाना कितना कठिन है! तुम पर कितने पहरे हैं जो तुम्हें बार रोकेंगे! 

हमें मालूम है की हम दोनों की राहें कितनी मुश्किल है पर अब कोई फर्क नहीं पड़ता! अब तुमने साथ निभाने का वादा कर डाला तो फिर भला अब दिक्कत ही क्या !!

अब मुझे उन तमाम पहरों की कोई चिंता नहीं है! उन अदृश्य दीवारों को फांद मैं तुम्हे समय आते ही यहाँ ले आऊंगा ! साथ जीने के लिए साथ बूढ़ा होने के लिए.… 


29 मार्च 2015 

Tuesday, March 17, 2015

बांसुरी चली आओ!!

और सातवां दिन भी आज बीत गया! अब तो जैसे आदत सी हो गयी है तुम्हारे कॉल के इंतज़ार में बैठे रहने की। मालूम है  निष्ठुर हो गयी हो! कॉल क्या एक मेसेज तक नहीं करोगी तो भी ये दिल तुम्हारा इंतज़ार करता रहता है!

जब घर पर था तो सोचा था कि अगर तुमसे ढाई साल बाद भी बिना बात करे ही चला जाऊंगा तो दिल्ली में शायद काम ही नहीं कर पाउँगा! मन ही नहीं लगेगा! लेकिन तुमसे बात भी हुई और अब यहाँ मन भी नहीं लग रहा है।

शारीर एक ही है लेकिन इसके अंदर कई रजत कई टोनी हो गए है! एक रजत एक टोनी वो जो सब भूल बस काम काम और काम में लगा रहना चाहता है । तो दूसरा वो टोनी, वो रजत है जो बार बार तुम्हे सोच मुस्कुरा लेता है! 
तुम्हे अपने पास होने की कल्पना करता है पर जब कल्पना टूटी है तो वो भी टूट जाता है।
कई बार मन में एक संशय जन्म लेता है कहीं तुम मुझे मझदार में अकेला छोड़ कहीं दूर तो नहीं निकल पड़ी! ऐसे सोच सोच मेरा दिल कटा जाता है! लगता है जैसे कोई धारदार आरी से उसे काटे जा रहा है और मैं रो भी न पा रहा हूँ! फिर मन में दूसरा विचार आता है तुम तो समझदार हो, यदि ऐसा फैसला भी किया होगा तो मुझसे तो जरूर बताती कि अब आगे बात न होगी! अब आगे बात न बढेगी!

लेकिन तुमने तो ऐसा भी कोई संकेत न दिया! अब तुम्हारी इस रुसवाई को क्या समझूँ मैं!

कहीं तुम यह तो नहीं मान बैठी की हमारे बीच जो भी था मालूम नही कुछ था भी या नहीं! 10 तारीख को जब तुमसे ये पूछा था, तभी मैं डर गया था कि कहीं तुम इसके बाद मुझसे बात ही न करोगी! और देखो वही यथावत वो रहा है।

माफ़  करना पापा का कॉल आ रहा है!! बात करके वापस आता हूँ !

रस्ते में हैं! कहा है उत्तम नगर से पिक करलेंगे! तो अब वहीं उतरना है। घर लेट पहुँचता हूँ तो घर वालों को टेंशन हो जाती है तो फोन कर के खोज खबर ले लेते है और पापा आप-पास होते है तो अपने साथ ही घर लिए चलते हैं।

खैर, कहाँ था मैं... हाँ! मन के चक्रव्युह के बारे में बता रहा था तुम्हे! डर लगता है कहीं तू मेरे उसी सवाल से नाराज हो! या फिर ऐसा तो नहीं तुम सवाल का जवाब जानती थी! वो ही जवाब जो मेरे दिल में है! पर तुम उसे जगजाहिर न होने देने के लिए ऐसा कदम उठा रही हो! मुझे नज़र अंदाज़ कर रही हो!! देखो यह तो तय है हमारे बीच कुछ न कुछ तो जरूर है। लेकिन क्या है इसे ही तो हम तलाश रहे हैं। और अगर तुम्हे लगता है यह एक तरह का आकर्षण मात्र है तो तुम सरासर गलत हो। यह किसी एक बच्चे का किसी खिलौने के तरफ आकर्षण नहीं है। यह वह है जो शास्वत है! शुद्ध है! पवित्र है! हाँ ये वही है जो जाने अनजाने कितनी बार मेरे मन में आया! तुम्हारे भी मन में जरूर आया होगा। तभी मेरी आज यह हालात है। 

पता नहीं क्यों तुम्हारे बारे में सोच सोचकर मन भारी हुआ जाता है! ख़ुशी के साथ दिल में एक अजीब सा दर्द जाग उठता है... पता नहीं तुम यह सब कभी पढ़ भी पाओगी या नहीं पर अब एक यही तो यहाँ बेफिक्री से मैं तुम्हारी बातें कर सकता हूँ! तुम्हे याद कर सकता हूँ। मालूम नहीं तुम वहां क्या महसूस करती हो! क्या मालूम जो मैंने सोचा हो उससे तुम इतफ़ाक भी न रखो पर मैं! मैं तो आशावादी हूँ! आशा है और अंतिम साँस तक रहेगी! तुम्हारे आने की आशा! तुमसे मिलने की आशा!!


ऐसे में कुमार विश्वास की कविताएँ और दिल में हड़बड़ी मैच देती हैं। उनकी लिखी कुछ पंक्तियाँ हैं-


तुम अगर नहीं आई, गीत गा ना पाऊंगा...
सांस साथ छोड़ेगी, सुर सजा ना पाऊंगा...
तान भावना की है, शब्द शब्द दर्पण हैं...
बांसुरी चली आओ, होंठ का निमंत्रण है...


सच ही कह रही हैं यह पंक्तियाँ! जिस दिन तुम न आ सकोगी उस दिन कहाँ यह लिख पाऊंगा! कहाँ कलम चलेगी! अभी तो तुम्हारे आने की उम्मीद बाकी है। जब वह भी टूट जायेगी तो यह जीवन भी टूट ही जायेगा!!!



तुम बिन हथेली की हर लकीर प्यासी है, 
तीर पार कान्हा से दूर राधिका सी है,
दूरियां समझती हैं दर्द कैसे सहना है,
आँख लाख चाहे पर होंठ को ना कहना है...
औषधि चली आओ, चोट का निमंत्रण है...
बांसुरी चली आओ, होंठ का निमंत्रण है...

तुम अलग हुई मुझसे सांस की खताओं से...
भूख की दलीलों से, वक़्त की सजाओं से...
रात की उदासी को आंसुओं ने झेला है...
कुछ गलत न कर बैठे, मन बहुत अकेला है,
कचन कसौटी की खोट का निमंत्रण है,
बांसुरी चली आओ, होंठ का निमन्त्रण है...


यह शब्द भले ही कुमार विश्वास के हों, पर फिलहाल  इनका एक एक एहसास बिलकुल मेरा है! मेरे जैसे ही न जाने कितने लोगो का एहसास है ये। पंक्ति का एक एक शब्द दिल की गहराईयों से निकला है और इसका कारण तुम... जानती हो!!


बांसुरी चली आओ, होंठ का निमन्त्रण है...

17 मार्च 2015