Tuesday, September 1, 2015
आइए... बैठ कर रो लेते हैं आज...
Saturday, August 1, 2015
सपना! सच या झूठ है यह सपना....
मैं ऑफ लेकर तुम्हारे फोन कॉल का ही इंतार करत रहा... 8 मार्च को तुम्हें घर लाने के लिए राजी तो कर लिया था पर मुझे क्या मालूम था कि मैं ही तु्म्हारे पास नहीं पहुंच पाऊंगा....
9 और 10 मार्च के वे 42 घंटे कितने भारी थे यह मैं ही जानता था... बार बार मेरा ध्यान बस फोन पर ही लगा हुआ था। एक आश थी कि अब तुम्हारा फोन आएगा... तब तुम्हारा फोन आएगा...
लेकिन आज यह 42 घंटे भी 42 सालों की तरह तिल-तिल कर के बीत गए... न मैं तुम्हारे घर न तुम्हारा कॉल मेरे पास....
पूरे दिन फोन के पास ही बैठा रहा.. कहीं ऐसा न हो कि तुम फोन करो और मैं फोन ही न उठा पाऊं... कभी फोन की बैट्री चैक करता तो कभी फोन का नेटवर्क... क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि तुम्हारा फोन आए और हमारी बात न हो पाए....
दो दिनों के लंबे इंतजार के बाद भी तुम्हारा फोन जब नहीं आया तो मैं समझ गया कि मैं एक बार फिर तुम्हारी बातों में फंस गया। काश मैंने उस दिन तुम्हारी बात न मानी होती और कहा दिया होता कि मैं आ रहा हूं। चाहे तुम फोन करो या नहीं.....
पर नहीं मैं तो तुम्हारे उस फोन कॉल के इंतजार मैं बैठा रहा जो आया ही नहीं...
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तुम्हें पता है मैंने 9 और 10 दोनों ही रातों को केवल एक ही सपना देखा.... सपने में तुम थी, तुम्हारा कॉलेज था, बाइक थी और मैं था.... नींद में तो सपना देख बहुत खुश हुआ था मैं पर जैसे ही सुबह मेरी आंख खुली में स्तब्ध रह गया... क्योंकि मैं जानता था कि जो सपने मैं देखता हूं वह कभी सच नहीं हुआ करते हैं... समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं... आखिर कैसे तुम मेरे सपनों में आ गई... मैं यह सोच कर परेशान ही था पर मन में ख्याल आया कि ऐसा कुछ नहीं होगा... और एक बार फिर मैं गलती कर बैठा.... बैठ गया दो दिन तक तुम्हारे इंतजार में... सपना सच होने के इंतजार में.... तुम से मिलने के इंतजार में... और यह इंतजार आज तक इंतजार ही है....
11 मार्च 2015
Wednesday, July 22, 2015
आ घर लौट चलें!
ऐसा ही कुछ उस दिन भी हुआ था। बातें ऐसे मोड़ पर छूट गईं थीं जहां से आगे कोई रास्ता मुझे सुझ ही नहीं रहा था। इसलिए उस पूरी रात में मैं बस तुम्हारे ही ख्यालों में खोया रहा। मुझे मालूम था कि तुम्हारे ऐसे सवालों के पीछे तुम्हारा जरूर कोई मकसद रहा होगा। तुमने जरूर कुछ सोचकर ही ऐसे बेरूखी से यह बातें कह डाली होगीं... तुम्हारे मन में भी इस घर आने के लिए हिलोरे जरूर उठते होंगे पर फिर भी ऐसे रवैया क्यों... मैं परेशान हो रहा था। मन था कि बस कैसे भी तुम्हारे पास पहुंच जाऊं, तुम्हें पूछूं कि आखिर ऐसी कौन सी वजह है जो तुम अब इस घर को भूल गई। पर अफसोस यह मीलों की दूरी!!
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तुम्हारी उस बात को 42 से ज्यादा घंटे बीते चुके हैं पर मेरा दिल और दिमाग अब भी वहीं मेरे ऑफिस के टेरेस पर अटका हुआ है जहां तुमने घर आने को लेकर सवाल दाग दिए थे। इन 42 घंटों का एक एक पल मेरे लिए कितना भारी रहा यह शायद तड़प-तड़प कर मरने वाली मछली भी न समझ पाएगी। मैं तुमसे बात करना चाहता था, तुम्हें समझाना चाहता था, तुमपर गुस्सा और तुमसे नाराज भी होना चाहता था पर मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहा था। मैं बेबस, लाचार, असाहय यह सब सहता रहा....
शाम के 7 बजे... रणभूमि में तबदिल हो चुके उस न्यूजरूम में मैं भी बैठा हुआ रोजाना की तरह अपनी खबरों को एडिट किए जा रहा था पर बार बार मेरा हाथ अपने आप उस जेब में चला जा रहा था जिस जेब में पड़े मोबाइल को तुम्हारे कॉल का इंतजार था... और वह वक्त शाम 8 बजे आ ही गया... 90 के दशक का ब्लक एंड व्हाइट न्यूजरूम एकाएक क्लरफूल न्यूजरूम में तब्दिल हो गया, पतझड़ से सावन आ गया... मोरों ने नाचना शुरू कर दिया और उधर से तुम्हारी आवाज आई
'हैल्लो'
यार पता है कितना परेशान हूं मैं यहां....
क्यों क्या हुआ.?
तुम्हें नहीं पता....
और फिर खबरों की रणभूमि से कहीं दूर हम एक बार फिर घर की चर्चा पर लौट आए थे। पूरे 43 मिनट लगे थे तुम्हें वापस घर लाने के लिए तैयार करने में.... तुम भी कम जिद्दी नहीं... एक से एक तर्क दिए थे तुमने.... पर आखिरकार तुमने घर आने की हामी तो भर ही दी....
08 मार्च 2015
Thursday, April 16, 2015
मौका!
अब उसे क्या बताऊँ कि यहाँ मेरी जिंदगी में ही मोटिवेशन की कितनी जरुरत है। काश! काश मैं तुम्हे समझा पाता! काश एक बार हमारी फिर बात हो जाती!
Saturday, April 11, 2015
घर ? कौन सा घर ?
Monday, April 6, 2015
ये दूरी और मज़बूरी!!
तुम्हारा फोन काट गया। तुम वहां अपने एग्जाम की तैयारी में लगा गयी और यहाँ मैं!
मेरे सामने एक ऐसा चक्रव्यूह खड़ा था जिसमे से निकलने का कोई रास्ता न है। अभी हाल ही में ऑफिस से छुट्टी ले घूमकर आया हूँ और फिर अब दोबारा 4 दिन की छुट्टी मिल पाना तो मुश्किल है। 4 दिन से ज्यादा कहने को तो 4 दिन है पर असल में तो ये 4 दिन केवल चंद मिनटों की मुलाकात के लिए हैं।
मेरे सामने एक बड़ा सवाल है, यदि मुझे ऑफिस से छुट्टी मिल भी जाए, मेरे कॉलेज के एग्जाम भी किसी तरह एडजस्ट हो जाये और घर वालों को भी एडजस्ट कर तुमसे मिलने निकल लूँ तो क्या इतना आसान होगा।
फोन कट करते है इंडियन रेलवेज की वेबसाइट चेक की तो पता चला की 9 और 10 दोनों में ही दी। 300-300 वेटिंग टिकट है। मतलब साफ़ था की यदि सब एडजस्ट भी हो जाये तो भी तुमसे मिलने के लिए किसी युद्ध से कम संघर्ष नहीं करना है। उसपर भी वहां तुम्हारे पास पहुँच कर यह भी निश्चित नहीं है कि हमारी मुलाकात हो भी पायेगी या नहीं।
भारतीय रेलवे से तो अब कोई उम्मीद है नहीं। यदि तुमसे मिलना है तो हमें पूरी रात बिना सोए, ट्रेन में घूमते-घुमाते, बैठते उठाते हुए 14 घंटों का सफ़र तो करना ही होगा। इसके बाद भी यह संघर्ष यहीं नहीं खत्म होगा। इसके बाद तुमसे मिल अगले दिन फिर दिल्ली के लिए भी ऐसे ही सफर करना होगा। कुल मिलाकर यदि तुमसे मिलना है तो उसके लिए 4 दिन बिना सोए, बिना आराम किए लगातार सफर करना होगा और ऑफिस, फैमिली और कॉलेज को भी पूरा दिमाग लगा एडजस्ट करना पड़ेगा।
इंडियन रेलवे के बाद नंबर थे कॉलेज का। दोस्त से डेट शीट मंगावाई और देखते ही दिल को सकून मिल गया। पहली बार जी कर रहा था की जिस ने भी डेट शीट बनाई है उसे जा जाकर शुक्रिया कह आऊं। हमारे इंटरनल एग्जाम 09 को ही खत्म हो रहे थे और इसके बाद प्रक्टिकल में भी कुछ दिनों का गैप था। मतलब कॉलेज की तरफ से मेरा रास्ता क्लियर था। 09 को आखिरी एग्जाम दो और 10 को तुमसे मिलने निकल पडूँ। लेकिन अभी भी ऑफिस और फैमिली का क्या करना है कुछ समझ नहीं आ रहा था।
रात भर तुमसे मिलने का ख्याल दिल में चलता रहा। मन मवि उथल-पुथल मची रही। रोज़ ही रात को 1-2 बजे सोता था पर आज तो पूरी रात नींद ही न आई!!
अगला दिन
आज ऑफिस पहुँचते ही मैंने रिसेप्शन से लीव एप्लीकेशन फॉर्म ले लिया औए उसे भर अपने सीनियर के पास उसे अप्प्रूव् होने के लिए भेज दिया।
ऍप्लिकेशम देखते ही उन्होंने मुझे अपने केबिन में बुलाया और कहा," तुम अभी तो छुट्टी पर से आये और फिर छुट्टी... करते क्या ही भाई इतनी छुट्टियों का ?"
"सर वो कॉलेज में एग्जाम है न तो इसलिए ऑफ चाहिए वरना सर आपको पता है मैं वीक ऑफ भी नहीं लेता"
"चलिए ठीक है देखते हैं, 10 से 13 अप्रैल तक चाहिए न छुट्टी? चार दिन के लिए?"
"जी सर, 10 से 13 अप्रैल तक" झूठ बोलते वक़्त मेरी आँखें अपने आप नीची हो गयी थी।
जब एग्जाम था तब तो मैंने ऑफ लिया नहीं और अब तुमसे मिलने के लिए एग्जाम का बहाना लगा ऑफ की अर्ज़ी दे दी है।
वैसे भी अब तुमसे मिलना है तो फिर चाहे लाख मुसीबत आये अब तो तुमसे मिलना ही है।
31 मार्च 2015
Friday, April 3, 2015
मिलन की चाह !
शाम का वक़्त था और धीरे धीरे ऑफिस में रिपोर्टरों का जमावड़ा लगाना शुरू हो गया था। वैसे भी अखबारों में असली काम तो शाम को ही शुरू होता है।
रोज़ की तरह ही एडिटर्स रूम में खबरों के चयन को लेकर मीटिंग चल रही थी। मीटिंग से वापस अपने डेस्क पर आ अपना फोन देखा तो एक मिस कॉल!! कल ही तुम्हारे बारे में यहाँ लिखा और देखो आज ही तुम्हारा कॉल आ गया।

