19! हाँ 19 मार्च को आखिरी बार बात हुई थी हमारी। उसके बाद से आज 29 मार्च की सुबह 1 बजे तक कोई बात-चीत नहीं। पर इस बार मन में कोई खींच नहीं है। कोई डर नहीं है तुम्हारे खोने का, तुमसे जुदा हो जाने का,तुमसे बिछड़ जाने का... इसका कारण है 19 मार्च को घण्टे भर चली हमारी बात।
उस दिन तुम्हारे कॉल ने मुझे दुनिया-जहाँ की खुशियाँ दे डाली। कारण यह नहीं था कि उस दिन 9 दिनों बाद हमारी बातें हो रही थी बल्कि कारण था तुम्हारा राज़ी होना। तुम्हारा राज़ी होना …
मुझे शुरू से "I Love You" "Girlfriend - Boyfriend" जैसे शब्द बनावटी, कुछ नकली से मालूम होते रहे हैं.…इनका इस्तेमाल पर लगता है जैसे कोई खानापूर्ति कर रहा हो, दिखावटी प्यार जाता रहा हो!! प्रेम! प्रेम तो एक शाश्वत एहसास है, कल्पनाओं का ऐसा संसार है जहाँ प्रेमियों के सिवाय कोई और नहीं। और यह एहसास, यह संसार love you, girlfriend - boyfriend जैसे शब्दों में नहीं झलकता। लगता है जैसे कोई जुगाड़ू शब्द हों ये ये! जिनका कोई स्थायी अस्तित्व!
ऐसा भी हो सकता है कि मैं गलत होऊं। शायद ये शब्द मुझे ही झूठे लगते हों! मुझे ही ये टिकाऊ नहीं लगते हों.…
तब पर भी मैं तुम्हे इन शब्दों से तो दूर ही रखना चाहूंगा!! और यहीं से मेरी सबसे बड़ी दुविधा का भी जन्म हुआ! हमारे बीच क्या है यह मैं समझ नही पाया रहा था पर मुझे अंदाज़ा तो था कि आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई है। अब ऐसे में अपने दिल को राहत देने के लिए मैं तुम्हे दिखावटी शब्दों (I Love You या girlfriend - boyfriend ) से तो कतई भी सम्बोधित नहीं कर सकता था। तो मैंने किया भी नहीं!
पर बार बार मन में एक कचोटन उठती कि कहीं यह एकतरफ़ा इकरार तो नहीं! एक तरफ़ा प्यार तो नहीं??
लेकिन इसका जवाब मिला 19 मार्च को तुम्हारी कॉल से.…
मुझे याद है कितना ढांढस बांध मैंने तुमसे पूछा था.…
"तुम 8-10 सालों में घर तो आ रही हो न … ?"
गहरी सांस के बाद तुमने कहा था, "हाँ ... "
"हमेशा के लिए! साथ जीने के लिए, साथ बूढ़े होने के लिए.… ??" यह कहते वक़्त मेरा दिल किसी ट्रेक्टर के इंजन से काम आवाज़ नहीं था। और मीलों दूर तुम्हारे दिल का भी शायद यही हाल रहा होगा।
और फिर लगा जैसे दुनिया थम सी गयी.… चहुँ और बस तुम्हारी आवाज़! केवल एक आवाज़ गूूंजने लगी
"हाँ! आ रहे हैं ! साथ जीने के लिए… साथ बूढ़े होने के लिए… "
बस फिर तो मैं नौवें आसमां पर था.। मन कर रहा था नाचूं!! जोर जोर से चिल्लाऊं!! सबको बताऊँ कि हाँ तुम आ रही हो!!
बस तुम्हारे आने की हामी ने ही मुझे अपार खुशियां दे डाली थी। मैं जनता था, जनता हूँ कि तुम्हारे लिए यहाँ आ पाना कितना कठिन है! तुम पर कितने पहरे हैं जो तुम्हें बार रोकेंगे!
हमें मालूम है की हम दोनों की राहें कितनी मुश्किल है पर अब कोई फर्क नहीं पड़ता! अब तुमने साथ निभाने का वादा कर डाला तो फिर भला अब दिक्कत ही क्या !!
अब मुझे उन तमाम पहरों की कोई चिंता नहीं है! उन अदृश्य दीवारों को फांद मैं तुम्हे समय आते ही यहाँ ले आऊंगा ! साथ जीने के लिए साथ बूढ़ा होने के लिए.…
29 मार्च 2015






