Monday, March 9, 2015

इंतज़ार! दूसरा दिन!

होली, होली के दिन कहा था तुमने कि तुम्हे हॉस्पिटल जाना है और शायद बात न हो पायेगी! यह सचेहरा उतर आया था मेरा पर जब तुमने कहा, "समय मिला तो शाम को कॉल करेंगे"
तो दिल में एक बार फिर कोई संगीत बजने लगा था। पर अफ़सोस! आज 8 तारिक है। दूसरा दिन! 48 घण्टों से भी ज्यादा का समय बीत चूका है तुम्हारा कोई अता-पता नहीं है। मुझे फ़िक्र हो रही है आखिर कहाँ हो तुम? सब ठीक तो है?
बार बार तुम्हारा ही ख्याल आ रहा है, बार बार तुम आखों के सामने आ खड़ी हो जाती हो और मन! मन एक बार फिर तुमसे बात करने को मचल उठता है। इसी कश्मकश के बीच ऑफिस में बार बार अपने मोबाइल को जेब से निकाल देख लेता हूँ कहीं तुम्हारा कोई कॉल तो नहीं आया है, कोई मेसेज तो नहीं आया है। कहीं तुमने कॉल करी हो और मुझे पता ही न चला हो, कहीं तुम्हारा मेसेज आया हो और मैं देख ही न पाया होऊं! लेकिन! ऐसा कुछ भी नहीं! न कोई कॉल, न क़ोई मेसेज!!
यार! बड़ा कठिन है ऐसा इंतज़ार... खैर, आशावादी हूँ, सो उम्मीद करे बैठा हूँ!

08 मार्च 2015

Saturday, March 7, 2015

डर! खोने का डर!!

ऑफिस का एक दम पीक ऑवर!! काम का ढेर सारा लोड!! हर तरफ भाग दौड़!! कीबोर्ड पर तेज़ी से खटर-पटर करती उँगलियाँ!! और एकाएक अचानक उसके मोबाइल की घण्टी बजना!! घण्टी बजते ही तेज़ी से कीबोर्ड
आज डॉक्टर को दिखाने दूसरे शहर जाना है उसे... तो शायद आज बात न हो पाये... बतया था उसने!! पर मौका मिला तो शाम को मिस कॉल जरूर करेगी... वादा तो नहीं पर कहा जरूर था उसने...
फोन के अचानक बजते ही ब्रिज का ध्यान उसकी बातों पर चला गया! लगा जैसे जिसका इन्तेज़ार था उसी का कॉल हो! पर कॉल घर से थी! फोन उठाया तो उधर से आवाज़ आई...
"ऑफिस से निकले की नहीं..?"
"माँ बस आधे घण्टे और... फिर निकल रहा हूँ.."
"ठीक है! तू घर आजा" कह माँ ने फोन रख दिया।
अक्सर खाना खाते समय मां पूछ लेती है कि कहाँ हूँ? ऑफिस से निकल कि नहीं?
उसे मालूम है जब तक रात के बारह या साढे बारह नहीं बजेंगे मैं घर नहीं आऊंगा तब पर भी वो फोन कर पूछ लेती है। आखिर माँ तो माँ है। 
अभी माँ से बात किये 5-7 मिनट ही हुए थे कि फोन एक बार फिर बजा। पापा का कॉल था। कॉल उठाते है आवाज़ आई,
"टोनी कहाँ है..??"
"पापा अभी ऑफिस... " कह कह ही रहा था कि पाप बोल पड़े," अभी तक ऑफिस में है 10 बज रहे हैं कब निकलेगा...?"
"बस निकल ही रहा हूँ..."
थोड़ी देर बाद फोन फिर बजा। एक बार फिर पाप का कॉल था की ऑफिस से निकला की नहीं ?
ऐसे कर कर के आधे घण्टे में ही मुझे पापा के 6 कॉल्स आए।
मुझे थोड़ी चिंता होने लगी। आखिर मामला क्या है।
"पाप के कॉल्स तो आते हैं लेकिन ऑफिस के समय तभी पापा का कॉल तभी आता है जब वो मुझे किसी मेट्रो स्टेशन से पिक करने वाले होते हैं या फिर जब वो रात घर नहीं आ रहे होते हैं। लेकिन आज पापा घर पर ही थे और वो मुझे पिकअप करने भी नहीं आ रहे थे। फिर आखिर बात क्या है...
अरे यार, पापा हैं वो मेरे... बेटा हूँ मैं उनका... कर लिया होगा फोन... इतना सोचना क्यों!
इन्ही ख्यालों में मैंने जल्दी जल्दी आपन काम खत्म किया और घर के लिए निकल गया। किस्मत ने साथ दिया तो प्रगति मैदान मेट्रो स्टेशन से ही मेट्रो में सीट मिल गयी। सन्डे था तो ज्यादा भीड़ भी नहीं थी।
और सीट पर बैठते ही एक बार फिर फोन कॉल्स और ख्यालों का चक्रव्यूह शुरू हो गया। घर पहुँचते-पहुँचते मुझे पापा और मम्मी के 17 कॉल्स आये। एक दम से आई इतनी सारी कॉल्स ने मुझे ख्यालों के चक्रव्यूह में फंसा लिया। मेरा मन तुम तक उड़ चला।
मुझे लगा "कहीं कोई लफड़ा तो नहीं हो गया। कहीं घर वालो को तुम्हारे बारे में पता तो नहीं चल गया।
आखिर कैसे हो गया ये... वहां तुम्हारे घरवाले क्या कह रहे होंगे...?? आखिर तुम कैसे हैंडल कर रही होगी ये सब?  मैं क्या बोलूंगा घरवालों को... चलो मैं तो जैसे तैसे समझा लूंगा पर क्या तुम समझ पाओगी..." एक एक ख्याल के साथ दिल की धड़कनें तेज़ होती चली गयी। लगता बस अब दिल बाहर निकल आए...
"अगर पता चला गया होगा तो हम क्या करेंगे... कैसे समझायेंगे अपने घर वालों को..." सोच सोच कर मेरा गाला सुखा जा रहा था।
समझ नहीं आ रहा था किससे सलाह लूँ..? किससे मार्गदर्शन की उम्मीद करूँ...? दूर दूर तक तुम्हारे सिवा कोई नज़र नहीं आ रहा था... लगता बस एक बार बात हो जाए तुमसे... आखिर सारा मामला क्या है... दोनों मिलकर सुलझा लेंगे...
पर तुमपर तो इतना पहरा है कि  मैं तुम्हे एक मेसेज तक नहीं कर सकता... इस समय कॉल करने की तो बात ही दूर है..." मेरा गाला सूखे जा रहा था... दिल पूरी ज़ोर से रेल की इंजन की तरह धड़क रहा था...
अपने मन की सँभालने की बहुत कोशिश करी पर जैसे ही ख्यालों के चक्रव्यूह से बाहर निकलने की राह नज़र आती,  घर से आई अगली कॉल मुझे फिर उसी चक्रव्यूह में और भीतर धकेल देती।
किताबों में पढ़े सारी योग-साधनाएं लगा डाली पर ख्यालातों का यह चक्रव्यूह टूटने का नाम ही न लेता। गाला सूखे जा रहा है... दिल फटकर बहर आने को है... पूरा शरीर गर्म हो गया है... ठण्ड की मौसम में भी माथे पर पसीने की बुँदे फुट रही हैं...
पर आखरी योग लगाया और मन को थाम लिया.... पूरा ज़ोर लगा डाला... तब जाकर मन ने उछाल मारना कम किया....
"अगर पता चल भी गया होगा तो क्या... हमने औरों की तरह कुछ गलत तो नहीं किया... और फिर जैसा कि हमारे बीच तय हुआ था हमने थोडा थोडा तो अपने घरवालों को बता ही दिया था... आखिर हमने कोई हदें तो नहीं पार करी थी... हमारे बीच जो भी था शास्वत था! शुद्ध था! मोह-माया, छल-कपट इन सब से ऊपर... और फिर हमने फैसला भी तो किया था कि दोनों एक दूसरे के कैरियर के बीच कभी नहीं आएंगे... यथासंभव एक दूसरे के पूरक होंगे...
पर.. पर क्या ये सब हमारे घरवाले समझेंगे... उन्हें ये समझ आये की हज़ार किलोमीटर की दुरी भी जो काम न कर पायी उसे ये लोग भी न कर पाएंगे...
हाँ... जरूर समझ जायेंगे... शुरू में थोडा गुस्सा होंगे पर जरूर समझ जायेंगे..." और जब इस नतीजे पर पहुंचा तो देखा घर के बाहर खड़ा हूँ।
अब वक़्त था घरवालों को फेस करने का... मामले को समझने का...
गेट की घण्टी बजाई, रोज़ की तरह चहकती हंसती छोटी बहन ने आकर दरवाज़ा खोला...
पापा आगे कमरे में लेटे हुए थे... मम्मी किचन में बर्तन साफ कर रही थी और मैँ... मैं धीरे धीरे अपनी भरी होती सांसों को सँभालते हुए अपनी कमरे की और बढ़ रहा था... की तभी पीछे से आवाज़ आई...
"टोनी ! टोनी आ गया.."
"जी.. जी पापा.."
"खाना खा ले बेटा.."
"जी बस जा रहा हूँ..." एक बार फिर दिल ने तेज़ी से धड़कना शुरू कर दिया... साँस भरी हो रही है... गाला सूखे जा रहा है...
"बेटा कपडे बदलकर, हाथ मुंह दो ले जल्दी... आज दाल पालक बनाई है, लेकर आती हूँ..." मम्मी ने किचन से आवाज़ लगायी...
"हाँ बस बदल रहा..."
"तेरी मम्मी को टेंसन हो जाती है बेटा इतनी लेट मत हुआ कर.." पापा ने आगे कमरे से ही आवाज़ लगायी।
ये सब सुन, ठहर गया मैं... आखिर सच कोई बात है या फिर... ये लोग मुझे बता नहीं रहे...?
"यहाँ तो सब रोज़ की तरह है... सब ठीक है...
फिर क्या तुम्हारे ख्याल मुझमें कुछ यूँ घुस गए है कि मुझे हर वक़्त तुम ही नज़र आती हो..? हर चीज़ में तुम्हारा ही अक्श नज़र आता है..? 
कहीं ऐसा तो नहीं जो लगाव मेरे घरवालों को मुझसे है वो मुझे तुमसे हो गया हो..."
बेशक हमारे कई सौ किलोमीटर का फांसला हो पर अब तुम मुझसे अलग नहीं! मेरे घर से अलग नहीं। अभी यह लिखने से पहले ही तुम्हारे बारे में माँ को फिर बताया... वो हंसती है! कहती तू भोला है!
शायद उसे मेरी बात सच नहीं लगती । पर तुम तो जानती हो यह सब सच है न!
07 मार्च 2015

Friday, March 6, 2015

इन्तेज़ार रहेगा!!

तुम्हें अलविदा कह मैं दिल्ली की ट्रेन पर बैठ तो गया पर मेरा मन अब भी तुम्हारे पास ही है। यह शरीर ही वापस जा रहा था दिल तो तुम्हारे ही पास है... पहली बार लगा की काश! समय यही ठहर जाता, तुम्हे जी भर के निहार लेता, तुम्हारी आँखों में डूब उन तमाम बंदिशों को पढ़ पता जिनका तुमने कभी जिक्र ही नहीं किया। भला करती भी कैसे आखिर तुम पर इतना पहरा जो है। हर सफार में बेसूद हो सो जाने वाले को, इस सफर में नींद की एक झपकी तक न आई! इंतज़ार था! इंतज़ार था किसी के आने का, किसी की आवाज़ का... जो रोक लेती मुझे, जो रोक लेती इस समय को! पर नहीं... दिल्ली की और भागती ट्रेन ने तो जैसे दिल की धड़कनों को ही हल्का कर दिया था। दम घुट रहा था, सांसे भारी हो रही, मन में तुफान उठ रहा था... शायद ये सब तुम्हारे लिए। कम करना छोड़ चुके दिमाग को एकाएक क्या सूझा की जेब से फोन निकाल तुम्हे मेसेज कर डाला
Intezar rahega!
मोबाइल नेटवर्क की लुका-छिपी ने पहली बार मुझे इतना परेशान किया था। हर दो मिनट पर न जाने कितनी बार वो मेसेज बॉक्स में झांक चूका था कि शायद नेटवर्क आ जाए और मेसेज सेंट हो जाए। सदियों की तरह बीते करीब दो घण्टों के बाद तुम्हे मेसेज सेंड हुआ। यूँ तो वो एक मेसेज ही था लेकिन मेरे लिए उससे ज्यादा वो एक उम्मीद की किरण थी... वो उम्मीद जो हर भक्त अपने ईश्वर में देखता है... हर बच्चा अपनी माँ में देखता है...
(04 मार्च 2015)

कोशिश !

ज मन बहुत व्यथित है!! न जाने क्यों पहली बार मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं दीवारों से घिरा खड़ा हूँ! ऐसी बड़ी-बड़ी दीवारों से जोकी अदृश्य होकर भी मुझे रोके हुए है। जब से घर से लौटा हूँ यहाँ मन नहीं लग रहा है! दिल चीख चीखकर रोने को चाहता है! पर आखिर क्यों! इसका कारण मुझे नहीं मालूम!!
पिछले 2 साल!! 2 साल में बहुत वकैये हुए लेकिन ऐसी कोई व्यथा नहीं हुई कि वो चीखना चाहता हो! चिल्लाना चाहता हो! ऐसा लगता है जैसे कोई चीज़ मेरे सामने हो और में उसे हासिल नहीं कर पा रहा हूँ...
ख़ुशी है कि तुम वापस आ गयी! शायद ही मुझे इतनी ख़ुशी किसी और के आने से हुई होगी। किन्तु दिल और दिमाग में बार बार आने वाला एक ही ख्याल मुझे झकझोर कर रख देता है  "सामने खड़ी मेरी मंज़िल को मैं कैसे जीत पाउँगा!"
मालूम नहीं तुम मेरी बातों को समझ भी पा रही हो या नहीं! पर पिछले कुछ दिनों से मन बहुत व्यथित है! परेशान है! उसमे एक दर्द है!! एक दर्द किसी से जुदा हो जाने का! एक डर किसी से बिछुड़ जाने का!!
घर से लौटने पर लग रहा है कि जैसे मेरे सामने खड़ी चुनौतियों का कद अपने आप बड़ा हो गया है! कालचक्र मुंह फाड़े हमारी और बड़ा चला आ रहा है और मैं अपने आपको असहाय व असहज महसूस कर रहा हूँ। मुझे इन अदृश्य दीवारों से निकलने और तुम्हें निकालने की राह नहीं सूझ रही, तुम्हारी मज़बूरियों, तुम्हारी बंदिशों को तोड़ने का मार्ग नहीं दिख रहा... एकदम असहाय!! असहज!!
लेकिन तुम बेफिक्र रहो, मैं आशावादी हूँ! मुझे उम्मीद है कोई न कोई रास्ता जरूर है जो होकर भी हमें नज़र नहीं आ रहा है! जो है पर हम से छुपा है!! उसे हम ढूंढ निकालेंगे! उसे हम खोज निकालेंगे! हम हार नहीं मानेंगें!!
आखिर बच्चन साहब ने कहा है,
" लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती..."
हम कोशिश करेंगे! बार बार कोशिश करेंगें!
06 मार्च 2015

Monday, November 3, 2014

पत्र-मुझे सोना है!!


प्रिय रजत,


आज कल कुछ अजीब हो रहा है मेरे साथ। इस पत्र के जरिये मैं अपने मन की बात तुम तक पहुँचाना चाहता हूँ।

पिछले कुछ दिनों से में रोज़ रात बिस्तर में जा गिरता हूँ इस उम्मीद कस साथ कि बस मेरी आँख लग जायेगी, मुझे नींद आ जाएगी। लेकिन यह बेईमान बिस्तर मुझे गिर देता है। मुझे गिरा देता है मेरे ख्यालों से , मुझे ऐसे ही छोड़ देता है। मैं बार बार कोशिश करता हूँ मुझे नींद आ जाये, मेरी पलकें वन्द हो जाये लेकिन ऐसा होता नहीं। कल मैंने एक दो बार नहीं बल्कि 6 दफा कोशिश करी शायद मुझे नींद आ जाये लेकिन नहीं। मैं जिन्दा लाश की तरह पड़ा रहा अपने बिस्तर पर, आँखें खुली रही, करवट बदलता रहा। न जाने कहाँ से लग गयी मुझे यह बिमारी। मुझे बिनार होना बिल्कुक पसंद नहीं पर क्या यह बीमारी है, नींद न आना बीमारी है? नही, नहीं ऐसा नहीं है। मैं ठीक हूँ। मुझे कुछ नहीं हुआ है।

दरअसल मेरे अंदर ही अंदर मुझे एक डर सताए जा रहा है, नोंचे जा रहा है पर मुझे सोने नहीं दे रहा है। इसी डर के साथ मैं कल पूरी रात नहीं सोया। आज दिन भर भी लोगों की भीड़ में बस इधर-उधर लगा रहा। अब मेरा सर दर्द के मारे फटने को हो रहा है। लग रहा जैसे अभी फट जाएगा। शायद पूरी नींद न लेने के कारण ऐसा हो। मैं फिर तीसरी बार अपने बिस्तर पर लेट गया हूँ। सभी को गुडनाईट बोल मैं बस सोना चाहता हूँ। लेकिन फी वही डर!! लौट आ रहा है। लगता है जैसे मुझसे कोई बात करना चाहता है। मुझे जगाना चाहता है। चाहता है मै उसके साथ रहूँ। मेरा सर भारी हुआ जा रहा है। लग रहा है जैसे कोई सर पर हथौडा मार रहा हो। मैं सोना चाहता हूँ, मैं अपनी पलकें बंद करना चाहता हूँ!! मैं सोना चाहता हूँ!!!

तुम्हारा मित्र
अदृश्य 

Saturday, October 18, 2014

ज़िन्दगी का असल सच: सन्नाटा!


सन्नाटे में डूब चुका मोहन अब मोहन नहीं अब एक जिंदा लाश बन चूका था.. जिस घर में वो अपने दोस्त के परिवार के साथ रहता था वो ही घर आज एक दम खाली था! मोहन खुद ही उन सब को जम्मू जाने वाली गाडी में बैठा कर आया था। अपने ही घर में पराये हो जाने के बाद, इस दोस्त के घर ने ही मोहन के अकेलेपन को दूर किया था। पर अब यह परिवार भी चला गया।  अकेलेपन की खामोशी मोहन और बर्दास्त न कर पाया!! सन्नाटे ने उसे अपने आगोश में ले लिया था... उसने खुदखुशी करली!!

मोहन की ज़िन्दगी का यह अंत मुझे किसी किरदार का अंत नहीं बल्कि अपना अंत लगा, अपने आस-पास के लोगों का अंत लगा, सभी इंसानों का अंत लगा। वास्तव में कितना अकेला है एक इंसान। जरुरी नहीं है की इंसान जिस अंश से पैदा हो उसी को वह अपने जीवन का अंश माने या वहीँ तक अपना संसार सिमित रखे। जैसे मोहन जिसे अपने दोस्त के परिवार की जुदाई ने मार डाला। अकेलेपन का यह सन्नाटा उसके अपने परिवार से अलग होने से भी ज्यादा खामोश था। क्या अकेलेपन का यह सन्नाटा इतना खतरनाक है।

जब मैं प्राइमरी स्कूल में था तो मैं सबसे ज्यादा अपनी माँ से प्यार करता था। लगता जैसे उनके बिना एक पल रह पाना भी नामुमकिन होगा। उनसे अलग होने का ख्याल ही मुझे मार डालता था। लेकिन अब मैं उसी माँ को छोड़ मीलों दूर तक चला जाता हूँ! व्यस्त  देर समय तक बात नहीं हो पाती और तो और कई बार एक ही घर में रहते हुए भी हम पहले की तरह बैठ कर हँस बोल नहीं पाते!! समय की कमी, ज़िन्दगी में बिजी होना...  बस बहाने केवल बहाने.... वास्तव में तो हम अकेले हो गये है। आज भी जब अपनी छत पर खड़ा हो बचपन की यादों को खंगालता हूँ तो बस एक डर वापस आ जाता है।  लौट आता है वो अकेलेपन का डर, वो सन्नाटा! सन्नाटा कितना अजीब शब्द है न यह! जो डर पहले माँ से जुदा होने का था अब न जाने वो किससे जुदा होने का है पर है... शायद!! इस झूठी दुनिया से, आपसे या फिर खुद से ही जुदा होने का... मुझे मालूम नहीं पर यह डर है। और केवल डर ही नहीं साथ ही गहरा सन्नाटा भी है। ऐसा सन्नाटा जो अन्दर ही अन्दर मुझे नोंचता है, काटता है और मै दर्द में छटपटाहट के अलावा कराह तक भी नहीं पता। अकेला होने क़ा डर, सन्नाटा...

दरअसल बात ऐसी है की मुझे लोगों के बीच रहना पसंद है, इंसानों से घिरा रहना पसंद है। मुझे पसंद हैं जो लोग बोलते है, बतलाते हैं, सुनते हैं, सुनाते हैं... मैं गूंगी, बहरी भीड़ से डरता हूँ। इतेफाकन बहुत डरता हूँ। लगता है जैसे वो मुझे खा जायेगा। उसका सन्नाटा मुझे निगल जाएगा!
रोजाना में कई लोगों से मिलता हूँ, उनसे कहता हूँ, उनकी सुनता हूँ, साथ हँसता हूँ, उदास भी हो जाता हूँ पर... पर रात को जब बिस्तर पर नींद की गोद में गिरने वाला होता हूँ तभी एक साया लौट आता है। वो ही साया जिसने बचपन से ले अबतक कस सन्नाटे को जिंदा रखा और मुझे फिर अकेलेपन का दलदल दिखा डराता है। मैं एक छोटे बच्चे की भांति डर जाता हूँ। अपने को बचाने के लिए अपना चेहरा चादर से ढक लेता हूँ पर वह वहां भीतर भी आ जाता है। मुझे सन्नाटे के कभी न खत्म होने वाली खाई दिखा डरता है और हँसता है पर उसकी हंसी में भी सन्नाटा है....

रोज़ इसी तरह कभी अकेले सफ़र में, कभी बाथरूम में, कभी खाली घर में और कभी बिस्तर पर यह डर मुझे यूँही सताता है, डराता है! कई दफा लोगों से घिरे रहने के बावजूद में मुझे लगता है जैसे यह डर लोगो की हंसी , बातों, ठहाकों को चीरता हुआ मुझ तक आ जाता है। भीड़ के ठहाके, नारें, बातें सभी मुझ पसर थपेड़ों की तरह बरसते है और में उस भीड़ का विरोध नहीं करता क्यों की इस बेतलब के थपेड़ों से ज्यादा डर मुझे उस सन्नाटे का लगता है जो रोज़ रात को मुझे नींद के आने से पहले डंसता है, नोंचता है। न चाहते हुआ भी ऐसी भीड़ में मैं खड़ा होता हूँ की उस सन्नाटे से बच सकूं। पर वहां खड़ा होना भी आसान नहीं... लगता है जैसे मुझे किसी बाजारू औरत की तरह उनके बीच पेश कर दिया गया हो और सभी बोली लगा रहे हो, ठहाके लगा रहे हो... साथ ही मै अपने अन्दर की सन्नाटे पर मुस्कासन का मेकअप पोंत  वहां पड़े किसी निर्मम सामान की तरह यह सब किसी भाव या फिर किसी उतेजना के देखता हूँ। पर यह केवल मेरे साथ तक ही सिमित नहीं है  बल्कि सब के सब ऐसे ही भरे समाज में बाजारू औरतों की तरह खड़े हैं! सभी अकेले हैं, एक दम अकेले!! एक समय माँ से बिछुड़ने का दर सताता था, दूसरे समय स्कूल को दोस्ती सताती है फिर कॉलेज की यारी और अंत में इस दुनिया की रिश्तेदारी... हर कदम पर ऐसे सन्नाटे ऐसे डर इन्सान को घेरे है! मुझे घेरे हैं, आपको घेरे है, हम सब को घेरे हैं... अंदर सब अकेले हैं सब नंगे हैं... पर अफ़सोस होता है रोजाना हमेशा की भांति सभी निकल पड़ते है अपनी झूठी दिल लगी, रिश्तेदारी, यारी का गन्दा खेल खेलने। पर इसे गलत भी नहीं ठहराया जा सकता है। आखिर सभी को किसी ऐसी की जरुरत होती है जिसे मिलकर लगे मैं पूरा हुआ... मुझे मिल गया जिसकी मुझे तलाश थी... मिलकर आनंद आ गया... पर ऐसे कितने हैं जिन्हें ऐसा कोई मिला।

सन्नाटे की इस दुनिया की विडम्बना देखिये, गरीब सोचता है कोई अमीर मिले तो वह पूरा हो जाये, अमीर सोचता है कोई बहुबल मिल जाये, बहुबल किसी गोरी चमड़ी की इच्छा करता है और गोरी चमड़ी किसी सचे की... बस यूँ ही इस चक्र में सब पिसते रहते हैं! सन्नाटे को तोड़ने का अवसर ढूंढते हैं, मौका तलाशते हैं! शायद यही वजह है की इस मॉडर्न होते जमाने में या कहिए सन्नाटे की इस दुनिया में ब्रेकअप व तलाक जैसे अलगावाद शब्दों का बोलबाला होता जा रहा है। आखिर सभी किसी ऐसे की तलाश में है जो उनका ही अंश हो, जो उनका ही हिस्सा हो। और बस इसी अंश की तलाश से तालाक, ब्रेकअप जैसे शब्दों का बाज़ार गर्म हो रहा है। सन्नाटे के इस भंवर जाल ने सबको जकड़ा है बस कोई ज्यादा फंसा है त6 कोई कम पर है सभी नंगे! एक बार इस सन्नाटे का सर्प जब किसी इंसान को डंसता है तो वह फिर इन्सान कहाँ, जिन्दा लाश हो जाता है। यह सन्नाटे का डर ही जो बड़े से बड़े वीर, शिकारी, निडर आदि तक को रूहंसू कर देता है। उनकी चमकती आँखों को भी भीगा डालता है।
यह सन्नाटा!! सन्नाटा भी कितना बेईमान है। जो चाहता है उसे मिलता नहीं है और जिसे यह पकड़ता है उसे छोड़ता नहीं है... सच, बड़ा बेईमान है यह सन्नाटा। कितना अजीब शब्द है न सन्नाटा!!!

मैं न रिश्ते चाहता हूँ,
न ही रिश्तेदार चाहता हूँ
मैं न यारी चाहता हूँ,
न ही यार चाहता हूँ,
मैं तो बस सन्नाटे से बचने के लिए,
सचा दिलदार चाहता हूँ।

Wednesday, October 8, 2014

प्यार, मोहब्बत और शोपिंगः गैलेरीया

अगर आप अपने दोस्तों के साथ कुछ मौज मस्ती और शोपिंग करने का प्लान कर रहें हैं तो गुड़गांव का गलैरीया मार्केट आपके लिए एक अच्छा ऑप्शन हो सकता है। यह मार्केट शहर के शोर-शराबे से थोड़ा दूर, खूले आसामन के नीचे बना है। इसकी लोकेशन और इसकी बनावट इसे मॉल्स और लोकल मार्केट दोनों से ही अलग करता है। यह मॉल्स की तरह एक बंद, ढकी बिल्डिंग में न होकर, नील गगन के नीचे खूले में बना है। साथ ही यहां लोकल मार्केट जैसा न ही कोई शोर है और न ही कोई भीड़ भाड़।

गैलेरीया फाउनटनः
  मार्केट के बीचों-बीच एक फाउनटन बना हुआ है। जो यंगस्टर्स के बीच में लवर्स प्वाइंट के नाम से काफी फेमस है। इसके चारों और बैठने के लिए कुछ बैंच भी लगे हुए हैं। आप यहां अपने फ्रेंड्स और पाटनर्स के साथ कुछ क्वालिटी टाइम बिता सकते हैं। शाम के समय फाउनटन के पास एक दम क्लासिक फील आती है। गलैरीया मार्केट के रेगुलर विजीटर पंकज गहलोत कहते हैं, “खूले आसमान के नीचे बने इस फाउन्टन का अपना एक अलग मजा है। यहां कोई भी अपने दोस्तों के साथ आराम से बैठकर, फाउन्टन के नजारे का लुत्फ उठा सकता है।” मार्केट में आपको कपड़े, गिफ्ट, गैजेट्स से लेकर इलेकट्रोनिक्स, मेडिकल, स्टेशनरी तक सभी के स्टोर मिल जाएंगे। इसके साथ ही आपको फूड और स्नैक्स में भी काफी वैराइटी के स्टोर मिल जाएंगे। मार्केट में ढ़ाबे से लेकर कैफे कॉफी डे, बरीस्ता, डी पॉल्स जैसे ढेरों ब्रैंडे स्टोर्स भी मौजूद हैं। 

कोको बैरी-
अगर गलैरीया के उटर सर्किल की किसी शो पर यंगस्टर्स का जमावड़ा देखने को मिले तो आप चौंकिएगा मत। यह स्टोर है कोको बैरी का जहां का फ्रोजन योग्रट यंगस्टर्स में पॉप्लयर है। शाम के समय यहां काफी यंगस्टर्स देखने को मिल सकते हैं। डीएलएफ गुड़गांव की विजेता बताती हैं, “मैं अक्सर यहां अपना दोस्तों का साथ आती रहती हूं। यहां का फ्रोजन योग्रट मुझे और मेरे फ्रेंड्स को काफी पसंद है” कोको बैरी का यह स्टोर सुबह 10 बजे से लेकर आधी रात ओपन रहता है। ऐसे में अगर आप भी आधी रात को फ्रोजन योग्रटस का लुत्फ उठाना चाहते हैं तो कोको बैरी आपके लिए एक दम ठीक जगह है।

खान चाचाः गलैरीया फाउन्टन से कुछ ही दूर पर खान चाचा का उट्लेट है। यहां के कबाब और रॉल्स बच्चों से लेकर युवओं तक को काफी पसंद हैं। स्टोर मैनेजर, शहदाब का कहना है, हमारा सारा समान दिल्ली की खान मार्केट से आता है। हम यहां स्टोर पर रोस्ट व फाइनल टच देते हैं। जो कस्टमर्स को काफी पसंद आता है। यहां के कबाब वाकई जायकेदार है। अगर आप वेजेटेरियन हैं तो आप यहां वेज-रॉल भी ट्राई कर सकते हैं।

बेस्ट टाइमिंगः
मार्केट सुबह 10 बजे ओपन होना शुरू हो जाता है और रात के 11-12 बजे तक बंद होता है। अगर आप अपने फ्रैंड्स या पाटनर के साथ मार्केट जाने की सोच रहे हैं तो शाम का समय आपके लिए बेस्ट टाइम होगा। शाम को ढलते सूरज की रोशनी में नहाए मार्केट की कुछ अलग ही चमक देखने को मिलती है। दो चाहने वालों के लिए इस पल से बेहतर शायद ही कोई पल हो पाएगा। जब मंद मंद रोशनी में डूबे फाउनटन के सामने दो चाहने वाले शांत मन से एक दूसरे को निहार सकें।

राहगीरीः
अगर आप संडे को अपने फ्रैंड्स के साथ इंजोय करने का प्रोग्राम बना रहे हैं तो गैलेरीया आपके लिए और भी अच्छा ऑप्शन है। हर संडे मार्निंग 7 बजे से गैलेरीया मार्केट में राहगीरी फेस्ट सेलिब्रेट किया जाता है। जहां आप सींगिंग, डांसिंग, पेन्टिंग जैसी तमाम क्रियेटिव चीजों का लुत्फ उठा सकते हैं। इसके अलावा आप अपने फ्रैंड्स के साथ यहां फुटबॉल, स्केटींग और साइकलिंग जैसी सेवाओं का आनंद भी ले सकते हैं। फेस्ट के एंड में आप कृष्णा जून मंडली की लाइव रागनी भी सुन सकते हैं। जिसमें काफी मजा आता है। इस दिन यहां काफी तादाद में यंगस्टर्स आते हैं। आश्रय का कहना है, “राहगीरी के पूरे दिन मस्ती होती है। मैं और मेरे सारे दोस्त दिन भर यहीं डांस और मौज मस्ती करते हैं।” यहां अपने दोस्तों का साथ करी गई मौज मस्ती, आपको हर संडे यहां आने पर मजबूर कर देगी।

मैट्रो की कनेक्टिविटीः गलैरीया मार्केट आप मैट्रो और अपनी कार दोनों से ही आ सकते हैं। यह ईफ्को चौक मैट्रो स्टेशन से 3.1 किलोमीटर और एम जी रोड मैट्रो स्टेशन से 1.7 किलोमीटर की दूरी पर है। मार्केट तक जाने के लिए आपको दोनो ही जगह से कम दाम में ऑटो मिल जाएगा। आप यहां अपनी कार से भी आ सकते हैं। यहां मार्कट के चारों ओर पार्किंग की सुविधा है। जहां आप अपनी कार पार्क कर सकते हैं।

फाइनल वर्डिक्टः
गैलेरीया मार्केट एक ऐसी मार्केट है जहां आप शोपिंग, फूड और रोमांस का मजा एक साथ उठा सकते हैं। यहां आप आजाद परिंदों की तरह अपने पाटनर्स और फ्रैंड्स के साथ घूम सकते हैं और इंजोय कर सकते हैं।