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Saturday, October 18, 2014

ज़िन्दगी का असल सच: सन्नाटा!


सन्नाटे में डूब चुका मोहन अब मोहन नहीं अब एक जिंदा लाश बन चूका था.. जिस घर में वो अपने दोस्त के परिवार के साथ रहता था वो ही घर आज एक दम खाली था! मोहन खुद ही उन सब को जम्मू जाने वाली गाडी में बैठा कर आया था। अपने ही घर में पराये हो जाने के बाद, इस दोस्त के घर ने ही मोहन के अकेलेपन को दूर किया था। पर अब यह परिवार भी चला गया।  अकेलेपन की खामोशी मोहन और बर्दास्त न कर पाया!! सन्नाटे ने उसे अपने आगोश में ले लिया था... उसने खुदखुशी करली!!

मोहन की ज़िन्दगी का यह अंत मुझे किसी किरदार का अंत नहीं बल्कि अपना अंत लगा, अपने आस-पास के लोगों का अंत लगा, सभी इंसानों का अंत लगा। वास्तव में कितना अकेला है एक इंसान। जरुरी नहीं है की इंसान जिस अंश से पैदा हो उसी को वह अपने जीवन का अंश माने या वहीँ तक अपना संसार सिमित रखे। जैसे मोहन जिसे अपने दोस्त के परिवार की जुदाई ने मार डाला। अकेलेपन का यह सन्नाटा उसके अपने परिवार से अलग होने से भी ज्यादा खामोश था। क्या अकेलेपन का यह सन्नाटा इतना खतरनाक है।

जब मैं प्राइमरी स्कूल में था तो मैं सबसे ज्यादा अपनी माँ से प्यार करता था। लगता जैसे उनके बिना एक पल रह पाना भी नामुमकिन होगा। उनसे अलग होने का ख्याल ही मुझे मार डालता था। लेकिन अब मैं उसी माँ को छोड़ मीलों दूर तक चला जाता हूँ! व्यस्त  देर समय तक बात नहीं हो पाती और तो और कई बार एक ही घर में रहते हुए भी हम पहले की तरह बैठ कर हँस बोल नहीं पाते!! समय की कमी, ज़िन्दगी में बिजी होना...  बस बहाने केवल बहाने.... वास्तव में तो हम अकेले हो गये है। आज भी जब अपनी छत पर खड़ा हो बचपन की यादों को खंगालता हूँ तो बस एक डर वापस आ जाता है।  लौट आता है वो अकेलेपन का डर, वो सन्नाटा! सन्नाटा कितना अजीब शब्द है न यह! जो डर पहले माँ से जुदा होने का था अब न जाने वो किससे जुदा होने का है पर है... शायद!! इस झूठी दुनिया से, आपसे या फिर खुद से ही जुदा होने का... मुझे मालूम नहीं पर यह डर है। और केवल डर ही नहीं साथ ही गहरा सन्नाटा भी है। ऐसा सन्नाटा जो अन्दर ही अन्दर मुझे नोंचता है, काटता है और मै दर्द में छटपटाहट के अलावा कराह तक भी नहीं पता। अकेला होने क़ा डर, सन्नाटा...

दरअसल बात ऐसी है की मुझे लोगों के बीच रहना पसंद है, इंसानों से घिरा रहना पसंद है। मुझे पसंद हैं जो लोग बोलते है, बतलाते हैं, सुनते हैं, सुनाते हैं... मैं गूंगी, बहरी भीड़ से डरता हूँ। इतेफाकन बहुत डरता हूँ। लगता है जैसे वो मुझे खा जायेगा। उसका सन्नाटा मुझे निगल जाएगा!
रोजाना में कई लोगों से मिलता हूँ, उनसे कहता हूँ, उनकी सुनता हूँ, साथ हँसता हूँ, उदास भी हो जाता हूँ पर... पर रात को जब बिस्तर पर नींद की गोद में गिरने वाला होता हूँ तभी एक साया लौट आता है। वो ही साया जिसने बचपन से ले अबतक कस सन्नाटे को जिंदा रखा और मुझे फिर अकेलेपन का दलदल दिखा डराता है। मैं एक छोटे बच्चे की भांति डर जाता हूँ। अपने को बचाने के लिए अपना चेहरा चादर से ढक लेता हूँ पर वह वहां भीतर भी आ जाता है। मुझे सन्नाटे के कभी न खत्म होने वाली खाई दिखा डरता है और हँसता है पर उसकी हंसी में भी सन्नाटा है....

रोज़ इसी तरह कभी अकेले सफ़र में, कभी बाथरूम में, कभी खाली घर में और कभी बिस्तर पर यह डर मुझे यूँही सताता है, डराता है! कई दफा लोगों से घिरे रहने के बावजूद में मुझे लगता है जैसे यह डर लोगो की हंसी , बातों, ठहाकों को चीरता हुआ मुझ तक आ जाता है। भीड़ के ठहाके, नारें, बातें सभी मुझ पसर थपेड़ों की तरह बरसते है और में उस भीड़ का विरोध नहीं करता क्यों की इस बेतलब के थपेड़ों से ज्यादा डर मुझे उस सन्नाटे का लगता है जो रोज़ रात को मुझे नींद के आने से पहले डंसता है, नोंचता है। न चाहते हुआ भी ऐसी भीड़ में मैं खड़ा होता हूँ की उस सन्नाटे से बच सकूं। पर वहां खड़ा होना भी आसान नहीं... लगता है जैसे मुझे किसी बाजारू औरत की तरह उनके बीच पेश कर दिया गया हो और सभी बोली लगा रहे हो, ठहाके लगा रहे हो... साथ ही मै अपने अन्दर की सन्नाटे पर मुस्कासन का मेकअप पोंत  वहां पड़े किसी निर्मम सामान की तरह यह सब किसी भाव या फिर किसी उतेजना के देखता हूँ। पर यह केवल मेरे साथ तक ही सिमित नहीं है  बल्कि सब के सब ऐसे ही भरे समाज में बाजारू औरतों की तरह खड़े हैं! सभी अकेले हैं, एक दम अकेले!! एक समय माँ से बिछुड़ने का दर सताता था, दूसरे समय स्कूल को दोस्ती सताती है फिर कॉलेज की यारी और अंत में इस दुनिया की रिश्तेदारी... हर कदम पर ऐसे सन्नाटे ऐसे डर इन्सान को घेरे है! मुझे घेरे हैं, आपको घेरे है, हम सब को घेरे हैं... अंदर सब अकेले हैं सब नंगे हैं... पर अफ़सोस होता है रोजाना हमेशा की भांति सभी निकल पड़ते है अपनी झूठी दिल लगी, रिश्तेदारी, यारी का गन्दा खेल खेलने। पर इसे गलत भी नहीं ठहराया जा सकता है। आखिर सभी को किसी ऐसी की जरुरत होती है जिसे मिलकर लगे मैं पूरा हुआ... मुझे मिल गया जिसकी मुझे तलाश थी... मिलकर आनंद आ गया... पर ऐसे कितने हैं जिन्हें ऐसा कोई मिला।

सन्नाटे की इस दुनिया की विडम्बना देखिये, गरीब सोचता है कोई अमीर मिले तो वह पूरा हो जाये, अमीर सोचता है कोई बहुबल मिल जाये, बहुबल किसी गोरी चमड़ी की इच्छा करता है और गोरी चमड़ी किसी सचे की... बस यूँ ही इस चक्र में सब पिसते रहते हैं! सन्नाटे को तोड़ने का अवसर ढूंढते हैं, मौका तलाशते हैं! शायद यही वजह है की इस मॉडर्न होते जमाने में या कहिए सन्नाटे की इस दुनिया में ब्रेकअप व तलाक जैसे अलगावाद शब्दों का बोलबाला होता जा रहा है। आखिर सभी किसी ऐसे की तलाश में है जो उनका ही अंश हो, जो उनका ही हिस्सा हो। और बस इसी अंश की तलाश से तालाक, ब्रेकअप जैसे शब्दों का बाज़ार गर्म हो रहा है। सन्नाटे के इस भंवर जाल ने सबको जकड़ा है बस कोई ज्यादा फंसा है त6 कोई कम पर है सभी नंगे! एक बार इस सन्नाटे का सर्प जब किसी इंसान को डंसता है तो वह फिर इन्सान कहाँ, जिन्दा लाश हो जाता है। यह सन्नाटे का डर ही जो बड़े से बड़े वीर, शिकारी, निडर आदि तक को रूहंसू कर देता है। उनकी चमकती आँखों को भी भीगा डालता है।
यह सन्नाटा!! सन्नाटा भी कितना बेईमान है। जो चाहता है उसे मिलता नहीं है और जिसे यह पकड़ता है उसे छोड़ता नहीं है... सच, बड़ा बेईमान है यह सन्नाटा। कितना अजीब शब्द है न सन्नाटा!!!

मैं न रिश्ते चाहता हूँ,
न ही रिश्तेदार चाहता हूँ
मैं न यारी चाहता हूँ,
न ही यार चाहता हूँ,
मैं तो बस सन्नाटे से बचने के लिए,
सचा दिलदार चाहता हूँ।