Saturday, September 26, 2015

तुम्हारे साथ नहीं हूं मैं!

दो महीनों से बात नहीं हुई थी हमारी... रोज रोज ब्लैंक मैसेज भेज भेज कर थक गया था... लगता था कि तुम इतनी निर्मम कैसे हो सकती हो... पर फिर मन को समझा लेता था कि नहीं... जो लड़की मेरे लिए अपनी सीमाओं को तोड़ते हुए मुझ से घंटों बातें कर सकती है... वह निर्मम नहीं हो सकती...

मां के फोन पर आज तुम्हारे घर से कॉल आया तो पता चला कि तुम बिमार हो... तुम्हें टायफाइड हो गया है... हालत ऐसी है कि बेड से उठ नहीं पा रही हो और गले से एक भी निवाला नीचे नहीं उतर रहा है...

मन में पीड़ा की लहरे जोर मारने लगीं... सब कुछ छोड़ तुम्हारे पास आ जाना चाहता था... लेकिन जैसे दूसरी घटनाओं में तुम्हारा साथ नहीं दे पाता वैसे ही इस बिमारी में भी तुम्हारे साथ मेरा होना असंभव ही रहा....

दिन भर तुम्हारे बारे में सोचता रहा लेकिन कुछ कर न सका सिवाय एक ब्लैंक मैसेज के...

कितना अजीब होता है न यह सब... जब मुझे तुम्हारे साथ होना चाहिए तभी मैं तुमसे दूर हूं.... तुम्हारे पास नहीं हूं... आखिर क्यों है ऐसा...

Thursday, September 10, 2015

लीजिए वापस आ गए हम...

आज फिर लौट आया हूं अपने चाहने वालों के कारण... काफी दिनों से शिकायत थी लोगों कि आखिर मेरी और तुम्हारी मुलाकात कहां तक पहुंची ? सपनों की नगर और मीलों की दूरी को क्या हम अंजाम तक पहुंचा पाए या नहीं ... आज से एक बार फिर लौट आया हूं लेकर अपनी कहानी....


कुछ दिनों तक बात नहीं हो पाई  थी हमारी.... तुम घर पर थी और घर पर तमाम रिश्तेदार, हमारी कहानी में सबसे बड़ा कोई रोड़ा था तो रिश्तेदारी ही थी.. खैर, इन दिनों बातचीत कम थी.... दिनभर तुम घर के काम से घिरी रहती फुरसत मिलती तो रिश्तेदार पकड़ लेते, उनके मुक्ति मिलती तो तुम्हारी कॉलेज की किताबें, मैं नहीं चाहता था कि तुम्हें बे-वजह परेशान करूं इस लिए जैसे तय हुआ था.. कि इस दो महीने सप्ताह में केवल एक बार बात होगी... की उम्मीद लगाए बैठा था मैं....

लेकिन रोजना सुबह उठते ही  तुम्हें ब्लैंक मैसेज भेजना नहीं भूलता था मैं.. शायद मेरा स्वार्थ था यह! सोचता था कि शायद इस मैसेज ही मैं अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता रहूंगा... लेकिन मुझे क्या पता था मेरी अनुपस्थिति किसी और की उपस्थिति में तब्दिल हो जाएगी, कोई और मेरी जगह ले लेगा, मेरे रचे सपने से मुझे ही निकाल दिया जाएगा....

Tuesday, September 1, 2015

आइए... बैठ कर रो लेते हैं आज...

जिंदगी की भाग दौड़ में आप कब अपने आपको भूल जाते हैं यह आपको खुद भी नहीं पता चलता है... आओ जरा बैठ लेते जरा रो लेते हैं..... जिंदगी में रोना भी बहुत जरूरी है मेरे यार... यकिन मानिए आप अगर आप दुनिया के साबसे ताकतवर लोगों में से एक हैं और आप रो नहीं सकते हैं तो दुनिया में आपसे कमजोर कोई नहीं है। झूठे हैं वे लोग जो आपको ताकतवर कहते हैं... मैं कहता हूं ताकतवर वो होते हैं जो रो लेते और रोकर आगे बढ़ जाते हैं... जिंदगी में सब रंग हैं... आप खुशी चाहते हैं, सुख चाहते हैं, हांसी चाहते हैं, सदा मुस्कुराते रहना चाहते हैं.... लेकिन शायद ही आपने कभी चाहा होगा कि आप रोएं... दो मिनट... बस दो मिनट लगता है रोने में लेकिन यह दो मिनट कम से कम 6 महीने तक के लिए आपको फ्रैश कर देता है... मैनटली फ्रैश... सर का कोई बोझ हल्का हो जाता है.. लगता है जैसे दिल पर रखा पत्थर हटा दिया हो किसी ने .... भारी सांसे फिर नॉर्मल होने लगती हैं... आप फिर एनर्जाइज हो जाते हैं... रो लीजिए... थोड़ा सा रो लीजिए... आखिरी बार कब रोए थे आप? कब आपने आपनी आंखों को कहा था कि जा आ दिल में गढ़े शब्दों को आसूंओं के जरिए बाहर निकाल दे.... कह दीजिए... आज दिल को बह जाने दीजिए.... यहां नहीं तो बथरूम में रो लिजिए पर अब तो रो लीजिए... कितना भार उठाए घूमेंगे इस दिल पर... कुछ तो भार कम कर दीजिए...

Saturday, August 1, 2015

सपना! सच या झूठ है यह सपना....

आज ही मिलने का वादा हुआ था। 11 मार्च 2015 हां 11 मार्च... आज ही के दिन तुम्हारा एग्जाम था और तुम्हारे एग्जाम के लिए ऑफिस से स्पेशल ऑफ लेकर मैं मीलों का सफर तय करने को तैयार हो गया था। अब इंतजार था तो तुम्हारे फोन का... तय हुआ था कि तुम मुझे फोन करोगी और फिर मैं यहां दिल्ली से निकलूंगा...


मैं ऑफ लेकर तुम्हारे फोन कॉल का ही इंतार करत रहा... 8 मार्च को तुम्हें घर लाने के लिए राजी तो कर लिया था पर मुझे क्या मालूम था कि मैं ही तु्म्हारे पास नहीं पहुंच पाऊंगा....

9 और 10 मार्च के वे 42 घंटे कितने भारी थे यह मैं ही जानता था... बार बार मेरा ध्यान बस फोन पर ही लगा हुआ था। एक आश थी कि अब तुम्हारा फोन आएगा... तब तुम्हारा फोन आएगा...

लेकिन आज यह 42 घंटे भी 42 सालों की तरह तिल-तिल कर के बीत गए... न मैं तुम्हारे घर न तुम्हारा कॉल मेरे पास....

पूरे दिन फोन के पास ही बैठा रहा.. कहीं ऐसा न हो कि तुम फोन करो और मैं फोन ही न उठा पाऊं... कभी फोन की बैट्री चैक करता तो कभी फोन का नेटवर्क... क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि तुम्हारा फोन आए और हमारी बात न हो पाए....


दो दिनों के लंबे इंतजार के बाद भी तुम्हारा फोन जब नहीं आया तो मैं समझ गया कि मैं एक बार फिर तुम्हारी बातों में फंस गया। काश मैंने उस दिन तुम्हारी बात न मानी होती और कहा दिया होता कि मैं आ रहा हूं। चाहे तुम फोन करो या नहीं.....

पर नहीं मैं तो तुम्हारे उस फोन कॉल के इंतजार मैं बैठा रहा जो आया ही नहीं...


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तुम्हें पता है मैंने 9 और 10 दोनों ही रातों को केवल एक ही सपना देखा.... सपने में तुम थी, तुम्हारा कॉलेज था, बाइक थी और मैं था.... नींद में तो सपना देख बहुत खुश हुआ था मैं पर जैसे ही सुबह मेरी आंख खुली में स्तब्ध रह गया... क्योंकि मैं जानता था कि जो सपने मैं देखता हूं वह कभी सच नहीं हुआ करते हैं... समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं... आखिर कैसे तुम मेरे सपनों में आ गई... मैं यह सोच कर परेशान ही था पर मन में ख्याल आया कि ऐसा कुछ नहीं होगा... और एक बार फिर मैं गलती कर बैठा.... बैठ गया दो दिन तक तुम्हारे इंतजार में... सपना सच होने के इंतजार में.... तुम से मिलने के इंतजार में... और यह इंतजार आज तक इंतजार ही है....



11 मार्च 2015




 

Wednesday, July 22, 2015

आ घर लौट चलें!

07 मार्च को तुमने पुछा था कौन सा घर, कैसा घर... तुम यकिन मानोगी कि आज भी जब मेरे कानों में तुम्हारी वह आवाज गूंजती है तो मेरे पैरों तले धरती खिसक जाती है, सामने आंधेरा छा जाता है, सांसे धीमी हो जाती हैं...

ऐसा ही कुछ उस दिन भी हुआ था। बातें ऐसे मोड़ पर छूट गईं थीं जहां से आगे कोई रास्ता मुझे सुझ ही नहीं रहा था। इसलिए उस पूरी रात में मैं बस तुम्हारे ही ख्यालों में खोया रहा। मुझे मालूम था कि तुम्हारे ऐसे सवालों के पीछे तुम्हारा जरूर कोई मकसद रहा होगा। तुमने जरूर कुछ सोचकर ही ऐसे बेरूखी से यह बातें कह डाली होगीं... तुम्हारे मन में भी इस घर आने के लिए हिलोरे जरूर उठते होंगे पर फिर भी ऐसे रवैया क्यों... मैं परेशान हो रहा था। मन था कि बस कैसे भी तुम्हारे पास पहुंच जाऊं, तुम्हें पूछूं कि आखिर ऐसी कौन सी वजह है जो तुम अब इस घर को भूल गई। पर अफसोस यह मीलों की दूरी!!

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तुम्हारी उस बात को 42 से ज्यादा घंटे बीते चुके हैं पर मेरा दिल और दिमाग अब भी वहीं मेरे ऑफिस के टेरेस पर अटका हुआ है जहां तुमने घर आने को लेकर सवाल दाग दिए थे। इन 42 घंटों का एक एक पल मेरे लिए कितना भारी रहा यह शायद तड़प-तड़प कर मरने वाली मछली भी न समझ पाएगी। मैं तुमसे बात करना चाहता था, तुम्हें समझाना चाहता था, तुमपर गुस्सा और तुमसे नाराज भी होना चाहता था पर मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहा था। मैं बेबस, लाचार, असाहय यह सब सहता रहा....

शाम के 7 बजे... रणभूमि में तबदिल हो चुके उस न्यूजरूम में मैं भी बैठा हुआ रोजाना की तरह अपनी खबरों को एडिट किए जा रहा था पर बार बार मेरा हाथ अपने आप उस जेब में चला जा रहा था जिस जेब में पड़े मोबाइल को तुम्हारे कॉल का इंतजार था... और वह वक्त शाम 8 बजे आ ही गया... 90 के दशक का ब्लक एंड व्हाइट न्यूजरूम एकाएक क्लरफूल न्यूजरूम में तब्दिल हो गया, पतझड़ से सावन आ गया... मोरों ने नाचना शुरू कर दिया और उधर से तुम्हारी आवाज आई

'हैल्लो'

यार पता है कितना परेशान हूं मैं यहां....

क्यों क्या हुआ.?

तुम्हें नहीं पता....




और फिर खबरों की रणभूमि से कहीं दूर हम एक बार फिर घर की चर्चा पर लौट आए थे। पूरे 43 मिनट लगे थे तुम्हें वापस घर लाने के लिए तैयार करने में.... तुम भी कम जिद्दी नहीं... एक से एक तर्क दिए थे तुमने.... पर आखिरकार तुमने घर आने की हामी तो भर ही दी....



08 मार्च 2015

Thursday, April 16, 2015

मौका!

उस दिन के बाद से मनो ज़िन्दग बेरंग हो चली है। लगता है सीने का एक हिस्सा कट कर गिरा जा रहा है। मुझे तुमसे बात करनी है। तुम्हे समझाना है कि कौन सा घर! कैसा घर! मुझे तुम्हे बताना है कि मैं उसी घर की बात कर रहा था की जिसका अस्तित्व तुम्हारी हाँ से ही आया था! तुम्हे उस घर लाने की बात कर रहा था जहाँ आने का तुमने वादा किया था! जहाँ तुम्हारे आने का ख्वाब मैंने सोते जागते देखा है!

उस दिन हमारी बात पूरी न हो सकी। तुम बीच में चली गयी पर मैं, मैं अभी तक वहीं खड़ा हूँ। यह सोचकर खड़ा हूँ कि तुम्हे तुम्हारे सवाल "घर! कौन सा घर?" का जवाब दूंगा। तुम्हे समझाऊंगा। पर अफ़सोस अभी तक तुम्हारा कोई अता-पता नहीं है। रोज़ की ही तरह इस 03 मार्च के बाद मैंने न जाने तुम्हे कितने ब्लेंक मेसेज किए कि शायद एक बार तुम्हे मेरा ख्याल आ जाए और हमारी बात हो जाए पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। तुम्हारा कोई जवाब नहीं आया।

क्या तुम सच में इतनी निष्ठुर हो गयी हो या फिर कोई मज़बूरी है! कोई मज़बूरी ही होगी! हमारे इस रिश्ते में न जाने कितने मजबूरियां है जो हमें चाह कर भी एक नहीं होने देती हैं! तुम्हे घर नहीं आने देती हैं! मुझे नींद नहीं आने देती हैं!

उस दिन के बाद अब मन उदास सा रहता है। मेरी दोस्त मुझे कहती है,"यार तू मोटीवेट अच्छा करता है।"
अब उसे क्या बताऊँ कि यहाँ मेरी जिंदगी में ही मोटिवेशन की कितनी जरुरत है। काश! काश मैं तुम्हे समझा पाता! काश एक बार हमारी फिर बात हो जाती!

हर सुबह उठाते ही इस उम्मीद से  तुम्हे ब्लेंक मेसेज सेंड करता हूँ कि शायद आज हमारी बात हो जाए! शायद तुम्हे समझाने का एक मौका मिल जाए!

पर अफ़सोस ! न कोई जवाब आता है , न ही मैं तुम्हे कुछ समझा पा रहा हूँ। बस अपना सीने में दर्द लिए यूंही घुट-घुट के जिए जा रहा हूँ!!

07 मार्च 2015

Saturday, April 11, 2015

घर ? कौन सा घर ?

तो तय हो चूका था की मुझे 11 मार्च की सुबह तुम्हारे पास किसी भी हाल में पहुंचना ही है। खुदा ने भी साथ दिया और सब मामला फिट हो गया। कॉलेज का लास्ट एग्जाम 10 की बजाय 09 को निकला, ऑफिस से एक वार फिर छुट्टी मिल गयी और घरवाले भी मुझे बाहर भेजने को तैयार हो गए।

अब बस इंतज़ार था तो उस घड़ी का जब मैं तो और तुम साथ होंगे! बेसब्री मुझ पर हावी हुई जा रही थी कि कब हम मिलेंगे! कब मैं तुम्हे बाइक के पीछे बैठा तुम्हारे कॉलेज छोड़ने जाऊंगा! कब मैं जी भर के तुम्हारा दीदार कर सकूँगा!!

ऐसे ही तमाम ख्याली पुलावों की कल्पना करता हुआ मैं फुला न समा रहा था और तभी आज दोपहर तुम्हारा कॉल आ गया।

बातें! प्रेम की वो बातें आज फिर शुरू होने से पहले ही कहीं खो गयी! मैंने तुम्हे बतया था कि मैं 11 को आ रहा हूँ और फिर तुम्हे तुम्हारक एग्जाम सेंटर लेकर चलूँगा। मालूम नहीं यह सुन तुम्हारे दिल में प्रेम का पवित्र कमल खिला था या नहीं पर मैंने जैसे ही कहा," और फिर तुम भी तो जल्द यहाँ, आ रही हो ! हमेशा के लिए! यहाँ हमारे घर!"

"घर! कौन सा घर?" तुमने पूछा था।

तुम्हारा यह सवाल सुनते ही लड़खड़ा गया था मैं। अपने को सँभालते हुए मैंने कहा," मेरे घर, यहाँ दिल्ली। आ रही हो न तुम, हमेशा के लिए"

"हाँ, देखो कभी आएंगे घूमने के लिए"

"घूमने के लिए! एक मिनट! घूमने के लिए... हमेशा रहने के लिए"

"हमेशा रहने के लिए...?? यह तो संभव नहीं है" तुमने कहा था। यह सुनते ही लगा जैसे मेरे पैरों के निचे की जमीन कहीं खिसक गयी!!

"तुमने वादा किया था तुम हमेशा के लिए मेरे साथ रहने आओगी। हम दोनों अपना बुढ़ापा एक साथ काटेंगे।"

"ऐसा कुछ भी संभव नहीं है। ज्यादा से ज्यादा हम वहाँ केवल घूमने के लिए आ सकते हैं।"

"क्यों ऐसे कुछ संभव क्यों नहीं हैं। क्या तुम आना नहीं चाहती" ट्रैक्टरों के इंजन की तरह धड़कते दिल को सँभालते हुए मैंने पूछा।

"मेरे चाहने यह न चाहने से कुछ नहीं होगा। हमरा परिवार, यह समाज कभी हमें एक साथ नहीं होने देगा"

"ऐसा कुछ नहीं है तुम कोशिश तो करो। हिम्मत क्यों हार रही हो"

"हमें पता है यह सम्भव नहीं हो सकता। यह असंभव है।" एक अजीब तरह की झिझक थी तुम्हरी आवाज़ में।

" अरे बाबा! तुम क्यों ऐसा सोचती हो। तुम घर आ रही हो बस! और कुछ नहीं। अभी झुंझलाहट को छुपातेहुए कहा था मैंने।

" घर! कौन सा घर! जैसा हम सोच रहे हैं वो बिलकुल भी संभव नहीं है।"

"अरे बिलकुल सम्भव है... दिक्कत क्या आखिर! हमने सब सोच कर रखा हुआ है..."  और मैंने जो कुछ सोच रखा था वो सब तुम्हे सुना डाला। और तुम हमेशा की तरह एक बार फिर चुप चाप सोचती रही।

"मैंने कुछ ज्यादा ही बोल दिया..."

"नहीं नहीं... अच्छा लगा सुनकर कि कोई हमारे बारे में इतना कुछ सोचता है।" तुमने कहा था।

चेहरे पर आई एक छोटी सी मुस्कान के साथ कहा था की तो फिर तुम  रही हो न घर!

"घर! कौन सा घर! यह संभव नहीं....  " कहते कहते तुम चली गयी.…  तुम्हे किसी ने बुला लिया और मैं अपने ख्याली पुलावों के साथ अपने पैरों के नीचे से खिसकी जमीन तलाशने लगा।

घर! कौन सा घर! 

( 03 मार्च 2015)