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Friday, August 29, 2014

लज्जा: इलाहाबाद से दिल्ली का हमसफ़र



आज अपनी बुकशेल्फ साफ करते समय महसूस हुआ कि शेल्फ में रखी हर किताब के साथ मेरी कोई न कोई कहानी जरूर जुड़ी हुई है। सभी के साथ एक अजीब सा रिश्ता बना हुआ है।
यह बात उस समय की है जब मैंने अपनी स्कूलिंग खत्म कर कॉलेज में दाखिला लेने के लिए भाग दौड़ कर रहा था। उन दिनों अक्सर इलाहावाद आना जाना लगा रहता है। एक बार रात में करीब 10 बजे इलाहबाद युनिवर्सिटी का एन्ट्रंस इग्जाम देकर लौटते समय, ट्रेन का प्लेटफॉर्म पर इंतजार कर रहा था। इतने में मेरी नजर प्लेटफॉर्म पर बने बुक स्टोर पर गई। काफी पुराना बुक स्टोर था। हालत भी कुछ ज्यादा ठीक ठाक न थी। अब अकेला इंसान प्लेटफॉर्म पर ट्रेन का इंतजार कर रहा था तो सोचा चलो इसे ही निहार लिया जाए बुकस्टोर के पास पहुंचा तो वहां बस कुछ गिनी-चुनी किताबें हीं थी। दुकानदार साहब भी सुबह के बचे अखबारों को समेट रहे थे। निराशा हुई कि यहां तो कुछ ज्यादा देखने को है ही नहीं। दरासल जेब में पैसे तो इतने थे नहीं की अगर कोई बढ़िया किताब मौजूद हो तो उसे खरीद सकूं तो बस निहारने ही गया पर निराशा ही हाथ लगी।
दुकानदार भाई साहब से पूछा, "कोई किताब है किसी मशहूर लेखक की ..."

"जो है तुम्हारे सामने है भईया, इनमें से कुछ लेना है तो बताओ भईया दिखा देता हूं।" दुकान से जवाब आया

"हहहहमममम.... मुझे तो किताबों की कुछ ज्यादा समझ है नहीं क्या लूं इनमें से"

"भईया मैं क्या बताउं आपको जो लेना है बताओ मैं दिखा देता हूं"

"कुछ ऐसा है आपके पास जिसे मैं दिल्ली पहुंचने तक पढ़ सकूं।" मैंने पूछा

"ऐसी तो मैग्जिन होती हैं, वो तो है नहीं भईया... बस कुछ आठ दस ये ही पूरानी किताबें हैं। इन्हें कोई पूछता नहीं।"

"अच्छा... दिखाओ वो ही दिखओ।"

दुकानदार ने अपनी दुकान की आठ दस किताबें टेबल पर ला कर रख दी। अब मुझे भी नया नया रोग लगा था किताबें पढ़ने का तो इतनी जानकारी कहां की कौन सी किताब लूं।

"भईया रहने दो कोई भी ठीक नहीं लग रही है।" मैंने कहा।

"भईया ज्यादातर लोग प्लेटफॉर्म पर अखबार पढ़ते हैं तो इसलिए ज्यादा किताबें नहीं और फिर स्टेशन के बाहर बाजार है सभी वहीं से किताबें लेते हैं।" दुकानदार ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।

दुकानदार की बात सुन मैं भी अपना मन सिकोड़ अपने फोन में लग गया। फोन से सर हटा ऊपर उठाया तो मेरी नजर दुकान में पड़ी एक किताब की ओर जा टिकी। गौर से देखा तो मालूम चला कि यह तो वही किताब थी जिसके बारे में अपने स्कूल टिचर्स व घर वालों से काफी सुना था। सुना था इस किताब के साथ कई हंगामें हुए थे। इसकी लेखिका को तो मार डालने तक का फरमान जारी कर दिया गया था। मैंने फॉरन दुकानदार से कहा, भईया जरा वो किताब दिखाना
अरे यह किताब तो दिखाना ही भूल गया था। यह बी काफी पूरानी है कई दिनों से रखी हुई है। बस यही एक ही कॉपी है इसकी....  दुकानदार कहता रहा पर मैं उसकी बातों को अनसुना कर किताब के पन्नों में कुछ तलाशने लगा।
कुछ तो ऐसा मिले जिससे सिद्ध हो सके कि यह वही किताब है जिसके बारे में मैंने सुना है।

मैं पन्नों को पलटता रहा, कुछ ढूंढता रहा... और फिर एक एक कर के किताब से जुड़ी सारी बातें मेरी आंखो के सामने आते गए। मुझे यकिन ही नहीं हो रहा था कि मेरे हाथ मैं वह किताब है जिसके बारे में मैंनें इतना कुछ सुना है। जिसको एक दो दिल्ली में ढ़ूंढने का प्रयास भी किया पर असफल रहा।
मैंने दुकानदार से किताब का दाम पूछा, तो वह किताब को अपने हाथ में ले उसे देखता हुआ बोला, "भईया 80 की है पर आपके लिए 70।"
मैंने तुरंत उसे 50-50 के दो नोट थमाए और किताब ले ली। अब यह किताब मेरी थी।

तसलीमा नसरीन की किताब, "लज्जा" अब मेरे पास भी थी। किताब को पा लेने कि वो खुशी बयान नहॆ की जा सकती। लग रहा था न जाने कौन सा कोई पूराना खोया समान मिल गया था।

तसलीमा नसरीन कि किताब को पढ़ते -पढते इलाहाबाद से दिल्ली का सफर कैसे तय हो गया पता ही नहीं चला। दिल्ली पहूंच कर भी किताब को मैंने छोड़ नहीं। दिन रात मैं इसके साथ लगा रहा और करीब दो दिन में इसे पढ़ डाला।



चोट्टू की कहानी...