अब उसे क्या बताऊँ कि यहाँ मेरी जिंदगी में ही मोटिवेशन की कितनी जरुरत है। काश! काश मैं तुम्हे समझा पाता! काश एक बार हमारी फिर बात हो जाती!
Thursday, April 16, 2015
मौका!
अब उसे क्या बताऊँ कि यहाँ मेरी जिंदगी में ही मोटिवेशन की कितनी जरुरत है। काश! काश मैं तुम्हे समझा पाता! काश एक बार हमारी फिर बात हो जाती!
Saturday, April 11, 2015
घर ? कौन सा घर ?
Monday, April 6, 2015
ये दूरी और मज़बूरी!!
तुम्हारा फोन काट गया। तुम वहां अपने एग्जाम की तैयारी में लगा गयी और यहाँ मैं!
मेरे सामने एक ऐसा चक्रव्यूह खड़ा था जिसमे से निकलने का कोई रास्ता न है। अभी हाल ही में ऑफिस से छुट्टी ले घूमकर आया हूँ और फिर अब दोबारा 4 दिन की छुट्टी मिल पाना तो मुश्किल है। 4 दिन से ज्यादा कहने को तो 4 दिन है पर असल में तो ये 4 दिन केवल चंद मिनटों की मुलाकात के लिए हैं।
मेरे सामने एक बड़ा सवाल है, यदि मुझे ऑफिस से छुट्टी मिल भी जाए, मेरे कॉलेज के एग्जाम भी किसी तरह एडजस्ट हो जाये और घर वालों को भी एडजस्ट कर तुमसे मिलने निकल लूँ तो क्या इतना आसान होगा।
फोन कट करते है इंडियन रेलवेज की वेबसाइट चेक की तो पता चला की 9 और 10 दोनों में ही दी। 300-300 वेटिंग टिकट है। मतलब साफ़ था की यदि सब एडजस्ट भी हो जाये तो भी तुमसे मिलने के लिए किसी युद्ध से कम संघर्ष नहीं करना है। उसपर भी वहां तुम्हारे पास पहुँच कर यह भी निश्चित नहीं है कि हमारी मुलाकात हो भी पायेगी या नहीं।
भारतीय रेलवे से तो अब कोई उम्मीद है नहीं। यदि तुमसे मिलना है तो हमें पूरी रात बिना सोए, ट्रेन में घूमते-घुमाते, बैठते उठाते हुए 14 घंटों का सफ़र तो करना ही होगा। इसके बाद भी यह संघर्ष यहीं नहीं खत्म होगा। इसके बाद तुमसे मिल अगले दिन फिर दिल्ली के लिए भी ऐसे ही सफर करना होगा। कुल मिलाकर यदि तुमसे मिलना है तो उसके लिए 4 दिन बिना सोए, बिना आराम किए लगातार सफर करना होगा और ऑफिस, फैमिली और कॉलेज को भी पूरा दिमाग लगा एडजस्ट करना पड़ेगा।
इंडियन रेलवे के बाद नंबर थे कॉलेज का। दोस्त से डेट शीट मंगावाई और देखते ही दिल को सकून मिल गया। पहली बार जी कर रहा था की जिस ने भी डेट शीट बनाई है उसे जा जाकर शुक्रिया कह आऊं। हमारे इंटरनल एग्जाम 09 को ही खत्म हो रहे थे और इसके बाद प्रक्टिकल में भी कुछ दिनों का गैप था। मतलब कॉलेज की तरफ से मेरा रास्ता क्लियर था। 09 को आखिरी एग्जाम दो और 10 को तुमसे मिलने निकल पडूँ। लेकिन अभी भी ऑफिस और फैमिली का क्या करना है कुछ समझ नहीं आ रहा था।
रात भर तुमसे मिलने का ख्याल दिल में चलता रहा। मन मवि उथल-पुथल मची रही। रोज़ ही रात को 1-2 बजे सोता था पर आज तो पूरी रात नींद ही न आई!!
अगला दिन
आज ऑफिस पहुँचते ही मैंने रिसेप्शन से लीव एप्लीकेशन फॉर्म ले लिया औए उसे भर अपने सीनियर के पास उसे अप्प्रूव् होने के लिए भेज दिया।
ऍप्लिकेशम देखते ही उन्होंने मुझे अपने केबिन में बुलाया और कहा," तुम अभी तो छुट्टी पर से आये और फिर छुट्टी... करते क्या ही भाई इतनी छुट्टियों का ?"
"सर वो कॉलेज में एग्जाम है न तो इसलिए ऑफ चाहिए वरना सर आपको पता है मैं वीक ऑफ भी नहीं लेता"
"चलिए ठीक है देखते हैं, 10 से 13 अप्रैल तक चाहिए न छुट्टी? चार दिन के लिए?"
"जी सर, 10 से 13 अप्रैल तक" झूठ बोलते वक़्त मेरी आँखें अपने आप नीची हो गयी थी।
जब एग्जाम था तब तो मैंने ऑफ लिया नहीं और अब तुमसे मिलने के लिए एग्जाम का बहाना लगा ऑफ की अर्ज़ी दे दी है।
वैसे भी अब तुमसे मिलना है तो फिर चाहे लाख मुसीबत आये अब तो तुमसे मिलना ही है।
31 मार्च 2015
Friday, April 3, 2015
मिलन की चाह !
शाम का वक़्त था और धीरे धीरे ऑफिस में रिपोर्टरों का जमावड़ा लगाना शुरू हो गया था। वैसे भी अखबारों में असली काम तो शाम को ही शुरू होता है।
रोज़ की तरह ही एडिटर्स रूम में खबरों के चयन को लेकर मीटिंग चल रही थी। मीटिंग से वापस अपने डेस्क पर आ अपना फोन देखा तो एक मिस कॉल!! कल ही तुम्हारे बारे में यहाँ लिखा और देखो आज ही तुम्हारा कॉल आ गया।

