Monday, November 3, 2014

पत्र-मुझे सोना है!!


प्रिय रजत,


आज कल कुछ अजीब हो रहा है मेरे साथ। इस पत्र के जरिये मैं अपने मन की बात तुम तक पहुँचाना चाहता हूँ।

पिछले कुछ दिनों से में रोज़ रात बिस्तर में जा गिरता हूँ इस उम्मीद कस साथ कि बस मेरी आँख लग जायेगी, मुझे नींद आ जाएगी। लेकिन यह बेईमान बिस्तर मुझे गिर देता है। मुझे गिरा देता है मेरे ख्यालों से , मुझे ऐसे ही छोड़ देता है। मैं बार बार कोशिश करता हूँ मुझे नींद आ जाये, मेरी पलकें वन्द हो जाये लेकिन ऐसा होता नहीं। कल मैंने एक दो बार नहीं बल्कि 6 दफा कोशिश करी शायद मुझे नींद आ जाये लेकिन नहीं। मैं जिन्दा लाश की तरह पड़ा रहा अपने बिस्तर पर, आँखें खुली रही, करवट बदलता रहा। न जाने कहाँ से लग गयी मुझे यह बिमारी। मुझे बिनार होना बिल्कुक पसंद नहीं पर क्या यह बीमारी है, नींद न आना बीमारी है? नही, नहीं ऐसा नहीं है। मैं ठीक हूँ। मुझे कुछ नहीं हुआ है।

दरअसल मेरे अंदर ही अंदर मुझे एक डर सताए जा रहा है, नोंचे जा रहा है पर मुझे सोने नहीं दे रहा है। इसी डर के साथ मैं कल पूरी रात नहीं सोया। आज दिन भर भी लोगों की भीड़ में बस इधर-उधर लगा रहा। अब मेरा सर दर्द के मारे फटने को हो रहा है। लग रहा जैसे अभी फट जाएगा। शायद पूरी नींद न लेने के कारण ऐसा हो। मैं फिर तीसरी बार अपने बिस्तर पर लेट गया हूँ। सभी को गुडनाईट बोल मैं बस सोना चाहता हूँ। लेकिन फी वही डर!! लौट आ रहा है। लगता है जैसे मुझसे कोई बात करना चाहता है। मुझे जगाना चाहता है। चाहता है मै उसके साथ रहूँ। मेरा सर भारी हुआ जा रहा है। लग रहा है जैसे कोई सर पर हथौडा मार रहा हो। मैं सोना चाहता हूँ, मैं अपनी पलकें बंद करना चाहता हूँ!! मैं सोना चाहता हूँ!!!

तुम्हारा मित्र
अदृश्य 

Saturday, October 18, 2014

ज़िन्दगी का असल सच: सन्नाटा!


सन्नाटे में डूब चुका मोहन अब मोहन नहीं अब एक जिंदा लाश बन चूका था.. जिस घर में वो अपने दोस्त के परिवार के साथ रहता था वो ही घर आज एक दम खाली था! मोहन खुद ही उन सब को जम्मू जाने वाली गाडी में बैठा कर आया था। अपने ही घर में पराये हो जाने के बाद, इस दोस्त के घर ने ही मोहन के अकेलेपन को दूर किया था। पर अब यह परिवार भी चला गया।  अकेलेपन की खामोशी मोहन और बर्दास्त न कर पाया!! सन्नाटे ने उसे अपने आगोश में ले लिया था... उसने खुदखुशी करली!!

मोहन की ज़िन्दगी का यह अंत मुझे किसी किरदार का अंत नहीं बल्कि अपना अंत लगा, अपने आस-पास के लोगों का अंत लगा, सभी इंसानों का अंत लगा। वास्तव में कितना अकेला है एक इंसान। जरुरी नहीं है की इंसान जिस अंश से पैदा हो उसी को वह अपने जीवन का अंश माने या वहीँ तक अपना संसार सिमित रखे। जैसे मोहन जिसे अपने दोस्त के परिवार की जुदाई ने मार डाला। अकेलेपन का यह सन्नाटा उसके अपने परिवार से अलग होने से भी ज्यादा खामोश था। क्या अकेलेपन का यह सन्नाटा इतना खतरनाक है।

जब मैं प्राइमरी स्कूल में था तो मैं सबसे ज्यादा अपनी माँ से प्यार करता था। लगता जैसे उनके बिना एक पल रह पाना भी नामुमकिन होगा। उनसे अलग होने का ख्याल ही मुझे मार डालता था। लेकिन अब मैं उसी माँ को छोड़ मीलों दूर तक चला जाता हूँ! व्यस्त  देर समय तक बात नहीं हो पाती और तो और कई बार एक ही घर में रहते हुए भी हम पहले की तरह बैठ कर हँस बोल नहीं पाते!! समय की कमी, ज़िन्दगी में बिजी होना...  बस बहाने केवल बहाने.... वास्तव में तो हम अकेले हो गये है। आज भी जब अपनी छत पर खड़ा हो बचपन की यादों को खंगालता हूँ तो बस एक डर वापस आ जाता है।  लौट आता है वो अकेलेपन का डर, वो सन्नाटा! सन्नाटा कितना अजीब शब्द है न यह! जो डर पहले माँ से जुदा होने का था अब न जाने वो किससे जुदा होने का है पर है... शायद!! इस झूठी दुनिया से, आपसे या फिर खुद से ही जुदा होने का... मुझे मालूम नहीं पर यह डर है। और केवल डर ही नहीं साथ ही गहरा सन्नाटा भी है। ऐसा सन्नाटा जो अन्दर ही अन्दर मुझे नोंचता है, काटता है और मै दर्द में छटपटाहट के अलावा कराह तक भी नहीं पता। अकेला होने क़ा डर, सन्नाटा...

दरअसल बात ऐसी है की मुझे लोगों के बीच रहना पसंद है, इंसानों से घिरा रहना पसंद है। मुझे पसंद हैं जो लोग बोलते है, बतलाते हैं, सुनते हैं, सुनाते हैं... मैं गूंगी, बहरी भीड़ से डरता हूँ। इतेफाकन बहुत डरता हूँ। लगता है जैसे वो मुझे खा जायेगा। उसका सन्नाटा मुझे निगल जाएगा!
रोजाना में कई लोगों से मिलता हूँ, उनसे कहता हूँ, उनकी सुनता हूँ, साथ हँसता हूँ, उदास भी हो जाता हूँ पर... पर रात को जब बिस्तर पर नींद की गोद में गिरने वाला होता हूँ तभी एक साया लौट आता है। वो ही साया जिसने बचपन से ले अबतक कस सन्नाटे को जिंदा रखा और मुझे फिर अकेलेपन का दलदल दिखा डराता है। मैं एक छोटे बच्चे की भांति डर जाता हूँ। अपने को बचाने के लिए अपना चेहरा चादर से ढक लेता हूँ पर वह वहां भीतर भी आ जाता है। मुझे सन्नाटे के कभी न खत्म होने वाली खाई दिखा डरता है और हँसता है पर उसकी हंसी में भी सन्नाटा है....

रोज़ इसी तरह कभी अकेले सफ़र में, कभी बाथरूम में, कभी खाली घर में और कभी बिस्तर पर यह डर मुझे यूँही सताता है, डराता है! कई दफा लोगों से घिरे रहने के बावजूद में मुझे लगता है जैसे यह डर लोगो की हंसी , बातों, ठहाकों को चीरता हुआ मुझ तक आ जाता है। भीड़ के ठहाके, नारें, बातें सभी मुझ पसर थपेड़ों की तरह बरसते है और में उस भीड़ का विरोध नहीं करता क्यों की इस बेतलब के थपेड़ों से ज्यादा डर मुझे उस सन्नाटे का लगता है जो रोज़ रात को मुझे नींद के आने से पहले डंसता है, नोंचता है। न चाहते हुआ भी ऐसी भीड़ में मैं खड़ा होता हूँ की उस सन्नाटे से बच सकूं। पर वहां खड़ा होना भी आसान नहीं... लगता है जैसे मुझे किसी बाजारू औरत की तरह उनके बीच पेश कर दिया गया हो और सभी बोली लगा रहे हो, ठहाके लगा रहे हो... साथ ही मै अपने अन्दर की सन्नाटे पर मुस्कासन का मेकअप पोंत  वहां पड़े किसी निर्मम सामान की तरह यह सब किसी भाव या फिर किसी उतेजना के देखता हूँ। पर यह केवल मेरे साथ तक ही सिमित नहीं है  बल्कि सब के सब ऐसे ही भरे समाज में बाजारू औरतों की तरह खड़े हैं! सभी अकेले हैं, एक दम अकेले!! एक समय माँ से बिछुड़ने का दर सताता था, दूसरे समय स्कूल को दोस्ती सताती है फिर कॉलेज की यारी और अंत में इस दुनिया की रिश्तेदारी... हर कदम पर ऐसे सन्नाटे ऐसे डर इन्सान को घेरे है! मुझे घेरे हैं, आपको घेरे है, हम सब को घेरे हैं... अंदर सब अकेले हैं सब नंगे हैं... पर अफ़सोस होता है रोजाना हमेशा की भांति सभी निकल पड़ते है अपनी झूठी दिल लगी, रिश्तेदारी, यारी का गन्दा खेल खेलने। पर इसे गलत भी नहीं ठहराया जा सकता है। आखिर सभी को किसी ऐसी की जरुरत होती है जिसे मिलकर लगे मैं पूरा हुआ... मुझे मिल गया जिसकी मुझे तलाश थी... मिलकर आनंद आ गया... पर ऐसे कितने हैं जिन्हें ऐसा कोई मिला।

सन्नाटे की इस दुनिया की विडम्बना देखिये, गरीब सोचता है कोई अमीर मिले तो वह पूरा हो जाये, अमीर सोचता है कोई बहुबल मिल जाये, बहुबल किसी गोरी चमड़ी की इच्छा करता है और गोरी चमड़ी किसी सचे की... बस यूँ ही इस चक्र में सब पिसते रहते हैं! सन्नाटे को तोड़ने का अवसर ढूंढते हैं, मौका तलाशते हैं! शायद यही वजह है की इस मॉडर्न होते जमाने में या कहिए सन्नाटे की इस दुनिया में ब्रेकअप व तलाक जैसे अलगावाद शब्दों का बोलबाला होता जा रहा है। आखिर सभी किसी ऐसे की तलाश में है जो उनका ही अंश हो, जो उनका ही हिस्सा हो। और बस इसी अंश की तलाश से तालाक, ब्रेकअप जैसे शब्दों का बाज़ार गर्म हो रहा है। सन्नाटे के इस भंवर जाल ने सबको जकड़ा है बस कोई ज्यादा फंसा है त6 कोई कम पर है सभी नंगे! एक बार इस सन्नाटे का सर्प जब किसी इंसान को डंसता है तो वह फिर इन्सान कहाँ, जिन्दा लाश हो जाता है। यह सन्नाटे का डर ही जो बड़े से बड़े वीर, शिकारी, निडर आदि तक को रूहंसू कर देता है। उनकी चमकती आँखों को भी भीगा डालता है।
यह सन्नाटा!! सन्नाटा भी कितना बेईमान है। जो चाहता है उसे मिलता नहीं है और जिसे यह पकड़ता है उसे छोड़ता नहीं है... सच, बड़ा बेईमान है यह सन्नाटा। कितना अजीब शब्द है न सन्नाटा!!!

मैं न रिश्ते चाहता हूँ,
न ही रिश्तेदार चाहता हूँ
मैं न यारी चाहता हूँ,
न ही यार चाहता हूँ,
मैं तो बस सन्नाटे से बचने के लिए,
सचा दिलदार चाहता हूँ।

Wednesday, October 8, 2014

प्यार, मोहब्बत और शोपिंगः गैलेरीया

अगर आप अपने दोस्तों के साथ कुछ मौज मस्ती और शोपिंग करने का प्लान कर रहें हैं तो गुड़गांव का गलैरीया मार्केट आपके लिए एक अच्छा ऑप्शन हो सकता है। यह मार्केट शहर के शोर-शराबे से थोड़ा दूर, खूले आसामन के नीचे बना है। इसकी लोकेशन और इसकी बनावट इसे मॉल्स और लोकल मार्केट दोनों से ही अलग करता है। यह मॉल्स की तरह एक बंद, ढकी बिल्डिंग में न होकर, नील गगन के नीचे खूले में बना है। साथ ही यहां लोकल मार्केट जैसा न ही कोई शोर है और न ही कोई भीड़ भाड़।

गैलेरीया फाउनटनः
  मार्केट के बीचों-बीच एक फाउनटन बना हुआ है। जो यंगस्टर्स के बीच में लवर्स प्वाइंट के नाम से काफी फेमस है। इसके चारों और बैठने के लिए कुछ बैंच भी लगे हुए हैं। आप यहां अपने फ्रेंड्स और पाटनर्स के साथ कुछ क्वालिटी टाइम बिता सकते हैं। शाम के समय फाउनटन के पास एक दम क्लासिक फील आती है। गलैरीया मार्केट के रेगुलर विजीटर पंकज गहलोत कहते हैं, “खूले आसमान के नीचे बने इस फाउन्टन का अपना एक अलग मजा है। यहां कोई भी अपने दोस्तों के साथ आराम से बैठकर, फाउन्टन के नजारे का लुत्फ उठा सकता है।” मार्केट में आपको कपड़े, गिफ्ट, गैजेट्स से लेकर इलेकट्रोनिक्स, मेडिकल, स्टेशनरी तक सभी के स्टोर मिल जाएंगे। इसके साथ ही आपको फूड और स्नैक्स में भी काफी वैराइटी के स्टोर मिल जाएंगे। मार्केट में ढ़ाबे से लेकर कैफे कॉफी डे, बरीस्ता, डी पॉल्स जैसे ढेरों ब्रैंडे स्टोर्स भी मौजूद हैं। 

कोको बैरी-
अगर गलैरीया के उटर सर्किल की किसी शो पर यंगस्टर्स का जमावड़ा देखने को मिले तो आप चौंकिएगा मत। यह स्टोर है कोको बैरी का जहां का फ्रोजन योग्रट यंगस्टर्स में पॉप्लयर है। शाम के समय यहां काफी यंगस्टर्स देखने को मिल सकते हैं। डीएलएफ गुड़गांव की विजेता बताती हैं, “मैं अक्सर यहां अपना दोस्तों का साथ आती रहती हूं। यहां का फ्रोजन योग्रट मुझे और मेरे फ्रेंड्स को काफी पसंद है” कोको बैरी का यह स्टोर सुबह 10 बजे से लेकर आधी रात ओपन रहता है। ऐसे में अगर आप भी आधी रात को फ्रोजन योग्रटस का लुत्फ उठाना चाहते हैं तो कोको बैरी आपके लिए एक दम ठीक जगह है।

खान चाचाः गलैरीया फाउन्टन से कुछ ही दूर पर खान चाचा का उट्लेट है। यहां के कबाब और रॉल्स बच्चों से लेकर युवओं तक को काफी पसंद हैं। स्टोर मैनेजर, शहदाब का कहना है, हमारा सारा समान दिल्ली की खान मार्केट से आता है। हम यहां स्टोर पर रोस्ट व फाइनल टच देते हैं। जो कस्टमर्स को काफी पसंद आता है। यहां के कबाब वाकई जायकेदार है। अगर आप वेजेटेरियन हैं तो आप यहां वेज-रॉल भी ट्राई कर सकते हैं।

बेस्ट टाइमिंगः
मार्केट सुबह 10 बजे ओपन होना शुरू हो जाता है और रात के 11-12 बजे तक बंद होता है। अगर आप अपने फ्रैंड्स या पाटनर के साथ मार्केट जाने की सोच रहे हैं तो शाम का समय आपके लिए बेस्ट टाइम होगा। शाम को ढलते सूरज की रोशनी में नहाए मार्केट की कुछ अलग ही चमक देखने को मिलती है। दो चाहने वालों के लिए इस पल से बेहतर शायद ही कोई पल हो पाएगा। जब मंद मंद रोशनी में डूबे फाउनटन के सामने दो चाहने वाले शांत मन से एक दूसरे को निहार सकें।

राहगीरीः
अगर आप संडे को अपने फ्रैंड्स के साथ इंजोय करने का प्रोग्राम बना रहे हैं तो गैलेरीया आपके लिए और भी अच्छा ऑप्शन है। हर संडे मार्निंग 7 बजे से गैलेरीया मार्केट में राहगीरी फेस्ट सेलिब्रेट किया जाता है। जहां आप सींगिंग, डांसिंग, पेन्टिंग जैसी तमाम क्रियेटिव चीजों का लुत्फ उठा सकते हैं। इसके अलावा आप अपने फ्रैंड्स के साथ यहां फुटबॉल, स्केटींग और साइकलिंग जैसी सेवाओं का आनंद भी ले सकते हैं। फेस्ट के एंड में आप कृष्णा जून मंडली की लाइव रागनी भी सुन सकते हैं। जिसमें काफी मजा आता है। इस दिन यहां काफी तादाद में यंगस्टर्स आते हैं। आश्रय का कहना है, “राहगीरी के पूरे दिन मस्ती होती है। मैं और मेरे सारे दोस्त दिन भर यहीं डांस और मौज मस्ती करते हैं।” यहां अपने दोस्तों का साथ करी गई मौज मस्ती, आपको हर संडे यहां आने पर मजबूर कर देगी।

मैट्रो की कनेक्टिविटीः गलैरीया मार्केट आप मैट्रो और अपनी कार दोनों से ही आ सकते हैं। यह ईफ्को चौक मैट्रो स्टेशन से 3.1 किलोमीटर और एम जी रोड मैट्रो स्टेशन से 1.7 किलोमीटर की दूरी पर है। मार्केट तक जाने के लिए आपको दोनो ही जगह से कम दाम में ऑटो मिल जाएगा। आप यहां अपनी कार से भी आ सकते हैं। यहां मार्कट के चारों ओर पार्किंग की सुविधा है। जहां आप अपनी कार पार्क कर सकते हैं।

फाइनल वर्डिक्टः
गैलेरीया मार्केट एक ऐसी मार्केट है जहां आप शोपिंग, फूड और रोमांस का मजा एक साथ उठा सकते हैं। यहां आप आजाद परिंदों की तरह अपने पाटनर्स और फ्रैंड्स के साथ घूम सकते हैं और इंजोय कर सकते हैं।






Monday, September 15, 2014

सदर बोले तो खरीदारी में ऑल इन वन

अगर आपको कोई समान पूरे शहर में नहीं मिल रहा है तो आपको जरुरत है शहर के सदर बाजार आने की। ये बाजार गुड़गांव की गगन चुंबी इमारतों से कुछ ही दूर पर है। करीब 65 साल की उम्र का यह बाजार गुड़गांव के बस अड्डे के पास ही है। ये गुडगंव का ऐसा बाजार है जहां आपको सब कुछ मिल जाएगा।

ए से लेकर जेड तक है यहां: सदर बाजार में आपको ए से लेकर जेड तक सब मिल जाएगा। यहां आपको कपड़े, ऐक्सेसरीज़ और गैजेट्स के साथ साथ अच्छा फूड भी मिलेगा। गुडगांव के भविष्य अरोड़ा का कहना है, “मैं यहां हफ्ते-दो हफ्ते में आता रहता हूं। जब भी मुझे कोई भी समान गुड़गांव के मॉलस् में नहीं मिलती तो मैं यहीं आता हूं। यहां सभी टाइप का समान मिल जाता है।” पूरे शहर में सदर बाजार अपनी इसी खास क्वालिटी के लिए काफी फेमस है।

मिलती है खास वैराइअटी:
करीब पांच किलोमीटर से ज्यादा एरिया में फैला सदर बाजार आपको काफी वैराइअटी ऑफर करता है। यहां एक ही चीज की कई दुकानें हैं जो आपको अच्छी-खासी वैराइअटी प्रोवाइड करती हैं। इसके साथ ही बाजार में कई स्ट्रीट वेंडर्स भी हैं। जिनसे आप कई इंट्रस्टिंग और नई ऐक्सेसरीज़ खरीद सकते हैं।

जेब पर नहीं पड़ता असर:
सदर बाजार में ढेर सारी दुकानें हैं। यहां से शोपिंग करने का सबसे बड़ा फायदा है सेविंग्स। यहां आपको अच्छे कपड़े और टेस्टी फूड के लिए अपनी जेब पर खासा जोर नहीं डालना पड़ेगा। बाजार में ढेर सारी दुकानें हैं जहां से आप रेट्स कम्पेयर कर सकते हैं। यहां आपको सभी सामन आपके बजट में मिल जाएगा। सदर बाजार से शोपिंग करने पर आपको एक और बेनफिट भी मिलता है। वे यह कि आप यहां जमकर बार्गिनिंग कर सकते हैं। अगर आप निगोशीएसन में अच्छे हैं तो सदर बाजार आपके लिए एक कूल मार्केट हो सकता है।

सरदार की जलेबी:
बाजार से अंदर आते ही कुछ कदमों की दूरी पर मिलती हैं सरदार की गरमा-गरम जलेबियां। पिछले 6 दशकों से ज्यादा सालों से ये गुड़गांव को अपनी जलेबियां खिलाते आए हैं। ‌‌दुकान पर जलेबियां बनाने वाले भगवान दास करीब 45 सालों से सरदार जी की ही दुकान पर जलेबियां बनाते आए हैं। इसके साथ ही दुकान पर केवल गरमा गरम करारी जलेबियां ही मिलती हैं। बावजूद इसके आपको अपनी बारी के लिए कुछ समय इंतजार करना पड़ सकता है। दुकान पर बनी जलेबियां न केवल गुड़गांव मे फेमस है बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी काफी फेमस है। दुकान के मालिक गुरदीप बताते हैं ‘‘लोग हमारी जलेबियां केरला, बैंगलोर, मुंबई जैसे कई शहरों में ले जाते हैं।” ऐसे में अगर आप सदर बजार जाने की सोच रहे हैं तो सरदार की जलेबियों की मिठास चखना तो बनता ही है।

बाल जी स्वीट्स एंड रेंस्तरा: सदर बाजार के दूसरे छोर पर बना बाल जी स्वीट्स एंड रेस्तरां। ये रेस्तरां भी बाजार की पुरानी दुकानों में से एक है। यहां के छोले भठूरे और ब्रेड पकोड़े लोगों को काफी पसंद हैं। यहां के छोले भठूरों का लाजवाब स्वाद आपको यहां दोबारा आने पर मजबूर कर देगा। दुकान के मालिक बालकृष्ण बताते हैं, “हमारे यहां जो ग्रहाक एक बार आता है, वो दोबारा जरूर आता है। ज्यादातर लोग हमारे यहां ब्रैड पकोडे और छोले भठूरे खाना पसंद करते हैं।” रेस्तरां पर दोपहर व शाम के समय काफी भीड़ हो जाती है। अगर आप मसालेदार व चटपटा खाने के शौकिन हैं तो बालजी आपके लिए एकदम सही जगह है।

साथ हैं ताजा सब्जियां भी:
बाजार के पीछे ही सब्जी मंडी है। जहां से आप फ्रेश सब्जियां ले सकते हैं। मंडी होने कारण आपको यहां काफी कम दाम पर सब्जियां मिल जाएंगीं। 

बुक स्टोर का भी है जलवा: बाजार में कई बुक डिपो हैं। जहां आपको हर तरह का स्टेशनरी का समान मिल जाएगा। मंगला एंड कंपनी के मालिक आशिष का कहना है, “हमारे यहां काफी दूर दूर से स्टूडेंट्स आते हैं। बाजार में सभी तरह के फॉर्म मौजूद हैं। जो यंगस्टर्स को बाजार की ओर काफी अट्रैक्ट करता है।” अगर आप भी किसी फॉर्म या स्टेशनरी समान की तलाश में हैं इधर उधर घुम रहे हैं तो सदर बाजार आपके लिए एक कारगर जगह साबित हो सकती है। 

पूरे वीक रहता है ओपन: अगर आप शोपिंग करने का प्लान बना रहे हैं पर समय की कमी के कारण नहीं जा पा रहे हैं तो सदर बाजार आपके लिए एकदम ठीक बाजार है। आप चाहे कॉलेज गोइंग स्टूडेंट हों या फिर किसी भी प्रोफेशन में आप कभी भी सदर बाजार जा सकते हैं। यह मार्केट पूरे वीक ओपन रहती है। बाजार रोजाना सुबह 09:30 बजे खुल जाता है और रात 09:30 तक अपने ढलान की ओर बढ़ने लगता है।




Saturday, September 6, 2014

फूडिज़ का गुड टाउन अड्डा सेक्टर 29




किसी ने ठीक ही कहा है, इंसान के दिल का रास्ता उसके पेट से होकर गुजरता है और आगर आप भी ऐसे ही किसी के दिल में अपनी जगह बनाना चाहते हैं तो सेक्टर 29 की मार्केट आपके लिए एक दम सही जगह है। यहां आपको एक से एक फूडी अड्डे मिल जाएंगें। मार्किट में इंडियन फूड से लेकर चाइनीज, इटेलियन फूड के साथ आपको कई क्लब और पब्स भी मिल जाएंगे हैं। मार्किट में फूड की बढ़ी रेंज होने के कारण ही इस मार्केट को चटोरों का बाजार भी कहा जाता है। यह मार्किट फूडिज़ में काफी फेमस है। यहां आपको कई तरह का फूड मिलता है।

शाही मेहमान की खातिरदारीः मार्किट में मौजूद 21 गन सेल्यूट के नाम का यह रेस्तरां काफी शाही टाइप का है। यहां पर आप राजा महराजा वाली पूरी फिलींग ले सकते हैं। यह रेस्तरां केवल अपने नॉर्थन इंडियन फूड के लिए ही नहीं बल्कि अपने विंडेज कॉलेक्शन के लिए भी फेमस हैं। रेस्तरां में ही दो विंटेज कार और दो बाइस खड़ी हैं। जो काफी कूल लगती हैं। इसके साथ ही रेस्तरां में कई पूराने कैमरा, टेलिफोन और घड़ियां भी हैं। जो आप रेस्तरां में खाना खाते खाते निहार सकते हैं। रेस्तरां का फूड ठीक-ठाक है। आप यहां अपने पार्टनर के यहां क्वालिटी टाइम स्पेंड कर सकते हैं।

इंपोर्डेट कोरियन फूडः कोरियन फूड के लिए यह रेस्तरां आपके लिए बेस्ट प्लेस है। राजधानी दिल्ली और एनसीआर में अपना लोहा मनवा चुके इस रेस्तरां में आपको इंपोर्टेड मीट का लुत्फ का मौका भी मिलता है। अगर आप यहां किसी के साथ डेट पर जाना चाहते हैं तो यह बेस्ट प्लेस है। एक तो यहां आपको बेस्ट कोरियन फूड मिसचता है, साथ ही आप यहां अपने लिए पर्सनल डानिंग रूम भी बुक कर सकते हैं।

मुगले-ए-आजम की दावतः आगर आप मुगल खाने के शौकिन हैं तो इस जगह से बेहतर आपके लिए कोई भी ऑप्शन नहीं है। यह जगह है मार्किट में बना पिंड बल्लुची। मार्किट में बेस्ट मुगल फूड सर्व करने वाले इस रेस्तरां में आपको आपनी बारी के लिए थोड़ा इंतजार भी करना पड़ सकता है। यमी फूड के साथ साथ आपकी जेब का ख्याल रखने वाले इस रेस्तरां में अक्सर काफी लोग नजर आते हैं। आईपी में पढ़ने वाले, दिपक गहलोत बताते हैं, मुझे यहां का बटर चिकन काफी पसंद हैं। जिसके लिए मैं यहां अपने दोस्तों के साथ कई बार आता रहता हूं।

साउथ इंडियन फूड का तड़काः मार्किट में आपको साउथ इंडियन फूड के लिए ज्यादा इधर उधर दौड़ने की जरूरत नहीं है। मार्किट में बना सागर रतना अपने साउथ इंडियन फूड के लिए काफी पसंद किया जाता है। जहां आप साउथ इंडियन फूड का लुत्फ उठा सकते हैं।
चाइनीज और सी-फूड का मिजाज़ः मार्किट में हर तरह का फूड मौजूद है। सी फूड के लिए आप स्वागत और चाइनीज फूड के लिए यो चाइना व चीन-चीन ट्राई कर सकते हैं। यह तीनों ही अपने फूड के लिए बेस्ट हैं।


स्ट्रीट फूड का देसी अड्डाः अगर आप स्ट्रीट फूड के दिवाने हैं तो आप बिकानेरवाहा जा सकते हैंय़ यहां आप गोलगप्पे चाट के अलावा नार्थ इंडियन फूड भी ट्राई कर सकते हैं। यहां की सबसे अच्छी बात यह हैं कि यह काफी किफायती है। यहां आपकी जेब पर खास असर नहीं पड़ता।

फास्ट फूड का भी इंतजामः मार्किट में फास्ट फूड के लिए कई स्टोर हैं। यहां मैक्डोनल्ड, सब-वे, डोमिनोज़ जैसे कई ब्रैंड मौजूद हैं। जहां पिज्जा, बर्गर फास्ट फूड ट्राई कर सकते हैं। इसके अलावा मार्किट में दो व्रियुरीस हैं। डाउन टाउन और हॉप एन ब्रयु में आपको फ्रेस ड्रिंक्स मिल सकती हैं। साथ ही आपको यहां कॉनटिनेंटल, इटेलियन और थाई फूड भी मिल जाएगा। 

डेटिंग के लिए बेस्टः अगर आप अपने पार्टनर के साथ डेट पर जाना चाहते हैं तो यह मार्किट के एक दम बेस्ट है। यहां ऐसे ढेरों रेंस्तरा हैं जहां आप अपने पार्टनर के साथ क्वालिटी टाइम स्पेंड कर सकते हैं। यहां के कई रेस्तरां में आप अपने लिए प्राइवेट डाइनिंग स्पेस बुक करवा सकते हैं।

मैट्रो की कनेक्टीवीटीः मार्किट आने के लिए आप मैट्रो और अनी गाड़ी दोनों का यूज कर सकते हैं। यहां पहुंचने के लिए आप हुड्डा सिटी सेंटर और ईफ्फो चौक मैट्रो स्टेशन दोनों का य़ूज कर सकते हें। जहां से रिक्शा या ऑटो लेकर मार्किट पहुंच सकते हैं। अगर आप अपनी गाड़ी से मार्किट आना चाहते हैं तो आपको पार्किंग की टेंशन लेने की कोई जरूरत नहीं है। मार्किट में पार्किंग के लिए काफी स्पेस है और सबसे कूल बात यह है कि यहां की पार्किंग बिलकुल फ्री है। 

 फोटो क्रेडिटः अविजीत सिंह (अविग्राफी)

Saturday, August 30, 2014

लॉन्ग ड्राइव, मस्ती और परांठे: मुरथल


दूर तक जाती खुली सड़क, सड़क के दोनों ओर लहलहाते खेत और खेतों के बीच बना एक फर्स्ट क्लास रेंस्तरा। नेचर के करीब बने इस रेंस्तरा का नाम है सुखदेव दा ढ़ाबा। जो आपको किसी भी फाइव स्टार रेंस्तरा से बढिया सर्विस दे सकता है। साथ ही अगर आप अपने अज़ीज़ दोस्तों के साथ एक लंबी सी ड्राइव एंजोय करना चाहते हैं तो मुरथल में बना सुखदेव दा ढाबा आपके लिए एक दम ठीक जगह है। यहां आप लॉन्ग ड्राइव के बाद न केवल लाजवाब परांठों का लुत्फ उठा सकते हैं बल्कि आप यहां शोपिंग भी कर सकते हैं।

ढाबे का देशी खाना : ढाबा अपने देशी मक्खन और परंठो के लिए काफी फेमस है। यहां आपको परंठो के साथ सुखदेव की बनाई दही और ढेर सारा मक्खन मिलेगा। जिसका लाजवाब स्वाद आपको पूरा देशी फील देता है। ढाबे का पूरा मैन्यू वेजेटेरियन है। यहां आप आलू परांठा, आलू प्याज परांठा और पनीर के पराठों के साथ-साथ शाही पनीर और दाल मक्खनी भी ट्राई कर सकते हैं। इसके अलावा ढाबे में साउथ इंडियन, कानटिनेंटल और चाइनिज फुड भी एविलेबल है। साथ ही ढाबे के गेट पर गोल-गप्पे और टिक्की जैसै ज़ायकेदार स्नैक्स भी मौजूद है। जिसका लुत्फ आप सामने हाईवे पर सरपट दौड़ती गाडियों और ठंडी हवाओं के साथ उठा सकते हैं।

कभी भी आओ जाओ : सुखदेव दा ढाबे पर आप कभी आ-जा सकते हैं। आप यहां अर्लि मॉर्निंग से लेट नाइट तक कभी भी जा सकते हैं। नेशनल हाइवे पर होने के कारण ढाबा हफ्ते के सातों दिन चौब्बिसों घंटे खुला रहता है। ज्यादातर स्टूडेंटस और यंगस्टर्स यहां वर्किंग डेस् में ही आते हैं। इसके आलावा दिल्ली और एनसीआर के कई बाईकिंग ग्रुपस भी यहां कई बार यहां रात को काफी भीड़ हो जाती है। तब आपको अपनी बारी के लिए 10 से 15 मीनट इंतजार भी करना पड़ सकता है।

ढाबे में शोपिंग का मज़ा: सुखदेव दा ढाबा में ही कई दुकानें बनी हुई हैं। ढाबे पर शॉपिंग करने का अपना एक अलग मजा है। यहां गारमेंट्स, गिफ्ट्स, एनटीक्स, बुक्स, मुविज़ सीडी और मोबाइल की दुकानें हैं। जहां से आप अपने व अपने दोस्तों के साथ- साथ अपने घर के लिए भी काफी कुछ खरीद सकते हैं। ढाबे में बनी एनटीक्स की दुकान पर आपको काफी कुछ नया देखने को मिलेगा। यहां से आप आपने घर के लिए भी काफी डेकोरेटिव चीजें खरीद सकतें हैं। दूर दूर से आए यंगस्टर्स यहां की गिफ्ट शॉप से भी शॉपिंग करना काफी पसंद करते हैं। ढाबे की गारमेंट्स शोप से आप अपने लिए कुर्ते और ट्रैंडी टी शर्ट ट्राई कर सकते हैं। अपने फ्रेंड्स के लिए आप यहां से काफी कूल गिफ्ट्स भी खरीद सकते हैं।  

लोकेशन : राजधानी दिल्ली से 58 किलोमिटर दूर, लहलहाते खेतों में बना है साखदेव दा ढाबा। ढाबे के आस पास काफी खेत हैं। जो आपको बिलकुल ठेट देशी फिलिंग देता है। ढाबे के सामने ही 50 से 60 गाडियों के पार्किंग की जगह है। जहां आप आपनी गाडी पार्क कर सकते हैं।

सीधा है रास्ता : दिल्ली और सोनीपत से ढाबा 58 किलोमीटर दूर है। यह मेन नेशनल हाइवे एनएच1 पर ही बना है। अगर आप दिल्ली से अमृतसर जा रहे हैं तो यह आपके लेफ्ट में पड़ेगा।


आस पास कई और भी अड्डे :  मुरथल में कई और भी अड्डे जहां आप आपने दोस्तों के साथ इंजोय कर सकते हैं। दिल्ली से जाते समय सुखदेव के ढाबे से करीब 5.7 किलोमीटर पहले जुरासिक पार्क पड़ता है। जहां आप अपने दोस्तों के साथ मौज- मस्ती कर सकते हैं। साथ ही अगर आप सुखदेव के ढाबे से करीब 3.6 किलोमीटर अमृतसर की ओर जाएंगे तो वहां आप हवेली रेस्तरां भी ट्राई कर सकते हैं। इसके अलावा आप मुरथल में हल्दीराम और मैक डोन्लड जैसै ब्रैंण्ड का लुत्फ भी उठा सकते हैं।

Friday, August 29, 2014

लज्जा: इलाहाबाद से दिल्ली का हमसफ़र



आज अपनी बुकशेल्फ साफ करते समय महसूस हुआ कि शेल्फ में रखी हर किताब के साथ मेरी कोई न कोई कहानी जरूर जुड़ी हुई है। सभी के साथ एक अजीब सा रिश्ता बना हुआ है।
यह बात उस समय की है जब मैंने अपनी स्कूलिंग खत्म कर कॉलेज में दाखिला लेने के लिए भाग दौड़ कर रहा था। उन दिनों अक्सर इलाहावाद आना जाना लगा रहता है। एक बार रात में करीब 10 बजे इलाहबाद युनिवर्सिटी का एन्ट्रंस इग्जाम देकर लौटते समय, ट्रेन का प्लेटफॉर्म पर इंतजार कर रहा था। इतने में मेरी नजर प्लेटफॉर्म पर बने बुक स्टोर पर गई। काफी पुराना बुक स्टोर था। हालत भी कुछ ज्यादा ठीक ठाक न थी। अब अकेला इंसान प्लेटफॉर्म पर ट्रेन का इंतजार कर रहा था तो सोचा चलो इसे ही निहार लिया जाए बुकस्टोर के पास पहुंचा तो वहां बस कुछ गिनी-चुनी किताबें हीं थी। दुकानदार साहब भी सुबह के बचे अखबारों को समेट रहे थे। निराशा हुई कि यहां तो कुछ ज्यादा देखने को है ही नहीं। दरासल जेब में पैसे तो इतने थे नहीं की अगर कोई बढ़िया किताब मौजूद हो तो उसे खरीद सकूं तो बस निहारने ही गया पर निराशा ही हाथ लगी।
दुकानदार भाई साहब से पूछा, "कोई किताब है किसी मशहूर लेखक की ..."

"जो है तुम्हारे सामने है भईया, इनमें से कुछ लेना है तो बताओ भईया दिखा देता हूं।" दुकान से जवाब आया

"हहहहमममम.... मुझे तो किताबों की कुछ ज्यादा समझ है नहीं क्या लूं इनमें से"

"भईया मैं क्या बताउं आपको जो लेना है बताओ मैं दिखा देता हूं"

"कुछ ऐसा है आपके पास जिसे मैं दिल्ली पहुंचने तक पढ़ सकूं।" मैंने पूछा

"ऐसी तो मैग्जिन होती हैं, वो तो है नहीं भईया... बस कुछ आठ दस ये ही पूरानी किताबें हैं। इन्हें कोई पूछता नहीं।"

"अच्छा... दिखाओ वो ही दिखओ।"

दुकानदार ने अपनी दुकान की आठ दस किताबें टेबल पर ला कर रख दी। अब मुझे भी नया नया रोग लगा था किताबें पढ़ने का तो इतनी जानकारी कहां की कौन सी किताब लूं।

"भईया रहने दो कोई भी ठीक नहीं लग रही है।" मैंने कहा।

"भईया ज्यादातर लोग प्लेटफॉर्म पर अखबार पढ़ते हैं तो इसलिए ज्यादा किताबें नहीं और फिर स्टेशन के बाहर बाजार है सभी वहीं से किताबें लेते हैं।" दुकानदार ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।

दुकानदार की बात सुन मैं भी अपना मन सिकोड़ अपने फोन में लग गया। फोन से सर हटा ऊपर उठाया तो मेरी नजर दुकान में पड़ी एक किताब की ओर जा टिकी। गौर से देखा तो मालूम चला कि यह तो वही किताब थी जिसके बारे में अपने स्कूल टिचर्स व घर वालों से काफी सुना था। सुना था इस किताब के साथ कई हंगामें हुए थे। इसकी लेखिका को तो मार डालने तक का फरमान जारी कर दिया गया था। मैंने फॉरन दुकानदार से कहा, भईया जरा वो किताब दिखाना
अरे यह किताब तो दिखाना ही भूल गया था। यह बी काफी पूरानी है कई दिनों से रखी हुई है। बस यही एक ही कॉपी है इसकी....  दुकानदार कहता रहा पर मैं उसकी बातों को अनसुना कर किताब के पन्नों में कुछ तलाशने लगा।
कुछ तो ऐसा मिले जिससे सिद्ध हो सके कि यह वही किताब है जिसके बारे में मैंने सुना है।

मैं पन्नों को पलटता रहा, कुछ ढूंढता रहा... और फिर एक एक कर के किताब से जुड़ी सारी बातें मेरी आंखो के सामने आते गए। मुझे यकिन ही नहीं हो रहा था कि मेरे हाथ मैं वह किताब है जिसके बारे में मैंनें इतना कुछ सुना है। जिसको एक दो दिल्ली में ढ़ूंढने का प्रयास भी किया पर असफल रहा।
मैंने दुकानदार से किताब का दाम पूछा, तो वह किताब को अपने हाथ में ले उसे देखता हुआ बोला, "भईया 80 की है पर आपके लिए 70।"
मैंने तुरंत उसे 50-50 के दो नोट थमाए और किताब ले ली। अब यह किताब मेरी थी।

तसलीमा नसरीन की किताब, "लज्जा" अब मेरे पास भी थी। किताब को पा लेने कि वो खुशी बयान नहॆ की जा सकती। लग रहा था न जाने कौन सा कोई पूराना खोया समान मिल गया था।

तसलीमा नसरीन कि किताब को पढ़ते -पढते इलाहाबाद से दिल्ली का सफर कैसे तय हो गया पता ही नहीं चला। दिल्ली पहूंच कर भी किताब को मैंने छोड़ नहीं। दिन रात मैं इसके साथ लगा रहा और करीब दो दिन में इसे पढ़ डाला।



चोट्टू की कहानी...