Saturday, August 30, 2014

लॉन्ग ड्राइव, मस्ती और परांठे: मुरथल


दूर तक जाती खुली सड़क, सड़क के दोनों ओर लहलहाते खेत और खेतों के बीच बना एक फर्स्ट क्लास रेंस्तरा। नेचर के करीब बने इस रेंस्तरा का नाम है सुखदेव दा ढ़ाबा। जो आपको किसी भी फाइव स्टार रेंस्तरा से बढिया सर्विस दे सकता है। साथ ही अगर आप अपने अज़ीज़ दोस्तों के साथ एक लंबी सी ड्राइव एंजोय करना चाहते हैं तो मुरथल में बना सुखदेव दा ढाबा आपके लिए एक दम ठीक जगह है। यहां आप लॉन्ग ड्राइव के बाद न केवल लाजवाब परांठों का लुत्फ उठा सकते हैं बल्कि आप यहां शोपिंग भी कर सकते हैं।

ढाबे का देशी खाना : ढाबा अपने देशी मक्खन और परंठो के लिए काफी फेमस है। यहां आपको परंठो के साथ सुखदेव की बनाई दही और ढेर सारा मक्खन मिलेगा। जिसका लाजवाब स्वाद आपको पूरा देशी फील देता है। ढाबे का पूरा मैन्यू वेजेटेरियन है। यहां आप आलू परांठा, आलू प्याज परांठा और पनीर के पराठों के साथ-साथ शाही पनीर और दाल मक्खनी भी ट्राई कर सकते हैं। इसके अलावा ढाबे में साउथ इंडियन, कानटिनेंटल और चाइनिज फुड भी एविलेबल है। साथ ही ढाबे के गेट पर गोल-गप्पे और टिक्की जैसै ज़ायकेदार स्नैक्स भी मौजूद है। जिसका लुत्फ आप सामने हाईवे पर सरपट दौड़ती गाडियों और ठंडी हवाओं के साथ उठा सकते हैं।

कभी भी आओ जाओ : सुखदेव दा ढाबे पर आप कभी आ-जा सकते हैं। आप यहां अर्लि मॉर्निंग से लेट नाइट तक कभी भी जा सकते हैं। नेशनल हाइवे पर होने के कारण ढाबा हफ्ते के सातों दिन चौब्बिसों घंटे खुला रहता है। ज्यादातर स्टूडेंटस और यंगस्टर्स यहां वर्किंग डेस् में ही आते हैं। इसके आलावा दिल्ली और एनसीआर के कई बाईकिंग ग्रुपस भी यहां कई बार यहां रात को काफी भीड़ हो जाती है। तब आपको अपनी बारी के लिए 10 से 15 मीनट इंतजार भी करना पड़ सकता है।

ढाबे में शोपिंग का मज़ा: सुखदेव दा ढाबा में ही कई दुकानें बनी हुई हैं। ढाबे पर शॉपिंग करने का अपना एक अलग मजा है। यहां गारमेंट्स, गिफ्ट्स, एनटीक्स, बुक्स, मुविज़ सीडी और मोबाइल की दुकानें हैं। जहां से आप अपने व अपने दोस्तों के साथ- साथ अपने घर के लिए भी काफी कुछ खरीद सकते हैं। ढाबे में बनी एनटीक्स की दुकान पर आपको काफी कुछ नया देखने को मिलेगा। यहां से आप आपने घर के लिए भी काफी डेकोरेटिव चीजें खरीद सकतें हैं। दूर दूर से आए यंगस्टर्स यहां की गिफ्ट शॉप से भी शॉपिंग करना काफी पसंद करते हैं। ढाबे की गारमेंट्स शोप से आप अपने लिए कुर्ते और ट्रैंडी टी शर्ट ट्राई कर सकते हैं। अपने फ्रेंड्स के लिए आप यहां से काफी कूल गिफ्ट्स भी खरीद सकते हैं।  

लोकेशन : राजधानी दिल्ली से 58 किलोमिटर दूर, लहलहाते खेतों में बना है साखदेव दा ढाबा। ढाबे के आस पास काफी खेत हैं। जो आपको बिलकुल ठेट देशी फिलिंग देता है। ढाबे के सामने ही 50 से 60 गाडियों के पार्किंग की जगह है। जहां आप आपनी गाडी पार्क कर सकते हैं।

सीधा है रास्ता : दिल्ली और सोनीपत से ढाबा 58 किलोमीटर दूर है। यह मेन नेशनल हाइवे एनएच1 पर ही बना है। अगर आप दिल्ली से अमृतसर जा रहे हैं तो यह आपके लेफ्ट में पड़ेगा।


आस पास कई और भी अड्डे :  मुरथल में कई और भी अड्डे जहां आप आपने दोस्तों के साथ इंजोय कर सकते हैं। दिल्ली से जाते समय सुखदेव के ढाबे से करीब 5.7 किलोमीटर पहले जुरासिक पार्क पड़ता है। जहां आप अपने दोस्तों के साथ मौज- मस्ती कर सकते हैं। साथ ही अगर आप सुखदेव के ढाबे से करीब 3.6 किलोमीटर अमृतसर की ओर जाएंगे तो वहां आप हवेली रेस्तरां भी ट्राई कर सकते हैं। इसके अलावा आप मुरथल में हल्दीराम और मैक डोन्लड जैसै ब्रैंण्ड का लुत्फ भी उठा सकते हैं।

Friday, August 29, 2014

लज्जा: इलाहाबाद से दिल्ली का हमसफ़र



आज अपनी बुकशेल्फ साफ करते समय महसूस हुआ कि शेल्फ में रखी हर किताब के साथ मेरी कोई न कोई कहानी जरूर जुड़ी हुई है। सभी के साथ एक अजीब सा रिश्ता बना हुआ है।
यह बात उस समय की है जब मैंने अपनी स्कूलिंग खत्म कर कॉलेज में दाखिला लेने के लिए भाग दौड़ कर रहा था। उन दिनों अक्सर इलाहावाद आना जाना लगा रहता है। एक बार रात में करीब 10 बजे इलाहबाद युनिवर्सिटी का एन्ट्रंस इग्जाम देकर लौटते समय, ट्रेन का प्लेटफॉर्म पर इंतजार कर रहा था। इतने में मेरी नजर प्लेटफॉर्म पर बने बुक स्टोर पर गई। काफी पुराना बुक स्टोर था। हालत भी कुछ ज्यादा ठीक ठाक न थी। अब अकेला इंसान प्लेटफॉर्म पर ट्रेन का इंतजार कर रहा था तो सोचा चलो इसे ही निहार लिया जाए बुकस्टोर के पास पहुंचा तो वहां बस कुछ गिनी-चुनी किताबें हीं थी। दुकानदार साहब भी सुबह के बचे अखबारों को समेट रहे थे। निराशा हुई कि यहां तो कुछ ज्यादा देखने को है ही नहीं। दरासल जेब में पैसे तो इतने थे नहीं की अगर कोई बढ़िया किताब मौजूद हो तो उसे खरीद सकूं तो बस निहारने ही गया पर निराशा ही हाथ लगी।
दुकानदार भाई साहब से पूछा, "कोई किताब है किसी मशहूर लेखक की ..."

"जो है तुम्हारे सामने है भईया, इनमें से कुछ लेना है तो बताओ भईया दिखा देता हूं।" दुकान से जवाब आया

"हहहहमममम.... मुझे तो किताबों की कुछ ज्यादा समझ है नहीं क्या लूं इनमें से"

"भईया मैं क्या बताउं आपको जो लेना है बताओ मैं दिखा देता हूं"

"कुछ ऐसा है आपके पास जिसे मैं दिल्ली पहुंचने तक पढ़ सकूं।" मैंने पूछा

"ऐसी तो मैग्जिन होती हैं, वो तो है नहीं भईया... बस कुछ आठ दस ये ही पूरानी किताबें हैं। इन्हें कोई पूछता नहीं।"

"अच्छा... दिखाओ वो ही दिखओ।"

दुकानदार ने अपनी दुकान की आठ दस किताबें टेबल पर ला कर रख दी। अब मुझे भी नया नया रोग लगा था किताबें पढ़ने का तो इतनी जानकारी कहां की कौन सी किताब लूं।

"भईया रहने दो कोई भी ठीक नहीं लग रही है।" मैंने कहा।

"भईया ज्यादातर लोग प्लेटफॉर्म पर अखबार पढ़ते हैं तो इसलिए ज्यादा किताबें नहीं और फिर स्टेशन के बाहर बाजार है सभी वहीं से किताबें लेते हैं।" दुकानदार ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।

दुकानदार की बात सुन मैं भी अपना मन सिकोड़ अपने फोन में लग गया। फोन से सर हटा ऊपर उठाया तो मेरी नजर दुकान में पड़ी एक किताब की ओर जा टिकी। गौर से देखा तो मालूम चला कि यह तो वही किताब थी जिसके बारे में अपने स्कूल टिचर्स व घर वालों से काफी सुना था। सुना था इस किताब के साथ कई हंगामें हुए थे। इसकी लेखिका को तो मार डालने तक का फरमान जारी कर दिया गया था। मैंने फॉरन दुकानदार से कहा, भईया जरा वो किताब दिखाना
अरे यह किताब तो दिखाना ही भूल गया था। यह बी काफी पूरानी है कई दिनों से रखी हुई है। बस यही एक ही कॉपी है इसकी....  दुकानदार कहता रहा पर मैं उसकी बातों को अनसुना कर किताब के पन्नों में कुछ तलाशने लगा।
कुछ तो ऐसा मिले जिससे सिद्ध हो सके कि यह वही किताब है जिसके बारे में मैंने सुना है।

मैं पन्नों को पलटता रहा, कुछ ढूंढता रहा... और फिर एक एक कर के किताब से जुड़ी सारी बातें मेरी आंखो के सामने आते गए। मुझे यकिन ही नहीं हो रहा था कि मेरे हाथ मैं वह किताब है जिसके बारे में मैंनें इतना कुछ सुना है। जिसको एक दो दिल्ली में ढ़ूंढने का प्रयास भी किया पर असफल रहा।
मैंने दुकानदार से किताब का दाम पूछा, तो वह किताब को अपने हाथ में ले उसे देखता हुआ बोला, "भईया 80 की है पर आपके लिए 70।"
मैंने तुरंत उसे 50-50 के दो नोट थमाए और किताब ले ली। अब यह किताब मेरी थी।

तसलीमा नसरीन की किताब, "लज्जा" अब मेरे पास भी थी। किताब को पा लेने कि वो खुशी बयान नहॆ की जा सकती। लग रहा था न जाने कौन सा कोई पूराना खोया समान मिल गया था।

तसलीमा नसरीन कि किताब को पढ़ते -पढते इलाहाबाद से दिल्ली का सफर कैसे तय हो गया पता ही नहीं चला। दिल्ली पहूंच कर भी किताब को मैंने छोड़ नहीं। दिन रात मैं इसके साथ लगा रहा और करीब दो दिन में इसे पढ़ डाला।



चोट्टू की कहानी...