प्रिय रजत,
आज कल कुछ अजीब हो रहा है मेरे साथ। इस पत्र के जरिये मैं अपने मन की बात तुम तक पहुँचाना चाहता हूँ।
पिछले कुछ दिनों से में रोज़ रात बिस्तर में जा गिरता हूँ इस उम्मीद कस साथ कि बस मेरी आँख लग जायेगी, मुझे नींद आ जाएगी। लेकिन यह बेईमान बिस्तर मुझे गिर देता है। मुझे गिरा देता है मेरे ख्यालों से , मुझे ऐसे ही छोड़ देता है। मैं बार बार कोशिश करता हूँ मुझे नींद आ जाये, मेरी पलकें वन्द हो जाये लेकिन ऐसा होता नहीं। कल मैंने एक दो बार नहीं बल्कि 6 दफा कोशिश करी शायद मुझे नींद आ जाये लेकिन नहीं। मैं जिन्दा लाश की तरह पड़ा रहा अपने बिस्तर पर, आँखें खुली रही, करवट बदलता रहा। न जाने कहाँ से लग गयी मुझे यह बिमारी। मुझे बिनार होना बिल्कुक पसंद नहीं पर क्या यह बीमारी है, नींद न आना बीमारी है? नही, नहीं ऐसा नहीं है। मैं ठीक हूँ। मुझे कुछ नहीं हुआ है।
दरअसल मेरे अंदर ही अंदर मुझे एक डर सताए जा रहा है, नोंचे जा रहा है पर मुझे सोने नहीं दे रहा है। इसी डर के साथ मैं कल पूरी रात नहीं सोया। आज दिन भर भी लोगों की भीड़ में बस इधर-उधर लगा रहा। अब मेरा सर दर्द के मारे फटने को हो रहा है। लग रहा जैसे अभी फट जाएगा। शायद पूरी नींद न लेने के कारण ऐसा हो। मैं फिर तीसरी बार अपने बिस्तर पर लेट गया हूँ। सभी को गुडनाईट बोल मैं बस सोना चाहता हूँ। लेकिन फी वही डर!! लौट आ रहा है। लगता है जैसे मुझसे कोई बात करना चाहता है। मुझे जगाना चाहता है। चाहता है मै उसके साथ रहूँ। मेरा सर भारी हुआ जा रहा है। लग रहा है जैसे कोई सर पर हथौडा मार रहा हो। मैं सोना चाहता हूँ, मैं अपनी पलकें बंद करना चाहता हूँ!! मैं सोना चाहता हूँ!!!
तुम्हारा मित्र
अदृश्य
